भोज विश्वविद्यालय में रामचरित मानस की चौपाइयों से पढ़ाई जाएंगी विज्ञान की बारीकियां

भोज विश्वविद्यालय में रामचरित मानस की चौपाइयों से पढ़ाई जाएंगी विज्ञान की बारीकियां

भोपाल
रामचरित मानस का धार्मिक पक्ष ताे आम लोग जानते हैं लेकिन इसका पर्यावरण, प्राणी शास्त्र व अन्य तरह के विज्ञान के साथ क्या संबंध है इसका वैज्ञानिक पहलू भी अब आम लोग जान सकेंगे। भोज विश्वविद्यालय देश भर में दूरस्थ शिक्षा के क्षेत्र में ऐसा पहला विवि होगा जिसने रामायण के विभिन्न वैज्ञानिक पहलुओं पर एक साल के डिप्लोमा कोर्स की शुरुआत की है।

खास बात यह है कि इसमें उम्र का कोई बंधन नहीं है। 12वीं पास कोई भी व्यक्ति इसे कर सकता है। इसी से मिलता-जुलता कोर्स अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विवि ने भी शुरू किया है। इसमें भी रामचरित मानस को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से छात्रों को पढ़ाया जा रहा है। भोज विवि ने इस पाठ्यक्रम के लिए कोर्स मटेरियल अयोध्या की रामायण समिति के सहयोग से तैयार किया गया है। मुख्य रूप से इसमें जिन विषयों का समावेश किया।

कोर्स में बताया गया है कि सभी ग्रह आपस में एक दूसरे को गुरुत्वाकर्षण शक्ति से खींचते हैं। ऐसी अवस्था आती है जिसमें से प्रत्येक गृह आकर्षण व विकर्षण के समन्वय से एक निश्चित दूसरी पर स्थित हो जाते हैं।

कोर्स में यह बताया गया है कि तप का अर्थ है अनवरत स्वार्थ रहित प्रेम। क्रिया दो प्रकार की होती है भौतिक और रासायनिक क्रिया। इसके फलस्वरूप ही नए परमाणुओं, अणुओं, यौगिकों, पदार्थों का निर्माण होता है। इसके माध्यम से क्रिया कारक ब्रम्हा इस संसार का सृजन करते हैं। मेटाबालिज्म, केटाबालिज्म आदि की भी व्याख्या की गई है।

एक साल के कोर्स की फीस 3 हजार रुपए है। खास बात यह है कि इसमें कोर्स मटेरियल भी शामिल है। लोग इसे धार्मिक ग्रंथ के रूप से जानते हैं जबकि इसमें विभिन्न विषयों की अवधारणा शामिल है। इसमें विज्ञान भी है और विभिन्न सामाजिक पहलुओं का गहरा समावेश भी है।

कोर्स में बताया गया है कि पर्यावरणीय जागरुकता और चेतना का उदाहरण शिवजी की बारात में मिलता है। बाराती के रूप में शामिल विभिन्न जीव समूह में सुर, असुर, नर, किन्नर, भूत-प्रेत आदि हैं। यह सब जैव विविधता जैसा है। इसमें तीसरे नेत्र के खुलने को भी समझाया गया है।