बदनावर में आसान होगी राह या बगावत के भंवर में फंसेंगे दत्तीगांव

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बगावत के भंवर और निजी आस्था का मुकाबला

बदनावर में राज्यवर्धन को भितरघात का सामना

भोपाल। मध्यप्रदेश की 28 सीटों पर उपचुनाव होने हैं। धार जिले की बदनावर इस वक्त सबसे चर्चित सीट है। पिछले चुनाव में यहां मुकाबला भाजपा के भंवरसिंह शेखावत और कांग्रेस के राज्यवर्धन सिंह दत्तीगांव के बीच हुआ। इस मुकाबले में भाजपा से बगावत करके राजेश अग्रवाल मैदान में उतरे। अग्रवाल ने 35000 से ज्यादा वोट हासिल किया। उनके मैदान में उतरते ही भाजपा की हार तय सी दिख रही थी। अब खुद राज्यवर्धन सिंह दत्तीगांव भाजपा है। भाजपा के वरिष्ठ नेता कैलाश विजयवर्गीय ने पिछले चुनाव के बागी राजेश अग्रवाल को फिर से भाजपा में शामिल कर लिया। इससे तमतमाए भंवरसिंह शेखावत ने कैलाश और पार्टी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि राजेश अग्रवाल को उनके खिलाफ कैलाश विजयवर्गीय ने ही खड़ा किया था। बदनावर से चुनाव लडऩे वाले राज्यवर्धन सिह अब शिवराज सरकार के मंत्री भी है। भाजपा का साथ है, ऐसे में अभी उनका पलड़ा भारी दिख रहा है।

1957 में यहां पहली बार उपचुनाव हुआ था इसके बाद कभी भी उपचुनाव नहीं हुआ। राजपूतों के बाहुल्य वाले इस विधानसभा क्षेत्र में पिछले तीन दशक से जातिवाद हावी रहा है। जातिगत समीकरणों को चलते ही दोनों दल प्रत्याशियों को टिकट देते रहे हैं। बदनावर में राजपूत समाज के 28000 से अधिक मतदाता हैं। यहां से केवल एक बार पाटीदार समाज के भाजपा प्रत्याशी खेमराज पाटीदार जीते हैं। समाज के करीब 24 हजार मतदाता हैं। 6 बार राजपूत, 3 बार ब्राह्मण, 2 बार वैश्य, 1 बार कायस्थ समाज के प्रत्याशियों ने बाजी मारी है। यहां सवर्ण हमेशा ही पाला बदलते रहे हैं। हालांकि इस बार हालात इतने बदले हुए हैं कि कांग्रेस से दल बदलकर गए नेता ही अब भाजपा का झंडा उठाएंगे।

राजवर्धन की राह दिख रही आसान
धार जिले की बदनावर सीट पर औद्योगिकी नीति एवं निवेश प्रोत्साहन मंत्री राजवर्धन सिंह दत्तीगांव ने 2018 में भाजपा के भंवर सिंह शेखावत को 41,506 वोट से हराया था। जबकि वोटकटवा उम्मीदवारों को 9,177 वोट मिले थे। विधानसभा चुनाव में यहां 8 प्रत्याशी मैदान में थे और कुल 1,67,645 वोट पड़े थे। राजवर्धन सिंह दत्तीगांव को 84,499, शेखावत को 42,993 और निर्दलीय राजेश अग्रवाल को 30,976 वोट मिले थे। राजवर्धन का जन्म 20 जनवरी 1972 को जयपुर में हुआ था। दत्तीगांव को महाराजा या राव साहेब के नाम से भी जाना जाता है। पेशे से यह किसान और व्यवसायी हैं। इन्होंने आईआईएमसी से अपनी पोस्ट ग्रेजुएशन की डिग्री ली। भाजपा को विश्वास है की उप चुनाव में दत्तीगांव इस सीट पर जरूर जीत हासिल करेंगे। लेकिन पार्टी में जिस तरह का उनका विराध दिख रहा है उससे भितरघात का खतरा हो सकता है।

उल्लेखनीय है कि राज्यवर्धनसिंह दत्तीगांव ज्योतिरादित्य के कट्टर समर्थक हैं और उनका एक इशारा होते ही पार्टी और पद दोनों ही त्याग दिए। उनकी इस स्वामी भक्ति ने बदनावर को उपचुनाव के रण में धकेल दिया है। कयास ये भी लगाए जा रहे हैं कि दत्तीगांव अब दलबदलू बनकर भाजपा के टिकट पर चुनाव में उतरेंगे तो क्या उनके पुराने कांग्रेसी साथी और कांग्रेसी मतदाता उन्हें भाजपा की ओर से चुनेंगे।

कांग्रेस के स्थानीय दावेदारों ने भरी हुंकार!
कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुए राजयवर्धन सिंह दत्तीगांव का बदनावर से उपचुनाव लडऩा लगभग तय माना जा रहा है। ऐसे में कांग्रेस में टिकट को लेकर जहां मंथन चल रहा है तो वही कई दावेदार टिकट की आस लिए बदनावर से कांग्रेस दफ्तर तक दौड़ लगा रहे हैं। कांग्रेस में स्थानीय दावेदार की मांग तेजी से जोर पकड़ रही है। बदनावर से करीब 16 स्थानीय उम्मीदवार अपनी दावेदारी जता रहे हंै, जिनके साथ पूर्व सीएम औप पीसीसी चीफ कमलनाथ ने बैठक कर चुके हैं। स्थानीय नेताओं में कमल सिंह पटेल, ईश्वर सिंह धन्याखेड़ी, अभिषेक मोदी, सुनील सांखला, भंवर सिंह सिसोदिया, दिलीप पाटीदार आदि नेताओं द्वारा अपना नाम प्रमुखता से रखा गया है। हालांकि कमलनाथ स्पष्ट कर चुके है कि सर्वे में जो सबसे आगे होगा उसे ही टिकट दिया जाएगा। उधर सूत्रों का कहना है कि राजपूत वोटों का गणित परिणामों को प्रभावित करते रहे हैं इस कारण से कांग्रेस इस बार वरिष्ठ नेता अजय सिंह पर दांव लगा सकती है। हालांकि कांग्रेस ने अभी पत्ते नहीं खोले हैं। लेकिन इतना जरूर तय है कि जाति को ही आधार बनाकर सीट जीतने की रणनीति कांग्रेस भी बनाएगी। हालांकि भंवर सिंह शेखावत भी भाजपा में आए बाहरी उम्मीदवार को टिकट देने को लेकर विरोध जता चुके हैं। वे यहां तक धमकी दे चुके हैं कि यदि दलबदलू को टिकट दिया गया तो वे सामने से चुनाव में उतरेंगे।

जातिगत समीकरण यहां का खास
यहां पर मुख्य रूप से वोटों की राजनीति के मामले में जातिगत समीकरण महत्वपूर्ण होते हैं। वर्तमान में दोनों ही बड़ी पार्टी के उम्मीदवार राजपूत समाज से हैं। राजपूत और पाटीदार समाज का बाहूल्य है। ऐसे में जो वर्ग जिस नेता के साथ चल पड़ता है उसके लिए राह आसान होती है। लेकिन इसमें संतुलन बनाना भी पार्टियों के लिए बहुत जरूरी हो जाता है। इस लिहाज से यहां पर जिसने दोनों वर्गों को साध लिया वह नतीजे के लिए आश्वस्त हो जाता है। पिछले 20 सालों से यहां राजपूत वोटबैंक का दबदबा रहा है। उपचुनाव को लेकर पीसीसी चीफ कमलनाथ खुद रणनीति बना रहे है साथ ही एक एक सीट पर दावेदार और असंतुष्ट नेताओं के साथ लगातार बैठक कर रहे हैं। बहरहाल अब देखना दिलचस्प होगा कि दत्तीगांव के सामने कांग्रेस से कौन हुंकार भरेगा।

1998 से बदनावर के पूरक रहे हैं दत्तीगांव
दत्तीगांव ने बदनावर विधानसभा से पांच बार चुनाव लड़ा है। इसमें पहली बार 1998 में कांग्रेस से टिकट नहीं मिलने पर निर्दलीय के रूप में लड़े और पहले ही प्रयास में दत्तीगांव ने करीब 30 हजार वोट हासिल किए। हालांकि इसके बाद हुए 2003 के चुनाव में कांग्रेस ने दत्तीगांव को टिकट दिया। इसमें भी विजयी हुए। इसके बाद लगातार दूसरी बार 2008 में भी विधायक चुने गए। 2013 में उन्हें भाजपा के भंवरसिंह शेखावत ने पराजित किया। 2018 में दत्तीगांव ने अपनी हार का बदला लेते हुए शेखावत को ही 41 हजार मतों के अंतर से हराया।

बदनावर विधानसभा
97877 पुरुष
96810 महिलाएं
कुल 194687 मतदाता

कब कौन रहा विधायक
1957 मनोहरसिंह मेहता कांग्रेस
1962 गोवर्धन जेएस
1967 गोवर्धन बीजेएस
1972 चिरंजीलाल अलावा कांग्रेस
1977 गोवर्धन शर्मा जेएनपी
1980 रघुनाथ सिंह कांग्रेस
1985 रमेश चंद्र सिंह बीजेपी
1990 प्रेम सिंह दौलत सिंह कांग्रेस
1993 रमेश चंद्र सिंह राठौर पुरुष बीजेपी
1998 खेमराज पाटीदार बीजेपी
2003 राजवर्धन सिंह दत्तीगांव कांग्रेस
2008 राजवर्धन सिंह दत्तीगांव कांग्रेस
2013 भंवर सिंह शेखावत बीजेपी
2018 राजवर्धन सिंह दत्तीगांव कांग्रेस