नवाचार से स्वावलंबन : परखंदा की महिलाओं ने खस की खुशबू से रची आर्थिक आजादी की नई इबारत

नवाचार से स्वावलंबन : परखंदा की महिलाओं ने खस की खुशबू से रची आर्थिक आजादी की नई इबारत

रायपुर, पारंपरिक कृषि के ढर्रे से बाहर निकलकर जब ग्रामीण महिलाएं नवाचार का रास्ता चुनती हैं, तो सफलता की एक ऐसी कहानी लिखी जाती है जो पूरे प्रदेश के लिए नजीर बन जाती है। छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले अंतर्गत कुरुद विकासखंड की ग्राम पंचायत परखंदा में ऐसा ही एक प्रेरणादायक बदलाव देखने को मिल रहा है। 'सेवा संकल्प अभियान' के तहत यहां गठित ‘धान के कटोरा उत्पादक समिति’ स्व-सहायता समूह की महिलाओं ने औषधीय एवं सुगंधित पौधे खस की खेती को अपनाकर आत्मनिर्भरता की दिशा में एक नया अध्याय रच दिया है।
        ​धान की परंपरागत खेती तक सीमित रहने वाली इन महिलाओं ने जब ढाई एकड़ भूमि पर खस उगाने का निर्णय लिया, तो राह आसान नहीं थी। नई फसल होने के कारण तकनीक, प्रबंधन और देखभाल से जुड़ी कई चुनौतियां सामने आईं, लेकिन समूह की महिलाओं ने सामूहिक श्रम, तकनीकी जानकारी और लगन के बल पर इन सभी मुश्किलों को पार कर लिया। उनकी यह मेहनत रंग लाई और पहली ही कटाई में समूह को 11.20 क्विंटल खस का बंपर उत्पादन प्राप्त हुआ। बाजार में इस उपज को बेचकर महिलाओं ने 1.12 लाख रुपये की सीधी आय अर्जित की। यह आर्थिक सफलता केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने ग्रामीण महिलाओं में यह विश्वास जगाया है कि सही दिशा और सामूहिक प्रयास से खेती को एक लाभप्रद व्यवसाय बनाया जा सकता है।
      ​परखंदा की इस पहल की सबसे बड़ी विशेषता इसका बहुआयामी और पर्यावरण-अनुकूल दृष्टिकोण है। योजना के अंतर्गत गांव में छह एकड़ क्षेत्र में मिश्रित वृक्षारोपण भी किया गया है, जिससे एक ओर जहां हरित आवरण बढ़कर जैव विविधता का संरक्षण हो रहा है, वहीं दूसरी ओर औषधीय फसलों के माध्यम से ग्रामीण परिवारों के लिए नियमित आय के नए रास्ते खुल रहे हैं। पर्यावरण संरक्षण के साथ आजीविका संवर्धन का यह अनोखा समन्वय आज अन्य ग्राम पंचायतों के लिए भी एक अनुकरणीय 'रूरल लाइवलीहुड मॉडल' बनकर उभरा है।
        ​खस की पहली फसल से मिले उत्साहजनक परिणामों के बाद समूह ने अपनी आजीविका के दायरे को और अधिक विस्तार दिया है। वर्तमान में महिलाएं खस के साथ-साथ हल्दी की खेती भी कर रही हैं। इस प्रकार फसल विविधीकरण को अपनाने से किसी एक फसल पर उनकी निर्भरता समाप्त हुई है और पूरे वर्ष आय की निरंतरता बनी रहने की राह आसान हुई है। भविष्य में समूह अपने उत्पादों के मूल्यवर्धन, प्रसंस्करण और संगठित विपणन के जरिए अपनी आय को और बढ़ाने की योजना पर काम कर रहा है।
      ​परखंदा की महिलाओं की यह उपलब्धि केवल 1.12 लाख रुपये की आय की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस सामाजिक-आर्थिक रूपांतरण का प्रतीक है जहां ग्रामीण महिलाएं सरकारी योजनाओं की मात्र लाभार्थी न रहकर आजीविका की मुख्य संचालक बन चुकी हैं। उनके इस सामूहिक प्रयास और नई सोच ने यह सिद्ध कर दिया है कि जब ग्रामीण महिलाओं के संकल्प को अवसर से जोड़ा जाता है, तो खेत सिर्फ फसल ही नहीं उगाते, बल्कि आत्मनिर्भरता और सम्मान का नया भविष्य भी लिखते हैं।