बदला समीकरण, ग्वालियर में भाजपा प्रतिष्ठा बचाने की चुनौती

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भोपाल, वैसे तो ज्योतिरादित्य सिंधिया के भाजपा में जाने से हर उस विस सीट पर समीकरण बदल चुके हैं, जहां उपचुनाव होने हैं, लेकिन इनमें सबसे खास है ग्वालियर सीट। यहां सियासत सिंधिया के इर्द-गिर्द ही रही। सिंधिया कांग्रेस की ताकत रहे, तो उनका विरोध भाजपा की राजनीतिक जमीन। अब सब बदल चुका है। यहां दिग्गज भाजपा के पाले में हैं, तो कांग्रेस को सिंधिया के विरोध में नई शुरुआत करनी होगी। 2018 में विस चुनाव में कांग्रेस के टिकट से विधायक बने प्रद्युम्न सिंह तोमर अब भाजपा में हैं और शिवराज कैबिनेट में ऊर्जा मंत्री हैं। भाजपा से उन्हे टिकट मिलना तय है। ऐसे में भाजपा की प्रतिष्ठा दांव पर रहेगी।

तोमर की जीत की राह आसान
ऊर्जा मंत्री प्रद्युम्न सिंह तोमर दूसरी बार विधायक बने थे। वे 2008 में पहली बार विधायक चुने गए थे और 2018 में उन्होंने भाजपा प्रत्याशी जयभानसिंह पवैया को 21,044 वोट से हराया था। इस सीट पर 12,610 मत वोटकटवा उम्मीदवारों को मिली थी। भाजपा सूत्रों का कहना है कि पार्टी के आकलन में यहां उपचुनाव में वोटकटवा उम्मीदवारों का अधिक प्रभाव नहीं रहेगा। 2018 में इस सीट पर 21 प्रत्याशी मैदान में थे और कुल 1,75,676 वोट पड़े थे। तोमर को 92,055, पवैया को 71,011 और बसपा प्रत्याशी सावित्री कटारिया को 4,596 वोट मिले थे।
ग्वालियर विस सीट के परिणाम पर जातीय समीकरण भी प्रभाव रखते रहे हैं। सामान्य के लिए सुरक्षित इस सीट पर 14.7 प्रतिशत ठाकुर, 14 प्रतिशत मुस्लिम, 8.1 प्रतिशत कुशवाह, 7 प्रतिशत कोरी, 6.6 प्रतिशत यादव और 6.3 प्रतिशत ब्राह्मण हैं। होने वाले उपचुनाव में ग्वालियर विस सीट की सियासी तस्वीर समझने के लिए पिछले तीन दशक के चुनावों का विश्लेषण करें, तो भाजपा और कांग्रेस के बीच कड़ी टक्कर देखने को मिलती है। दोनों ने तीन-तीन बार जीत दर्ज की है। केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर का चुनावी कैरियर यहीं से शुरू हुआ, जबकि जयभान सिंह पवैया विस चुनाव ही जीत सके।

1993 में भाजपा के टिकट पर नरेंद्र सिंह तोमर ने कांग्रेस के रघवीर सिंह बनवार सिंह को कड़ी टक्कर दी, जिसमें तोमर महज 681 वोटों से हार गए। तोमर को 34.1 प्रतिशत तो सिंह को 35 प्रतिशत वोट मिले थे। तोमर ने 1998 में जबरदस्त प्रदर्शन करते हुए 49.1 प्रतिशत यानी आधा वोट हासिल करते हुए 25.9 प्रतिशत के बड़े अंतराल से निर्दलीय अशोक कुमार शर्मा को हराया। इस चुनाव में कांग्रेस नहीं थी।

इस सीट का ग्वालियर संसदीय सीट से हमेशा से जुड़ाव रहा है। यहां की लोकसभा सीट में आठ विस क्षेत्र आते हैं, लेकिन ग्वालियर विस सीट ही है, जहां से विधायक बनकर नेता संसद तक का सफर करने की कोशिश करते रहे हैं। तोमर और पवैया ने अलग-अलग चुनावों में दोनों सीटों पर आजमाइश की। इसका सियासी नफा रहा कि भाजपा यहां लगातार धमक बनाए रखने में कामयाब रही है।

2003 के विस चुनाव में तोमर ने इस सीट पर कब्जा बनाए रखा। उन्होंने एक बार फिर 49 प्रतिशत वोट हासिल कर कांग्रेस के बालेंदु शुक्ला को 26.3 प्रतिशत वोट से चित किया। अगले साल 2004 में लोकसभा चुनाव हुए तो कांग्रेस के रामसेवक सिंह ने भाजपा के जयभान सिंह पवैया को 6.4 प्रतिशत मतों से हरा दिया।
इस हार से पवैया को लोकसभा में दावेदारी से दूर कर दिया गया। वह 2008 के विस चुनाव में ये सीट न बचा सके। कांग्रेस के प्रद्युम्न सिंह तोमर (37.8त्न) ने पवैया को कड़े मुकाबले में महज 2,090 वोटों से हरा दिया। हालांकि इस चुनाव में उमा भारती की भारतीय जनशक्ति पार्टी भी थी, जिसे 4.7प्रतिशतवोट मिले थे। अगले ही साल 2009 में हुए लोकसभा चुनाव में यशोधरा राजे सिंधिया ने ग्वालियर सीट बचाई, जबकि मुरैना से तोमर सांसद बने।

अंतत: 2013 में जयभान सिंह पवैया की मेहनत रंग लाई और विस चुनाव में 48.5प्रतिशतवोट के साथ उन्होंने कांग्रेस के प्रद्युम्न सिंह तोमर को 10.1प्रतिशतवोट से हराया। इधर 2014 में लोकसभा चुनाव में तोमर ने फिर ग्वालियर सीट का रूख किया और सांसद बने।

हालांकि पवैया अपनी सीट बचा नहीं सके। 2018 के विस चुनाव में प्रद्युम्न सिंह तोमर ने उन्हें 12.1प्रतिशतवोटों से हरा दिया। जबकि अगले साल हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा ग्वालियर संसदीय सीट बचाने में कामयाब रही, जहां से विवेक नारायण शेजवलकर सांसद बने। तोमर फिर से मुरैना लौट गए और वहीं से सांसद बने।

कहा जा सकता है कि ग्वालियर विस सीट पर जीत भाजपा के साथ इसके दिग्गजों की प्रतिष्ठा से जुड़ा है, जबकि कांग्रेस अब बिना सिंधिया के इस सीट पर भाजपा से दो-दो हाथ करेगी, चूंकि यहां बीएसपी का कोई खास प्रभाव नहीं है, इसलिए मुकाबला आमने-सामने का ही होना है।

विकास के मुद्दे भी उठते रहे हैं। क्षेत्र में जेसी मिल, ग्रेफीम, खिमको, स्टील कवाड़ी जैसी कंपनियाँ बंद पड़ी है। मांग की जाती रही है कि इन्हें फिर से चालू किया जाए, जिससे बेरोजगारी दूर हो सके। इस शहर को स्मार्ट सिटी के लिए चुना गया, लेकिन काम नहीं हुआ। ऐतिहासिक इमारतों के होने से पर्यटन के क्षेत्र में यहां काफी संभावनाएं हैं, लेकिन इस दिशा में काफी काम होना बाकी है।