विधानसभा चुनाव: UP की सियासत में सबसे बड़े वोटबैंक की लड़ाई तेज
सपा-बसपा के बाद अब भारतीय जनता पार्टी द्वारा ओबीसी वर्ग से आने वाले स्वतंत्र देव सिंह को प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने के बाद प्रदेश में ओबीसी के सबसे बड़े वोटबैंक की लड़ाई और तेज हो गई है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में वोटबैंक की राजनीति मुख्य रूप से ओबीसी वर्ग के ईद-गिर्द केंद्रित रहेगी?.
ऐसा नहीं है कि भाजपा ने पहली बार किसी ओबीसी नेता को प्रदेश अध्यक्ष बनाया है। स्वतंत्र देव कुर्मी बिरादरी से हैं। इससे पहले केशव प्रसाद मौर्य, ओम प्रकाश सिंह, विनय कटियार और कल्याण सिंह भी प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं। मौजूदा हालात में परिवहन मंत्री स्वतंत्र देव सिंह की अध्यक्ष पद पर तैनाती के अलग मायने निकाल रहे हैं। .
2022 में फिर फायदा लेने की कवायद
भाजपा ने अब वर्ष 2022 के चुनाव से पहले एक बार फिर ओबीसी नेता को संगठन की कमान सौंप कर बड़ा दांव चला है। भाजपा सरकार द्वारा हाल ही में 17 अति पिछड़ी जातियों को एससी-एसटी कोटे में करने के फैसले को भी कुछ ऐसे ही सियासी नजरिये से देखा जा रहा है। इसके अलावा आने वाले वक्त में सरकार द्वारा तैयार कराई गई सामाजिक न्याय समिति के रिपोर्ट के जरिये अति पिछड़ों के आरक्षण कोटे की समीक्षा भी ऐसी ही जातीय सियासत की कवायद मानी जा रही है।.
भाजपा ने उठाया फायदा
भाजपा ने 2017 विधानसभा चुनावों से पहले पिछड़े वर्ग को साथ लेने की कवायद शुरू की। नतीजा वर्ष 2017 के चुनावों में ओबीसी का एक बड़ा वर्ग पार्टी से जुड़ा। ओबीसी को पाले में करने के लिए 2017 चुनाव से पहले केशव प्रसाद मौर्य को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया और चुनाव प्रचार में वह पार्टी के बड़े ओबीसी चेहरे के रूप में सक्रिय रहे। इसका लाभ भी मिला। .
बसपा प्रदेश अध्यक्ष ओबीसी
इसी समीकरण के मद्देनज़र मायावती ने आरएस कुशवाहा को 26 मई 2018 में लोकसभा चुनाव के मद्देनज़र पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बनाया। बसपा का भी मकसद ओबीसी को अपने पाले में करना था। यह बात दीगर है कि ओबीसी के बड़े नेता स्वामी प्रसाद मौर्य के पार्टी छोड़ने के बाद कोई कद्दावर ओबीसी नेता बसपा से न जुड़ा और न ही पार्टी को लोस चुनावों में इसका कोई लाभ मिला।.
सपा को ओबीसी से उम्मीद
समाजवादी पार्टी ने पटेल जाति के नरेश उत्तम को जनवरी 2017 में विधानसभा चुनाव से पहले प्रदेश अध्यक्ष बनाया था। पार्टी का मकसद गैर यादव ओबीसी में संदेश देना था कि पार्टी उनके हितों के साथ खड़ी है। इसकी अपनी वजह थी। सपा के कद्दावर नेता रहे बेनी प्रसाद वर्मा के बाद पार्टी में कोई बड़ा गैर यादव ओबीसी नेता नहीं था।
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