निचली और सर्वोच्च अदालत ने दी फांसी की सजा, राष्ट्रपति ने भी खारिज की दया याचिका
ब्रम्हदीप अलुने
भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के 30 साल पूरे होने के 48 घंटे पहले तमिलनाडू के मुख्यमंत्री स्टालिन ने इस हत्याकांड से जुड़े मुख्य दोषी पेरारिवलन को जेल से तीस दिन की छुट्टी देने का आदेश जारी कर दिया।लिबरेशन टाइगर्स तमिल ईलम के पेरारिवलन ने राजीव गांधी की हत्या में उपयोग में लाये गए बेल्ट बम के लिए शिवरासन को 9-बेल्ट बैटरी उपलब्ध करायी थी। 20 वी सदी के इस सबसे सनसनीखेज हत्याकांड पर दुनिया भर की नजर रही है लेकिन भारत में इसके दोषी राजनीतिक प्रश्रय और क्षेत्रीय राजनीति के बूते अब तक जीवित है।
दरअसल भारत में एक पूर्व प्रधानमंत्री की निर्मम हत्या से जुड़े दोषियों को उच्च स्तर पर राजनीतिक और कानूनी मदद से बचाव की कोशिशें हैरान करने वाली है। मुरुगन,
संथन और पेरारीवालन की निचली अदालत ने 1997 में और सर्वोच्च अदालत ने 11
मई 1999
को राजीव गांधी हत्याकांड में दोषी मानते हुए फांसी की सजा सुनाई थी। इसके बाद साल 2000 में इस मामले में फांसी की सजा पाए दोषियों ने राष्ट्रपति के पास दया याचिका दायर की। यह याचिका साल 2000 और 2005 में तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे कलाम के पास आई लेकिन उनके द्वारा इस पर कोई निर्णय नहीं लिया गया। भारत में यह कानूनी अधिकार है कि दया याचिका पर राष्ट्रपति के निर्णय न होने तक दोषियों को सजा नहीं दी जा सकती।
अब यह याचिका राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के पास आई और उन्होने चार साल के इंतजार के बाद 12 अगस्त 2011 को दया याचिका खारिज कर दी। अब दोषियों का फांसी चढ़ना तय था लेकिन राजनीतिक हस्तक्षेप ने कानूनी न्याय को मात दे दी। 26 अगस्त 2011 को तीनों दोषियों को फांसी देने कि तारीख 9 सितंबर 2011 बताया गया। अब यहीं से तमिल राजनीति के अगुवा अपने वोट बैंक के लिए लामबंद हुए। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन के पिता डीएमके नेता एम करुणानिधि,
एमडीएमके महासचिव वाइको,
द्रविदड कझगम प्रमुख के वीरमानी,
पीएमके नेता डॉ.एस.रामदोस,
राज्य के सीपीआई और सीपीएम नेता,
तमिल नेशनल मूवमेंट के नेता पी नेदूमारन,
नाम थमिझार के नेता और फिल्म डायरेक्टर सीमान ने दोषियों की सजा माफ कर उनकी सजा को उम्रकैद में बदलने की मांग की। 30 अगस्त 2011 को तमिलनाडु विधानसभा ने अभूतपूर्व तरीके से एक प्रस्ताव पास करके राष्ट्रपति से फांसी कि सजा को रोकने का आग्रह किया।
तमिलनाडु विधानसभा का यह प्रस्ताव भारत कि संघीय और एकल प्रभुसत्ता को चुनौती देने वाला था। यह राज्य कि स्वायत्ता कि कोशिशों के तौर पर भी देखा गया। राजनीतिक हस्तक्षेप और क्षेत्रीय राजनीति के प्रभाव के कारण फांसी कि तारीखें फिर टल गई। बाद में 18 फरवरी 2014 को सुप्रीम कोर्ट ने दया याचिका पर देरी के आधार पर फांसी कि सजा पर रोक लगा दी। साथ ही यह शर्त भी लगा दी कि तमिलनाडु सरकार उन्हें रिहा न करें तो उन्हें पूरी जिंदगी जेल मे बितानी पड़ेगी।
इसके बाद तमिलनाडू कि जयललिता सरकार ने ज़ोर शोर से यह प्रयास किया कि राजीव गांधी हत्याकांड से जुड़े सभी अभियुक्तों को जेल से रिहा कर दिया जाएं। इसके साथ ही वे तमिल प्रेम का प्रदर्शन करके तमिल वोट पर अपनी पार्टी का दावा मजबूत कर सके। 19 फरवरी 2014 को मुख्य मंत्री जय ललिता ने एलान किया कि राजीव गांधी हत्याकांड से जुड़े इन तीन अभियुक्तों के साथ अन्य चार जल्द ही खुली हवा में सांस लेंगे।
इसके बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी हत्यारों को छोड़ने कि तमिलनाडु सरकार कि पहल को नाजायज ठहराया। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने तमिल नाडु सरकार को नोटिस जारी कर इस पर रोक नहीं लगाई होती तो तमिलनाडु कि सरकार इन हत्यारों को रिहा कर चुकी होती। राजीव गांधी की हत्या के मामले की जांच करने वाली स्पेशल इन्वेस्टीगेशन टीम के प्रमुख पुलिस अफसर डीआर कार्तिकेयन ने अपनी किताब ‘
सत्य की विजय:राजीव गांधी की हत्या एक अन्वेषण’
में इस हत्याकांड के कई अहम पहलू उजागर किए है। जांच में यह सभी तथ्य सामने आयें जिसके अनुसार राजीव गांधी को मारने की साजिश नवंबर 1990 में श्रीलंका के जाफना में बनी थी। इस दौरान घने जंगलों में लिट्टे चीफ प्रभाकरण और उसके चार साथी बेबी सुब्रह्मण्यम,
मुथुराजा,
मुरूगन और शिवरासन इस साजिश में शामिल रहे थे और यहीं पर राजीव गांधी की हत्या के लिए मानवबम धनू का सहारा लेने का फैसला हुआ लिया गया था।
जांच अधिकारी डी. आर कार्तिकेयन के मुताबिक महात्मा गांधी और इंदिरा गांधी की हत्या से भी ज्यादा राजीव गांधी मर्डर जटिल था क्योंकि इसमें हत्यारे और उसके इरादे के बारे में जानकारी तलाशना बहुत टेढ़ी खीर था। साथ ही यह मामला एक अन्य राष्ट्र से भी जुड़ा था। एसआईटी ने इस कार्य में बड़ी तेजी दिखते हुए सीबीआई,रॉ,कैबिनेट सचिवालय से मिले इंटेलीजेंस इनपुट पर चर्चा के साथ हत्या से पहले तमाम कोड वाले संदेशों के आदान-प्रदान को भी समझने की कोशिश की। ज्यादातर संदेशों का आदान-प्रदान तमिलनाडु के आतंकी संगठनों के बीच हो रहा था। इसके लिए एक कंट्रोल रुम बनाया गया जो 24 घंटे काम करता था। 10 हजार लोगों के बयान लिए गए जबकि 1 लाख से ज्यादा तस्वीरों की स्क्रूटनी भी की. 1477 दस्तावेजों को कोर्ट में सुबूत के तौर पर पेश किया गया। जांच कि दृष्टि से यह बेहद जटिल केस था लेकिन एसआइटी ने एक साल के भीतर 20 मई 1992 को चार्जशीट पेश कर दी थी। इस आत्मघाती बम हमले में कुल 18 लोगों की मौत हो गई। इसमें राजीव गांधी के निजी सुरक्षा अधिकारी,एसपी,पत्रकार और कई अन्य लोग शामिल थे। इसके दोषी सरकारों की रहम पर जेल से बाहर आते रहते है। इन्हें राजनीति के साथ सामाजिक प्रश्रय भी मिलता है।
राजीव गांधी के साथ 17 अन्य जो लोग मारे गए थे,उनका न तो किसी को चिंता है न ही परवाह। जबकि नलिनी की बेटी लंदन में रहकर आराम का जीवन यापन कर रही है। राजनीतिक पार्टियां इन्हें अब भी निर्दोष कहती है जबकि राजीव गांधी के पुत्र और सांसद राहुल गांधी की बात उतनी ही प्रासंगिक लगती है ने कि अगर प्रधानमंत्री के हत्यारे छूट सकते है तो आम आदमी न्याय की कैसे उम्मीद कर सकता है। वहीं भाजपा के सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने भी कहा था कि, ये सभी कट्टर आतंकवादी है। यह कहना बेतुका है की देरी से फैसले के कारण उन्हें मानसिक प्रताड्ना हुई। जो लोग उनके द्वारा मारे गए,उनके अधिकारों के बारे में क्या कहेंगेभारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के 30 साल पूरे होने के 48 घंटे पहले तमिलनाडू के मुख्यमंत्री स्टालिन ने इस हत्याकांड से जुड़े मुख्य दोषी पेरारिवलन को जेल से तीस दिन की छुट्टी देने का आदेश जारी कर दिया।लिबरेशन टाइगर्स तमिल ईलम के पेरारिवलन ने राजीव गांधी की हत्या में उपयोग में लाये गए बेल्ट बम के लिए शिवरासन को 9-बेल्ट बैटरी उपलब्ध करायी थी। 20 वी सदी के इस सबसे सनसनीखेज हत्याकांड पर दुनिया भर की नजर रही है लेकिन भारत में इसके दोषी राजनीतिक प्रश्रय और क्षेत्रीय राजनीति के बूते अब तक जीवित है।
दरअसल भारत में एक पूर्व प्रधानमंत्री की निर्मम हत्या से जुड़े दोषियों को उच्च स्तर पर राजनीतिक और कानूनी मदद से बचाव की कोशिशें हैरान करने वाली है। मुरुगन, संथन और पेरारीवालन की निचली अदालत ने 1997 में और सर्वोच्च अदालत ने 11 मई 1999 को राजीव गांधी हत्याकांड में दोषी मानते हुए फांसी की सजा सुनाई थी। इसके बाद साल 2000 में इस मामले में फांसी की सजा पाए दोषियों ने राष्ट्रपति के पास दया याचिका दायर की। यह याचिका साल 2000 और 2005 में तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे कलाम के पास आई लेकिन उनके द्वारा इस पर कोई निर्णय नहीं लिया गया। भारत में यह कानूनी अधिकार है कि दया याचिका पर राष्ट्रपति के निर्णय न होने तक दोषियों को सजा नहीं दी जा सकती।
अब यह याचिका राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के पास आई और उन्होने चार साल के इंतजार के बाद 12 अगस्त 2011 को दया याचिका खारिज कर दी। अब दोषियों का फांसी चढ़ना तय था लेकिन राजनीतिक हस्तक्षेप ने कानूनी न्याय को मात दे दी। 26 अगस्त 2011 को तीनों दोषियों को फांसी देने कि तारीख 9 सितंबर 2011 बताया गया। अब यहीं से तमिल राजनीति के अगुवा अपने वोट बैंक के लिए लामबंद हुए। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन के पिता डीएमके नेता एम करुणानिधि,एमडीएमके महासचिव वाइको,द्रविदड कझगम प्रमुख के वीरमानी, पीएमके नेता डॉ.एस.रामदोस,राज्य के सीपीआई और सीपीएम नेता,तमिल नेशनल मूवमेंट के नेता पी नेदूमारन, नाम थमिझार के नेता और फिल्म डायरेक्टर सीमान ने दोषियों की सजा माफ कर उनकी सजा को उम्रकैद में बदलने की मांग की। 30 अगस्त 2011 को तमिलनाडु विधानसभा ने अभूतपूर्व तरीके से एक प्रस्ताव पास करके राष्ट्रपति से फांसी कि सजा को रोकने का आग्रह किया।
तमिलनाडु विधानसभा का यह प्रस्ताव भारत कि संघीय और एकल प्रभुसत्ता को चुनौती देने वाला था। यह राज्य कि स्वायत्ता कि कोशिशों के तौर पर भी देखा गया। राजनीतिक हस्तक्षेप और क्षेत्रीय राजनीति के प्रभाव के कारण फांसी कि तारीखें फिर टल गई। बाद में 18 फरवरी 2014 को सुप्रीम कोर्ट ने दया याचिका पर देरी के आधार पर फांसी कि सजा पर रोक लगा दी। साथ ही यह शर्त भी लगा दी कि तमिलनाडु सरकार उन्हें रिहा न करें तो उन्हें पूरी जिंदगी जेल मे बितानी पड़ेगी।
इसके बाद तमिलनाडू कि जयललिता सरकार ने ज़ोर शोर से यह प्रयास किया कि राजीव गांधी हत्याकांड से जुड़े सभी अभियुक्तों को जेल से रिहा कर दिया जाएं। इसके साथ ही वे तमिल प्रेम का प्रदर्शन करके तमिल वोट पर अपनी पार्टी का दावा मजबूत कर सके। 19 फरवरी 2014 को मुख्य मंत्री जय ललिता ने एलान किया कि राजीव गांधी हत्याकांड से जुड़े इन तीन अभियुक्तों के साथ अन्य चार जल्द ही खुली हवा में सांस लेंगे।
इसके बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी हत्यारों को छोड़ने कि तमिलनाडु सरकार कि पहल को नाजायज ठहराया। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने तमिल नाडु सरकार को नोटिस जारी कर इस पर रोक नहीं लगाई होती तो तमिलनाडु कि सरकार इन हत्यारों को रिहा कर चुकी होती। राजीव गांधी की हत्या के मामले की जांच करने वाली स्पेशल इन्वेस्टीगेशन टीम के प्रमुख पुलिस अफसर डीआर कार्तिकेयन ने अपनी किताब ‘सत्य की विजय:राजीव गांधी की हत्या एक अन्वेषण’ में इस हत्याकांड के कई अहम पहलू उजागर किए है। जांच में यह सभी तथ्य सामने आयें जिसके अनुसार राजीव गांधी को मारने की साजिश नवंबर 1990 में श्रीलंका के जाफना में बनी थी। इस दौरान घने जंगलों में लिट्टे चीफ प्रभाकरण और उसके चार साथी बेबी सुब्रह्मण्यम,मुथुराजा,मुरूगन और शिवरासन इस साजिश में शामिल रहे थे और यहीं पर राजीव गांधी की हत्या के लिए मानवबम धनू का सहारा लेने का फैसला हुआ लिया गया था।
जांच अधिकारी डी. आर कार्तिकेयन के मुताबिक महात्मा गांधी और इंदिरा गांधी की हत्या से भी ज्यादा राजीव गांधी मर्डर जटिल था क्योंकि इसमें हत्यारे और उसके इरादे के बारे में जानकारी तलाशना बहुत टेढ़ी खीर था। साथ ही यह मामला एक अन्य राष्ट्र से भी जुड़ा था। एसआईटी ने इस कार्य में बड़ी तेजी दिखते हुए सीबीआई,रॉ,कैबिनेट सचिवालय से मिले इंटेलीजेंस इनपुट पर चर्चा के साथ हत्या से पहले तमाम कोड वाले संदेशों के आदान-प्रदान को भी समझने की कोशिश की। ज्यादातर संदेशों का आदान-प्रदान तमिलनाडु के आतंकी संगठनों के बीच हो रहा था। इसके लिए एक कंट्रोल रुम बनाया गया जो 24 घंटे काम करता था। 10 हजार लोगों के बयान लिए गए जबकि 1 लाख से ज्यादा तस्वीरों की स्क्रूटनी भी की. 1477 दस्तावेजों को कोर्ट में सुबूत के तौर पर पेश किया गया। जांच कि दृष्टि से यह बेहद जटिल केस था लेकिन एसआइटी ने एक साल के भीतर 20 मई 1992 को चार्जशीट पेश कर दी थी। इस आत्मघाती बम हमले में कुल 18 लोगों की मौत हो गई। इसमें राजीव गांधी के निजी सुरक्षा अधिकारी,एसपी,पत्रकार और कई अन्य लोग शामिल थे। इसके दोषी सरकारों की रहम पर जेल से बाहर आते रहते है। इन्हें राजनीति के साथ सामाजिक प्रश्रय भी मिलता है।
राजीव गांधी के साथ 17 अन्य जो लोग मारे गए थे,उनका न तो किसी को चिंता है न ही परवाह। जबकि नलिनी की बेटी लंदन में रहकर आराम का जीवन यापन कर रही है। राजनीतिक पार्टियां इन्हें अब भी निर्दोष कहती है जबकि राजीव गांधी के पुत्र और सांसद राहुल गांधी की बात उतनी ही प्रासंगिक लगती है ने कि अगर प्रधानमंत्री के हत्यारे छूट सकते है तो आम आदमी न्याय की कैसे उम्मीद कर सकता है। वहीं भाजपा के सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने भी कहा था कि, ये सभी कट्टर आतंकवादी है। यह कहना बेतुका है की देरी से फैसले के कारण उन्हें मानसिक प्रताड्ना हुई। जो लोग उनके द्वारा मारे गए,उनके अधिकारों के बारे में क्या कहेंगे।