राष्ट्रीय फिल्म अवॉर्ड विवाद पर शत्रुघ्न सिन्हा बोले, 'यह नहीं होना चाहिए था क्योंकि…'

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मुंबई
राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह में पुरस्कारों को पाने के वावजूद अधिकांश विजेताओं के चेहरे उदास थे, कुछ निराश और भरे मन से ये अवार्ड ले रहे थे और कुछ इन पुरस्कारों का विरोध कर रहे थे और बहुत से लोगों ने इसका बहिष्कार तक कर दिया। इशी बीच अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा ने बयान दिया है जो कि काफी चर्चा में है।

शत्रुघ्न सिन्हा ने हाल ही में राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह में हुए विवाद पर दुख जताते हुए उसे दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया है। बता दें कि जब विजेता राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार पाने राष्ट्रपति भवन पहुंचे, तो उन्हें राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के हाथों अवॉर्ड नहीं मिला, जिससे वह नाराज हो गए। इस पुरस्कार समारोह में विभिन्न श्रेणियों में कुल 131 विजेताओं को सम्मानित किया जाना था, लेकिन गुरुवार को इनमें से 78 हस्तियां ही पहुंचीं। 53 विजेता अपना पुरस्कार लेने नहीं पहुंचे। ऐसा उन्होंने राष्ट्रपति के बजाय सूचना व प्रसारण मंत्री स्मृति ईरानी के हाथों पुरस्कार दिए जाने के विरोध में किया।  

इस पर शत्रुघ्न सिन्हा ने समारोह में राष्ट्रपति की सीमित उपस्थिति के कारण समारोह का बहिष्कार करने वाले पुरस्कार विजेताओं का दर्द साझा किया है। सिन्हा ने कहा, 'जो भी हुआ, बहुत दुर्भाग्यपूर्ण था और इसे टाला जा सकता था। मैं राष्ट्रपति को व्यक्तिगत रूप से जानता हूं। वह बिहार के राज्यपाल हुआ करते थे और एक अच्छे इंसान हैं। मैं आश्वस्त हूं कि उनका उद्देश्य किसी को दुखी करने का नहीं था। दुर्भाग्यवश, गलतफहमी के कारण कई लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंची। यह नहीं होना चाहिए था। देश के कलाकार राष्ट्रीय गर्व हैं। आप उन्हें राष्ट्रपति के हाथों पुरस्कृत करने के लिए आमंत्रित कर किसी और के हाथों से पुरस्कार वितरण नहीं करा सकते।’

उन्होंने कहा, '‘वह बीजेपी की एक योग्य सदस्य हैं। हालांकि ये पुरस्कार राष्ट्रपति के हैं। ये राष्ट्रपति के अलावा किसी अन्य के द्वारा वितरित नहीं किए जा सकते। और कुछ ‘विशेष चयनित पुरस्कारों’ को राष्ट्रपति द्वारा व्यक्तिगत रूप से ही दिया जाता है।’ शत्रुघ्न सिन्हा ने राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद पर कोई आरोप लगाए बिना आश्चर्य जताया कि वह प्रत्येक व्यक्ति को पुरस्कार वितरित करने के लिए पर्याप्त समय क्यों नहीं दे सके?

उन्होंने कहा, 'महिला राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल सहित सभी राष्ट्रपतियों ने प्रत्येक विजेता को बिना किसी परेशानी के पुरस्कार दिया है। इस बार यह परंपरा कैसे टूट गई? क्या ऐसी व्यवस्था राष्ट्रपति को देश के सर्वश्रेष्ठ कलाकारों को सम्मानित करने के गौरवशाली कार्य से दूर कर सकती है?’

गौरतलब है कि अब प्रोटोकॉल और नियम पर तो टिपण्णी नहीं बनती। लेकिन इतना ज़रुर है कि राष्ट्रीय पुरस्कार स्वयं राष्ट्रपति ही प्रदान करें तो उनकी गरिमा और प्रतिष्ठा बनी रहती है। आख़िर राष्ट्रीय पुरस्कार अधिकांश लोगों के लिए अपने जीवन की, अपने कार्य क्षेत्र की उपलब्धियों का स्वर्णिम पल होता है, जिसे हर कोई संजो कर रखना चाहता है।