जिला पुरातत्व संग्रहालय में हो सकेंगे परशुराम की अद्भुत प्रतिमा के दर्शन...

जिला पुरातत्व संग्रहालय में हो सकेंगे परशुराम की अद्भुत प्रतिमा के दर्शन...

जिला पुरातत्व संग्रहालय में स्थापित होगी परशुराम की मूर्ति

स्थानीय मूर्तिकारों ने संग्रहालय को सौपी मूर्ति

[caption id="attachment_495449" align="alignnone" width="1280"]parasurams-statue-will-be-installed-in-the-district-archaeological-museum परसुराम की मूर्ति के साथ रामकृष्ण सेवाश्रम के स्वामी सारदात्मानन्द जी महाराज...[/caption] Syed Javed Ali मंडला - बुधवार को जिला पुरातत्व संग्रहालय मंडला को कलेक्टर हर्षिका सिंह की मौजूदगी में कलाकारों के एक दल द्वारा बनाई गई परशुराम की मूर्ति सौपी गई। इस मूर्ति को कड़ी मेहनत के बाद 6 कलाकारों ने मिलकर तैयार किया है। इस दौरान मूर्तिकार मनोज द्विवेदी ने बताया कि मूर्ति बनाने की प्रेरणा उनको मंडला के इतिहास के पन्ने खंगालने से मिली। रामकृष्ण सेवाश्रम के स्वामी सारदात्मानन्द जी महाराज ने भी इसके लिए प्रेरित किया। parasurams-statue-will-be-installed-in-the-district-archaeological-museumमनोज द्विवेदी ने बताया कि उन्हें जानकारी लगी कि मंडला के 2 ऐतिहासिक घटनाये हुए है पहली मंडन मिश्र का शंकराचार्य के साथ शास्तार्थ और इसके अलावा भगवान परशुराम के बचपन की कहानी पता चली जब उनके पिता नर्मदा परिक्रमा में थे। उस दौरान एक घटना हुई थी उन्हें खड़ाऊ बनाई थी। उन्हें परशुराम की मूर्ति बनाना ज्यादा आसान लगी। शंकराचार्य और मंडन मिश्र के शास्तार्थ को पत्थर में उकेरने के मुकाबले उन्होंने भगवान परशुराम की मूर्ति बनाई। परशुराम बचपन में अपनी मां के लिए खमीर की लकड़ी और शीशा से मां के लिए खड़ाऊ बनाते। मूर्तिकार मनोज ने बताया कि उनके पास शुरुआत में आर्थिक तंगी की वजह से बाहर से पत्थर लाने में दिक्कत थी इसलिए उन्होंने जिले में ही पत्थर की खोज शुरू की जो मूर्ति के लिहाज से बेहतर हो। उन्होंने पुरातत्व संग्रहालय में हेमन्तिका शुक्ला से मुलाकात की जिसमें उन्होंने विभिन्न पत्थरों को मूर्ति के लिहाज से उनकी विशेष गुण और दोष बताएं। उनसे बातचीत के आधार पर उन्होंने डोलोमाइट खनिज के सफेद पत्थर का चयन किया। उन्होंने एक बड़ी चट्टान चुनी जिसमें कोई दरार नहीं थी, उस पर काम करना शुरू किया। इस काम में तत्कालीन मंडला कलेक्टर सूफिया फारूकी वली का भी उन्होंने उल्लेख किया कि उनकी मदद से ही यह एक ट्रॉली पत्थर उपलब्ध कराए थे जिसकी वजह से यह मूर्ति साकार रूप ले सखी। इनकी टीम के पहले सदस्य थे मूर्तिकार भंगी लाल हरदा, दूसरे कलाकार थे आशीष कछवाहा जिन्होंने मूर्ति को डिजाइन किया था। तीसरे नंबर पर मनोज द्धिवेदी ने अपने आप को रखा। चौथे नंबर पर राम कुमार नंदा, पांचवें नंबर भूपेंद्र यादव और छटवें नंबर पर कृष्ण महिपाल यादव थे। इस 6 कलाकारों ने मिलकर इस पूर्ति को साकार रूप दिया है। इस मूर्ति को बनाने में साढे 4 महीने लगे। एक अनुमान के मुताबिक इसकी शुरूआती कीमत 4 लाख 50 हज़ार रूपये है। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार की बात करें तो इससे मूर्ति की कीमत इससे काफी अधिक प्राप्त हो सकती है। यह मूर्ति अब जिला पुरातत्व संग्रहालय मंडला में स्थापित होगी और लोग इसके दर्शन कर सकेंगे।