दो रुपए के फेर में ब्लैकलिस्टेड कंपनी से रिजल्ट बनबाने की तैयारी में BU

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भोपाल
बरकतउल्ला विश्वविद्यालय उचित मापदंड से कम्प्यूटर से प्रशिक्षित कर्मचारियों से सभी परीक्षाओं का रिजल्ट तैयार करने की तैयारी में लग गया है। जबकि दो रुपए के फेर में बीयू सही कंपनी को रिजल्ट तैयार करने का ठेका नहीं देना चाहती हैं। जबकि शासन रिजल्ट समय पर देने आदेश जारी कर चुका है और बीयू अभी तक रिजल्ट तैयार करने वाली कंपनी का चयन नहीं कर सकी है। आज कंपनी का चयन करने कार्यपरिषद की आकस्मिक बैठक रखी गई है।

बीयू को यूजी और पीजी में प्रथम से अंतिम सेमेस्टर और वर्ष में प्रवेशित करीब तीन विद्यार्थियों का रिजल्ट तीस अक्टूबर तक जारी करना है, लेकिन बीयू रिजल्ट तैयार करने वाली कंपनी का चयन तक नहीं कर सकता है। बीयू ने रिजल्ट तैयार करने टेंडर बुलाए थे। इसमें तीन कंपनी सामने आई हैं। इसमें वर्तमान ओसवाल, डीएमसी नागपुर और मुंबई की एक कंपनी शामिल हैं। अधिकारी ब्लैक लिस्टेड ओसवाल कंपनी से रिजल्ट बनबाने की तैयारी कर रहा है। क्योंकि उसके रेट दूसरी कंपनी से दो रुपए कम हैं।

तिहाडी मजदूर बने आपरेटर
ओसवाल कंपनी के पास बिल्डिंग का बड़े स्तर का कार्य है। इसके साथ वह रिजल्ट बनाने का ठेका भी लेता है। इसलिए वह तिहाड़ी मजदूर को कम्प्यूटर आपरेटर बताकर टेंडर लेता है। जबकि नियमानुसार रिजल्ट तैयार करने का ठेका लेने के लिए कंपनी में पचास कर्मचारी और उनका वेतन 21 हजार मासिक होना अनिवार्य है। ओसवाल कंपनी से विक्रम विवि उज्जैन का रिजल्ट बनाने का ठेका लिया है। रिजल्ट में गड़बड़ी होने पर करीब एक दर्जन नोटिस दे दिए गए हैं, जिसका सुधार अभी तक नहीं हो सका है।   

तीस सितंबर तक जारी करना थे रिजल्ट
उच्च शिक्षा विभाग ने सभी विवि को आदेश दिए हैं। वे यूजी में प्रथम व द्वितीय तथा पीजी के चतुर्थ छोड सभी सेमेस्टर के रिजल्ट तीस सितंबर तक जारी करना है, लेकिन बीयू अभी तक रिजल्ट बनाने वाली एजेंसी ही फाइनल नहीं कर सका है।

ऐसे आया दो रुपए का फर्क
टेंडर में ओसवाल कंपनी ने एक विद्यार्थी का रिजल्ट तैयार की शुल्क तीस रुपए दिया है। जबकि डीएमसी नागपुर ने 32 रुपए दिया है। डीएमसी के पास प्रशिक्षित कर्मचारियों साथ मर्कशीट की गुणवत्ता और अन्य सुविधाएं मौजूद हैं। इसके बाद भी बीयू उसे नजर अंदाज कर रहा है। जबकि बीयू उससे कुछ वर्षों से रिजल्ट बनवा रहा है। सिर्फ दो रुपए के फर्क के चलते डीएमसी की गुणवत्ता और सुविधाओं को नजरअंदाज किया जा रहा है।