bjpअपने दम पर बिहार में बना सकती हैं सरकार, पर दोस्ती तोड़ना फितरत नहीं-आरके सिंह

bjpअपने दम पर बिहार में  बना सकती हैं सरकार, पर दोस्ती तोड़ना फितरत नहीं-आरके सिंह

पटना
बिहार में अभी चुनावी रणभेरी बजने का इंतजार है लेकिन राजनीतिक दलों में चुनावी सरगर्मी नजर आने लगी है. राजनेताओं के तीखे बयान हों या दलबदल की खबरें चुनाव से जुड़ी हर चीज अब तेज हो चुकी है. तमाम दल चुनावी गठबंधनों को लेकर भी फिक्रमंद नजर आ रहे हैं. इस बीच आरा से बीजेपी सांसद और केंद्रीय ऊर्जा मंत्री आरके सिंह ने भी बिहार में गठबंधन से जुड़ा एक अहम बयान दिया है. उधर, बिहार में पार्टियां सियासी समीकरण बनाने के साथ ही पूरी तरह से गठजोड़ के गणित में भी जुट गई हैं। उसी कड़ी में केंद्रीय ऊर्जा मंत्री आर.के सिंह के सबको दरकिनार कर बिहार में अकेले सरकार बनाने का दावा किया है।


केंद्रीय ऊर्जा मंत्री और बिहार के आरा से सांसद आर के सिंह ने कहा कि इसमें कोई शक नहीं है कि बीजेपी अपने दम पर बिहार में सरकार बना सकती है।उन्होंने कहा कि लेकिन उनकी पार्टी की जनता दल यूनाइटेड (JDU) के साथ साल 1996 से साझेदारी है और वे लोग नहीं चाहते हैं कि यह टूटे और न ही जेडीयू भी ऐसा चाहती है, दोस्तों को हम नहीं छोड़ना चाहते हैं।

केंद्रीय मंत्री आर.के सिंह ने सीट बंटवारे के बारे में बोलते हुए कहा कि जल्दी ही हमारे बीच सीटों का बंटवारा हो जाएगा। हमारे बीच सीटों को लेकर कोई मतभेद नहीं है, इसलिए आराम से यह पूरी प्रक्रिया पूरी कर ली जाएगी। उन्होंंने कहा, लोकसभा के नतीजे साफतौर पर बीजेपी और पीएम नरेंद्र मोदी के वोट बैंक को जाहिर करते हैं, इसलिए सीटों का बंटवारा भी उसी आधार पर होना चाहिए।

क्या मांझी के एनडीए में शामिल होने के बाद बदले हैं तेवर?
बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी की पार्टी हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (हम) इस साल होने वाले विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के घटक दल के रूप में चुनाव मैदान में उतरेगी। जीतन राम मांझी ने बुधवार को पटना में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर इसकी औपचारिक घोषणा कर दी है। मांझी ने अपने संबोधन में कहा कि उन्होंने जेडीयू से गठबंधन किया है। इस लिहाज से वे एनडीए का हिस्सा हैं। राजनीति के जानकारों का मामना है कि मांझी के एनडीए में शामिल होने के बाद बीजेपी के तेवर पहले से ज्यादा सख्त हुए है, वह अपने पुराने सहयोगियों को जताने की कोशिश कर रही है कि वह अकेले भी चुनावव जीत सकती है।

मांझी के वोट बैंक
बिहार में दलित और महादलित के करीब 16 फीसदी वोटर हैं। इसमें से करीब 5 फीसदी रामविलास पासवान की पार्टी के साथ होने का दावा किया जाता है। वहीं जीतन राम मांझी के पास करीब 5.5 फीसदी मुसहर जाति के कोर वोटर हैं। जानकार मानते हैं कि पिछले दो चुनावों को देखकर कहा जा सकता है कि करीब दो से ढाई फीसदी वोट मांझी के नाम पर इधर से उधर होते हैं।

मांझी की 15 सीटों की है डिमांड
2020 बिहार विधानसभा चुनाव में मांझी 15 सीटों की डिमांड कर रहे हैं। हालांकि सूत्रों के हवाले से बताया जा रहा है कि उनकी पार्टी को 9-12 सीटें दी जा सकती हैं। मांझी 2015 में विधानसभा की 35 सीटों पर किस्मत आजमाना चाहते थे, लेकिन एनडीए में उन्हें 21 सीटें मिली थीं। 21 सीटें मिलने से नाराज मांझी ने उस वक्त कहा था कि यदि उन्हें 35 सीटों पर किस्मत आजमाने का मौका मिलता तो पार्टी के प्रदर्शन का फायदा एनडीए को होता।

विधानसभा चुनाव से पहले एनडीए में मतभेद
बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी की पार्टी हम (एस) की लोक जनशक्ति पार्टी से पुरानी प्रतिद्वंद्विता शुक्रवार को फिर से सामने आ गयी। हम (एस) ने आगाह किया है कि अगर लोकजनशक्ति पार्टी ने विधानसभा चुनाव में जद (यू) के खिलाफ उम्मीदवार उतारे तो वह भी लोजपा के खिलाफ अपना प्रत्याशी खड़ा करेगी। केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान की लोजपा केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सहयोगी है लेकिन राज्य में जदयू-भाजपा गठबंधन सरकार का वह हिस्सा नहीं है। राज्य में अक्टूबर-नवंबर में विधानसभा चुनाव होना है। लोजपा का नेतृत्व अब पासवान के पुत्र चिराग पासवान कर रहे हैं। वह जन वितरण प्रणाली में कथित भ्रष्टाचार से लेकर, सड़क निर्माण समेत विभिन्न मुद्दों पर नीतीश कुमार सरकार की आलोचना करते रहे हैं।