स्व. कैलाश जोशी के गढ़ हाटपिपलिया में आसान नहीं होगी मनोज चौधरी की राह

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भाजपा में असंतोष करेगा कांग्रेस की राह आसान

भोपाल। हाटपिपलिया विधानसभा सीट का उपचुनाव भाजपा को अपने ही गढ़ में राजनीतिक रूप से मुश्किल चुनौती साबित हो रहा है। हाटपीपल्या सीट प्रदेश की राजनीति में संत माने गए स्वर्गीय कैलाश जोशी की जन्मस्थली भी है। इस विधानसभा क्षेत्र के चप्पे-चप्पे पर स्वर्गीय कैलाश जोशी का प्रभाव है। यह उन्हीं का नैतिक आभामंडल था कि 1977 में अस्तित्व में आने के बाद से हुए 10 चुनाव में भाजपा हाटपीपल्या से 6 बार विजयी रही है। भाजपा ने यदि शिवराज सिंह चौहान के पिछले कार्यकाल में स्कूली शिक्षा राज्य मंत्री रहे दीपक जोशी की नाराजगी को दूर नहीं किया तो इस उपचुनाव में उसके पहले से ही तय उम्मीदवार मनोज चौधरी की राह बेहद मुश्किल साबित हो सकती हैं।

 

कांग्रेस की ओर से तीन बार विधायक रहे राजेंद्र सिंह बघेल के पुत्र राजवीर सिंह बघेल को प्रत्याशी बनाया गया है। बघेल परिवार पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह खेमे के माने जाते हैं। 73 वर्षीय पूर्व विधायक राजेंद्र सिंह बघेल ने अपने खराब स्वास्थ्य के कारण राजवीर सिंह को आगे किया है। राजवीर सिंह दो बार सोनकच्छ नगरपालिका के निर्दलीय के रूप में अध्यक्ष निर्वाचित हो चुके हैं। बघेल परिवार में मूलत: सोनकच्छ विधानसभा का ही निवासी है, लेकिन चूंकि सोनकच्छ सीट अनुसूचित जाति के लिए सुरक्षित है। इसलिए दिग्विजय सिंह ने राजपूतों के दबदबे वाली हाटपिपलिया सीट पर 1985 में पहली बार ठाकुर राजेंद्र सिंह बघेल को टिकट दिया था जो कांग्रेस की लहर में उस चुनाव में जीते भी थे। देवास जिले की कांग्रेसी राजनीति में पिछले तीन दशकों से राजेंद्र सिंह बघेल और सज्जन सिंह वर्मा गुटों में तीव्र मतभेद रहे हैं। बदली हुई राजनीतिक परिस्थिति के कारण ऐसा पहली बार है कि बार खुद सज्जन सिंह वर्मा, बघेल परिवार का समर्थन कर रहे हैं। इस कारण भी कांग्रेस इस बार बेहद मजबूत स्थिति में दिख रही है।

3 बार हुआ सर्वे, तीनों बार राजवीर आगे
प्रदेश कांग्रेस ने प्रत्याशी चयन के लिए 3 बार विधानसभा क्षेत्र में सर्वे कराया, जिसमें बघेल तीनों बार आगे रहे। खाती समाज के तंवरसिंह चौहान को कमलनाथ सरकार में दुग्ध संघ अध्यक्ष बनाया गया था, उन्हें सरकार बनने पर सम्मान की बात कही गई है। सैंधव समाज के अशोक पटेल को पार्टी का जिलाध्यक्ष (ग्रामीण) बना दिया। पाटीदार समाज के बाबूलाल चौधरी को ब्लॉक अध्यक्ष बना दिया गया है। ज्यादा वोटर वाले सभी समाज के नेताओं को कांग्रेस ने साधने की कोशिश की है, ताकि वोट ना कटें। राजवीर पहली बार विधानसभा स्तर का चुनाव लड़ेंगे। भाजपा से मनोज चौधरी का चुनाव लडऩा तय है। वे खाती समाज से आते हैं। इस समाज के कुल वोटों में लगभग 15 प्रतिशत वोटर हैं। जबकि बघेल राजपूत समाज से आते हैं। पूरे विधानसभा क्षेत्र में 12 से 13 प्रतिशत वोट राजपूत समाज के हैं।

मनोज चौधरी को भितरघात से खतरा
देवास जिले की हाटपिपल्या सीट पर मनोज चौधरी भाजपा के दीपक जोशी को 13,519 से हराकर पहली बार विधायक बने थे। जबकि वोटकटवा उम्मीदवारों को 6,654 वोट मिले थे। अब चौधरी भाजपा में आ गए हैं। उपचुनाव में उन्हें भितरघात का खतरा है। 2018 में इस सीट पर कुल 1,59,809 वोट पड़े थे। यहां 8 प्रत्याशी मैदान में थे। मनोज चौधरी को 83,337, जोशी को 69,818 और बसपा के संतोष खंगोले को 2,347 वोट मिले थे।

हमेशा रहा है राजपूत-सैंधव-ब्राह्मण का कब्जा
हाटपीपल्या विधानसभा सीट वर्ष 1977 में अस्तित्व में आई थी। वर्ष 2018 का चुनाव छोड दें तो इसके पहले के 9 विधानसभा चुनावों में यहां पर राजपूत, सैंधव व ब्राह्मण समुदाय का कब्जा रहा है। पहले दो चुनावों में आमलाताज के जागीरदार परिवार के तेजसिंह सैंधव विधायक निर्वाचित हुए। वर्ष 1985 के चुनाव में सोनकच्छ निवासी राजपूत राजेन्द्रसिंह बघेल ने उन्हें पराजित कर दिया। उसके बाद बघेल और सैंधव की प्रतिद्वंद्विता 1998 के विधानसभा चुनाव तक चली। वर्ष 1990 व 1998 में सैंधव जीते तो वर्ष 1993 व 2003 में बघेल जीते। वर्ष 2003 में भाजपा ने सरस्वती शिशु मंदिर के प्राचार्य रायसिंह सैंधव को टिकट दिया था। लेकिन वे बघेल से हार गए। लेकिन बाद में भाजपा संगठन के पदाधिकारियों से नजदीकी के चलते देवास विकास प्राधिकरण और पाठ्य पुस्तक निगम के अध्यक्ष भी रहे। बागली विधानसभा सीट एसटी आरक्षित होने के बाद पूर्व तकनीकी एवं स्कूल शिक्षा मंत्री दीपक जोशी ने हाटपीपल्या का रुख किया और वर्ष 2008 व 2013 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के बघेल को हराया। वर्ष 2018 के चुनाव में ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अपने समर्थक मनोज चौधरी को टिकट दिलवाया और उनके पक्ष में सभा भी संबोधित की। चौधरी जिला पंचायत देवास के पूर्व अध्यक्ष नारायणसिंह चौधरी के पुत्र हैं और युवक कांग्रेस में कार्य कर रहे थे। चौधरी के पिता ने वर्ष 2008 के चुनावों में निर्दलीय खड़े होकर अपनी किस्मत आजमाई थी। लेकिन वे तीसरे क्रम पर रहे थे। अपने पिता का चुनाव मैनेजमेंट संभाल चुके चौधरी के सामने जोशी कद्दावर चेहरा थे। लेकिन, नवोदित होने के बाद भी वे मतदाताओं को अपने पक्ष में करने में सफल रहे थे। चर्चा करने पर चौधरी ने कहा कि जिन कार्यकर्ताओं ने मेरे लिए सब कुछ त्याग दिया उन सभी से सिंधियाजी ने बात की है। आगामी दिनों में भी वे कार्यकर्ताओं के संपर्क में रहेंगे। वहीं, भाजपा पदाधिकारियों का कहना है कि हमारा कुनबा बढ़ रहा है। पार्टी जिसे भी चुनेगी हम उस के साथ रहेंगे। हालांकि सिंधियाजी के फोन से यह स्पष्ट हो गया है कि चौधरी के भाजपा का दामन थामने के बाद कार्यकर्ता स्वयं को ठगा हुआ महसूस ना करें और नए संगठन में चौधरी के मूल समर्थकों को तरजीह मिले।

छह बार भाजपा और चार बार कांग्रेस जीती
भारतीय जनसंघ घटक के कार्यकर्ता और स्वर्गीय कैलाश जोशी के राजनीतिक शिष्य तेज सिंह सेंधव 1977 में जनता पार्टी के टिकट पर पहली बार चुनाव लड़े और जीते। 1980 कि कांग्रेस लहर में भी यहां से तेज सिंह सेंधव ने ही विजयश्री प्राप्त की। 1985 में कांग्रेस ने ठाकुर राजेंद्र सिंह बघेल को टिकट दिया जो पर्याप्त अंतर से चुनाव जीते। 1990 और 1998 में फिर से तेज सिंह सेंधव ने जीत हासिल की। जबकि 1993 और 2003 के विधानसभा चुनाव में राजेंद्र सिंह बघेल ने भाजपा को हराया। 2008 और 13 में स्वर्गीय कैलाश जोशी के सुपुत्र दीपक जोशी यहां से जीते। जबकि 2018 में कांग्रेस के मनोज चौधरी ने भाजपा के दीपक जोशी को पराजित किया।

खाती, राजपूत, सेंधव और पाटीदार समाज का दबदबा
हाटपिपलिया विधानसभा क्षेत्र में चंद्रवंशी खाती समाज के करीब 25 हजार मतदाता हैं। करीब 20 हजार मतदाता ठाकुर हैं, जबकि करीब 15- 15 हजार मतदाता सेंधव और पाटीदार समाज के हैं। मुस्लिम 22,000, ब्राह्मण 5,000 अन्य समाज के 70,000 मतदाता हैं। चंद्रवंशी खाती समाज परंपरागत रूप से कांग्रेसी रहा है। बघेल परिवार के कारण पिछले दो दशकों से राजपूतों के वोट भी कांग्रेस को मिलते रहे हैं। जबकि पाटीदार और सेंधव समाज परंपरागत रूप से संघ और भाजपा समर्थक रहा है।