हाईकोर्ट के फैसले को लेकर खासगी ट्रस्ट के संचालकों में असंतोष, सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर करेंगे

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ट्रस्ट के सचिव राठौर ने फैसले की टिप्पणियों पर आपत्ति जताई

इंदौर। हाईकोर्ट के फैसले को लेकर खासगी ट्रस्ट के संचालकों में असंतोष है। उनका कहना है कि वे अदालत के फैसले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर करेंगे। ट्रस्ट की संपत्ति के विक्रय को लेकर दिए गए फैसले और की गई टिप्पणी पर एतराज जताते हुए ट्रस्ट के वकील जहां सर्वोच्च न्यायालय की शरण में जाने की तैयारी कर रहे हैं, वहीं ट्रस्ट के सचिव का कहना है कि कोर्ट के फैसले से ईमानदारी से काम कर रहे ट्रस्ट संचालकों का अपमान हुआ है। अदालत ने ट्रस्ट द्वारा दिए गए कई तर्कों पर विचार नहीं किया हैै, जिसे लेकर सर्वोच्च न्यायालय मेें अपील दायर की जाएगी।

ट्रस्ट के सचिव राठौर ने कहा कि खासगी ट्रस्ट की संपत्ति विक्रय के हर फैसले पर संभागायुक्त से लेकर शासन के प्रतिनिधियों तक के हस्ताक्षर थे। वहीं शासन के ही सर्वोच्च पद पर आसीन प्रमुख सचिव द्वारा ट्रस्ट डीड में संशोधन कराकर संपत्तियों के विक्रय का अधिकार ट्रस्ट को सौंपा गया था। इसके बावजूद ट्रस्ट द्वारा हर फैसला समस्त ट्रस्टियों की बैठक में लिया गया, जिसमें इंदौर के संभागायुक्त से लेकर शासन के प्रतिनिधि भी शामिल रहे। हर प्रस्ताव में संपत्ति की स्थिति की जानकारी देते हुए विक्रय के लिए आए प्रस्तावों पर विचार के उपरांत सामूहिक रूप से फैसला लिया गया। शासन द्वारा दायर किए गए वाद में ट्रस्ट द्वारा हर स्थिति की जानकारी ट्रस्ट ने अपने जवाब दावे में वकीलों के माध्यम से प्रस्तुत कराई थी, जिनमें से कई स्थितियों का परीक्षण नहीं किया गया। इस कारण अदालत द्वारा दिए गए फैसले में कई खामियां नजर आती हैं। इसी को लेकर ट्रस्ट द्वारा सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने की तैयारी की जा रही है। ट्रस्ट के सचिव ने कहा कि शासन द्वारा प्रारंभिक वर्षों में खासगी संपत्तियों के रखरखाव के लिए मात्र 2 लाख रुपए से कम की राशि दी जाती थी और बाद में तो कई वर्षों से उक्त राशि भी ट्रस्ट को नहीं दी जा रही है। ट्रस्ट द्वारा खासगी संपत्तियों का संचालन संपत्तियों के किराए से मिलने वाली राशि के साथ ही प्रमुख ट्रस्टी महारानी उषाराजे के परिवार के खुद के पैसों से किया जा रहा है। ट्रस्ट द्वारा उन्हीं संपत्तियों का विक्रय किया गया, जिन पर वर्षों से लोगों का कब्जा रहा और वे न तो किराया दे रहे थे और न ही प्रशासन द्वारा उनके कब्जे हटाए जाने के लिए कोई कार्रवाई की जा रही थी।

महाराजा और महारानी ने अपना सबकुछ इंदौर को समर्पित किया
ट्रस्ट के सचिव राठौर का कहना है कि महारानी के परिवार पर 100-200 करोड़ की संपत्तियों को औने-पौने दामों में बेचे जाने का आरोप लगाया जा रहा है। उन्हीं महारानी के परिवार ने इंदौर की जनता के लिए अपना सबकुछ समर्पित कर दिया। उन्होंने बताया कि विभाजन के बाद भारत सरकार के कोविनेंट के जरिए इंदौर शहर की असीम संपदा महारानी के नाम पर की गई थी, जिसमें कलेक्टोरेट से लेकर भंवरकुआं, फलबाग और राजेन्द्र नगर तक की पूरी भूमियों के अलावा राजबाड़ा, लालबाग पैलेस से लेकर शहर की कई संपत्तियां शामिल थीं। लेकिन महारानी ने महाराजा यशवंतराव होलकर के रहते जहां एमवाय हास्पिटल सरकार को सौंपा, वहीं उनके अवसान के बाद वारिस के तौर पर मिली सारी संपत्तियां अपने निजी ट्रस्ट में शामिल कर शहर के लिए समर्पित करना शुरू की। इंदौर में यूनिवर्सिटी की स्थापना के लिए उन्होंने आरएनटी मार्ग स्थित अपनी भूमि जहां शासन को सौंप दी, वहीं लालबाग पैलेस भी शासन को सौंप दिया। इंदौर में जब कैट जैसे वैज्ञानिक अनुसंधान केन्द्र का शुभारंभ करने की बात शुरू हुई तो जिला प्रशासन ने महारानी के स्वामित्व की 300 एकड़ जमीन मांगी। इस जमीन की कीमत आज की तारीख में हजारों करोड़ रुपए है, लेकिन महारानी ने बिना कुछ सोचे-समझे इंदौर शहर को मिल रही उपलब्धि के लिए अपने स्वामित्व की भूमि शासन के नाम कर दी, जिस पर आज कैट बना हुआ है। इसके अलावा इंदौर के बाल विनय मंदिर से लेकर कई स्कूल महारानी के निजी ट्रस्ट की भूमि पर संचालित हो रहे हैं। महारानी की कोविनेंट में मौजूद कई संपत्तियां आज भी शासन के नाम पर चढ़ी हुई होकर उनके काम आ रही हैं, जिन पर कभी महारानी ने अपने स्वामित्व का दावा ही नहीं किया। उन्होंने कहा कि महाराजा यशवंतराव होलकर के बाद महारानी और उनके पति सतीश मल्होत्रा उदार भाव से शहर के लिए समर्पित रहे। इंदौर की महारानी होने के बावजूद न उनके पास कोई महल बचा है और न ही कोई संपदा। वे माणिकबाग रोड स्थित एक छोटी सी निजी भूमि पर ट्रस्ट का कार्यालय संचालित करते हुए एक छोटे से मकान में अपने प्रवास के दौरान रुकती हैं।