अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की राह पर छत्तीसगढ़

अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की राह पर छत्तीसगढ़

नसीम अहमद खान, उप संचालक,जनसंपर्क
रायपुर, आज पूरी दुनिया ऊर्जा संकट और जलवायु परिवर्तन जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है। जीवाश्म ईंधनों पर अत्यधिक निर्भरता न केवल सीमित संसाधनों पर दबाव डाल रही है, बल्कि पर्यावरणीय असंतुलन को भी बढ़ा रही है। ऐसे समय में अक्षय ऊर्जा, विशेषकर सौर ऊर्जा, ही भविष्य की सबसे सशक्त और टिकाऊ राह बनकर उभर रही है। भारत ने वर्ष 2030 तक 500 गीगावॉट क्षमता का नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन लक्ष्य निर्धारित किया है। इस राष्ट्रीय लक्ष्य को पूरा करने में छत्तीसगढ़ राज्य महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। 

केंद्र सरकार द्वारा शुरू की गई प्रधानमंत्री सूर्यघर मुफ्त बिजली योजना ने ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में नई ऊर्जा क्रांति का मार्ग प्रशस्त किया है। योजना के अंतर्गत लाभार्थियों को घर की छत पर सोलर पैनल लगाने के लिए केंद्रीय सब्सिडी के साथ-साथ राज्य सरकार से भी आर्थिक सहयोग उपलब्ध कराया जा रहा है। इस योजना का उद्देश्य वर्ष 2027 तक देशभर में एक करोड़ से अधिक परिवारों को मुफ्त बिजली उपलब्ध कराना है।

छत्तीसगढ़ में इस योजना का क्रियान्वयन तेज गति से हो रहा है। अप्रैल 2025 से अब तक 55 हजार से अधिक उपभोक्ताओं ने आवेदन किया है, जिनमें से पाँच हजार घरों में सोलर सिस्टम स्थापित हो चुके हैं। लगभग 16 हजार घरों में सोलर पैनल लगाने का कार्य प्रगति पर है। राज्य सरकार ने मार्च 2027 तक पाँच लाख घरों में सोलर पैनल लगाने का लक्ष्य तय किया है।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त करने में सौर ऊर्जा का योगदान विशेष महत्व रखता है। प्रधानमंत्री कुसुम योजना के तहत किसानों को सोलर पंप उपलब्ध कराए जा रहे हैं। इससे न केवल सिंचाई में आसानी होगी, बल्कि किसानों की निर्भरता पारंपरिक बिजली पर भी घटेगी। राज्य सरकार द्वारा अब तक सात मेगावॉट क्षमता के सोलर पंप स्थापित किए जा चुके हैं और आने वाले वर्षों में हजारों पंपों की स्थापना की योजना है। 

इसके अतिरिक्त, दुर्गम ग्रामीण अंचलों में सोलर मिनी ग्रिड योजना लागू की जा रही है। लगभग 330 मेगावॉट क्षमता के मिनी ग्रिड प्लांट स्थापित किए जाने का लक्ष्य निर्धारित है, जिससे हजारों गाँवों को रोशनी मिलेगी।

छत्तीसगढ़ ने नवीकरणीय ऊर्जा के औद्योगिक उपयोग की दिशा में भी कदम बढ़ाए हैं। बायोमास आधारित विद्युत संयंत्र, फ्लोटिंग सोलर प्रोजेक्ट और सोलर स्ट्रीट लाइट्स की स्थापना के साथ-साथ सरकारी भवनों, छात्रावासों और अस्पतालों में सोलर विद्युतीकरण का कार्य तेज़ी से किया जा रहा है। अब तक 2,600 से अधिक सरकारी परिसरों में सोलर सिस्टम लगाए जा चुके हैं।

राजनांदगांव जिले में सौर ऊर्जा के क्षेत्र में देश का सबसे बड़ा बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम डोंगरगढ़ रोड पर ग्राम ढाबा के आसपास के 4-5 गांवों के पहाड़ी क्षेत्र में स्थापित किया गया है। इससे प्रतिदिन 5 लाख यूनिट से अधिक बिजली का उत्पादन होगा और लगभग 4.5 लाख मीट्रिक टन कार्बन उत्सर्जन में कमी आएगी। आने वाले दो वर्षों में 2000 मेगावॉट क्षमता के सोलर पार्क स्थापित किए जाएंगे, जिससे छत्तीसगढ़ राष्ट्रीय स्तर पर अक्षय ऊर्जा उत्पादन का प्रमुख केंद्र बनेगा।

सौर ऊर्जा न केवल बिजली की उपलब्धता सुनिश्चित करती है, बल्कि यह स्वच्छ पर्यावरण के निर्माण में भी सहायक है। ‘‘सोलर विलेज’’ की अवधारणा के अंतर्गत 53 गाँवों का चयन किया गया है, जहाँ कोयला आधारित बिजली पर निर्भरता कम कर केवल सौर ऊर्जा से ही विद्युत आपूर्ति की जाएगी। यह प्रयास ग्रामीण जीवन में स्थायी बदलाव लाएगा और कार्बन उत्सर्जन घटाने में भी सहायक सिद्ध होगा।

वर्तमान में छत्तीसगढ़ की कुल बिजली मांग लगभग 5,500 मेगावॉट है, जिसमें 15 प्रतिशत आपूर्ति नवीकरणीय स्रोतों से हो रही है। वर्ष 2030 तक इस हिस्सेदारी को 45 प्रतिशत और वर्ष 2047 तक 66 प्रतिशत तक पहुँचाने का लक्ष्य है। इन प्रयासों के परिणामस्वरूप छत्तीसगढ़ अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में देश के अग्रणी राज्यों में शामिल होगा।

छत्तीसगढ़ की नीतियाँ अक्षय ऊर्जा उत्पादन को बढ़ावा देने के साथ-साथ उपभोक्ताओं को सस्ती, स्वच्छ और स्थायी बिजली उपलब्ध कराने पर केंद्रित हैं। ‘‘सूर्यघर योजना’’ और अन्य सौर परियोजनाओं से जहाँ ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में लोगों को लाभ मिलने लगा है। इससे आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित पर्यावरण और ऊर्जा आत्मनिर्भरता का मार्ग भी प्रशस्त होगा।

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