आप के 7 सांसदों का भाजपा में विलय: सीएम मान ने राष्ट्रपति के हस्तक्षेप की मांग की

आप के 7 सांसदों का भाजपा में विलय: सीएम मान ने राष्ट्रपति के हस्तक्षेप की मांग की

चंडीगढ। आम आदमी पार्टी (आप) के सात राज्यसभा सांसदों के भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में विलय की अधिसूचना जल्द जारी होने की संभावना है। इस बीच, पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने राष्ट्रपति से मिलने का समय मांगा है। मुख्यमंत्री इस मुलाकात के दौरान सांसदों के दलबदल से जुड़े तथ्यों को राष्ट्रपति के सामने रखेंगे और इन सांसदों को उच्च सदन से वापस बुलाने यानी रिकॉल (Recall) के संवैधानिक प्रावधानों पर चर्चा करेंगे।

राष्ट्रपति से समय मांगा

आधिकारिक सूत्रों के अनुसार, मुख्यमंत्री कार्यालय (सीएमओ) ने राष्ट्रपति से मुख्यमंत्री और उनके साथ पार्टी विधायकों के प्रतिनिधिमंडल के लिए समय मांगा है। तर्क यह है कि चूंकि राज्यसभा सांसद प्रदेश के विधायकों (निर्वाचक मंडल) द्वारा चुने जाते हैं, इसलिए उनके दलबदल पर विधायकों का पक्ष सुना जाना जरूरी है। भाजपा में शामिल होने वाले सात सांसदों में से छह पंजाब से हैं—राघव चड्ढा, संदीप पाठक, अशोक मित्तल, हरभजन सिंह, राजेंद्र गुप्ता और विक्रमजीत सिंह साहनी। केवल स्वाति मालीवाल दिल्ली का प्रतिनिधित्व करती हैं। राजेंद्र गुप्ता पिछले साल निर्विरोध चुने गए थे, जबकि अन्य पांच 2022 में निर्वाचित हुए थे।

दो-तिहाई बहुमत और दलबदल कानून का पेच

इस मामले में कानूनी विशेषज्ञों की राय बंटी हुई है। संविधान की दसवीं अनुसूची (दलबदल विरोधी कानून) के अनुसार, यदि किसी पार्टी के दो-तिहाई सांसद एक साथ किसी अन्य दल में विलय करते हैं, तो उनकी सदस्यता रद्द नहीं होती। 'आप' के कुल 10 राज्यसभा सांसदों में से 7 का भाजपा में जाना (70 प्रतिशत) इस तकनीकी मापदंड को पूरा करता है। ऐसे में दलबदल कानून के तहत उन्हें अयोग्य ठहराना मुश्किल हो सकता है।

रिकॉल के प्रावधान पर टिकी नजरें

पार्टी अब 'रिकॉल' (वापस बुलाने) के संवैधानिक अधिकार की बात कर रही है। हालांकि, भारतीय संविधान में वर्तमान में निर्वाचित सांसदों या विधायकों को वापस बुलाने का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है। मुख्यमंत्री भगवंत मान का प्रयास इस मामले में एक नया कानूनी नजीर पेश करने का है। इस बीच, पार्टी के भीतर से इन सांसदों के हस्ताक्षरों को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। यदि भविष्य में कोई कानूनी चुनौती दी जाती है, तो यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक जा सकता है।