मोदी के सपनों को पलीता लगाती गिरती हुई जीडीपी, कैसे पूरा होगा 5 ट्रिलियन डॉलर इकॉनमी का सपना

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नई दिल्ली, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2024 तक भारत को 5 ट्रिलियन डॉलर की इकॉनमी बनाने का लक्ष्य रखा है। लेकिन चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में जीडीपी में रेकॉर्ड गिरावट ने कई वर्षों की आर्थिक प्रगति पर एक झटके में पानी फेर दिया और प्रधानमंत्री के सपने को लगभग नामुमकिन बना दिया है। जून तिमाही में देश की जीडीपी में 23.9 फीसदी की गिरावट आई है जो दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में सबसे बड़ी गिरावट है। इसके कारण नोमूरा होल्डिंग्स इंक जैसे बैंकों ने चालू वित्त वर्ष के लिए भारत की जीडीपी के अनुमान को घटाकर -10.8 फीसदी कर दिया है। इससे एक बार फिर सबकी नजरें सरकार और आरबीआई पर टिक गई हैं कि विकास को गति देने के लिए अब वे क्या उपाय करते हैं। देश ने कई वर्षों तक 8 फीसदी से अधिक की वृद्धि दर हासिल की लेकिन हाल के सालों में बैंकिंग संकट के कारण इकॉनमी में उधारी और खपत प्रभावित हुई। अब कोरोना वायरस संक्रमण के कारण इकॉनमी को जो नुकसान हुआ है, उससे उबरने में लंबा समय लगेगा। बैड लोन बढ़ने की आशंका से बैंक कर्ज देने से कतरा रहे हैं जबकि कंपनियों ने कर्ज और निवेश में कमी कर दी है जिससे मांग घट गई है।

क्या कर सकता है आरबीआई?
आरबीआई ने इकॉनमी को सहारा देने के लिए किए गए प्रोत्साहन उपायों का बोझ उठाया है। उसने नीतिगत दरों में 115 अंकों की कटौती की है, बॉन्ड खरीद और ऑपरेशन ट्विस्ट जैसे लिक्विडिटी ऑपरेशंस के जरिए फाइनेंशिल सिस्टम में पैसे डाले और सरकार को लाभांश के तौर पर अरबों डॉलर ट्रांसफर किए। सोमवार को केंद्रीय बैंक ने बॉन्ड मार्केट को सहारा देने के लिए अतिरिक्त उपाय किए। बैंकों को सरकारी प्रतिभूतियों को अपने पास रखने के लिए कई तरह की छूट दी और अरबों डॉलर का अतिरिक्त फंड देने की घोषणा की। जहां तक पंरपरागत मौद्रिक नीती की बात है तो आरबीआई के पास सीमित गुंजाइश है। बैंकों ने दरों में कटौती का फायदा ग्राहकों तक पहुंचाने में तेजी नहीं दिखाई है। इसकी वजह यह है कि फंसे कर्ज के कारण क्रेडिट ग्रोथ नहीं हो पा रही है। महंगाई 6 फीसदी के उपर चली गई है और आरबीआई सतर्क रुख दिखा रहा है।

सरकार के पास क्या राजकोषीय विकल्प हैं?
कोरोना संकट ने इकॉनमी को बेहाल कर दिया है और इसे पटरी पर लाने के लिए सरकार ने 21 लाख करोड़ रुपये के पैकेज की घोषणा की है। लेकिन इसमें अधिकांश उपाय सीधी मदद देने के बजाय छोटे और मझोले कारोबारियों को क्रेडिट सपोर्ट पर फोकस हैं। कुछ अर्थशास्त्रियों का कहना है कि सरकार को एक युनिवर्सल बेसिक इनकम ग्रांट मुहैया करानी चाहिए और आरबीआई को राजकोषीय घाटे को फाइनेंस करना चाहिए। सरकार ने इसे जीडीपी का 3.5 फीसदी रखने का लक्ष्य तय किया है लेकिन यह इससे दोगुना हो सकता है।