सिंधिया के गढ़ से तय होगा कांग्रेस का भविष्य, ताज मिलेगा या वनवास!

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ग्वालियर-चंबल की 16 सीटों पर उपचुनाव होना है

भोपाल. इस बार का उपचुनाव पिछले चुनावों से हटकर होगा। एक तो कोरोनाकाल में चुनाव हो रहे हैं, इसलिए ढेरों बंदिशें हैं। साथ ही सरकार का भविष्य भी तय होगा। इसमें ज्योतिरादित्य सिंधिया के गढ़ की महत्वपूर्ण भूमिका होगी। बात हो रही है ग्वालियर-चंबल संभाग की। वैसे तो राज्य की 28 सीटों पर उप चुनाव हो रहे हैं, लेकिन ग्वालियर-चंबल में उपचुनाव की सबसे ज्यादा सीटें हैं। इस संभाग पर दलों का ज्यादा फोकस है। यहीं से यह तय होगा कि कांग्रेस को सत्ता मिलेगी या फिर उसे वनवास पर ही रहना होगा।

पुराने साथियों से मुकाबला
ग्वालियर-चंबल संभाग सिंधिया के प्रभाव वाला क्षेत्र माना जाता है। 2018 के विधानसभा चुनाव में यहां कांग्रेस को बड़ी सफलता मिली थी। अब स्थितियां बदली हैं। सिंधिया भाजपा के पाले में हैं। उनके समर्थक विधायक भी भाजपा के साथ हैं। ऐसे में माना जा रहा है कि यह पूर्व विधायक यहां दोबारा मैदान में होंगे। इनका मुकाबला अपने ही पुराने साथियों से होगा। जो इनके लिए काम करते थे, अब वे प्रतिद्वंद्वी होंगे। ऐसे में मुकाबला रोचक होने के आसार हैं। पिछले चुनाव में यहां भाजपा को नुकसान हुआ था, अब भाजपा इस नुकसान की भरपाई करना चाहती है।

बदलता रहा है मतदाताओं का मिजाज
ग्वालियर-चंबल संभाग में मतदाताओं का मिजाज बदलता रहा है। पिछले एक दशक के चुनावों में भाजपा, कांग्रेस के अलावा बसपा पर भी मतदाताओं ने भरोसा जताया। 16 सीटों के ज्यादातर मतदाताओं ने कभी एक दल पर भरोसा नहीं किया। यानी किसी भी दल को लगातार चुनाव जिताकर विधानसभा तक नहीं पहुंचाया। जौरा विधानसभा की बात करें तो 1998 के चुनाव में बसपा पर मतदाताओं ने भरोसा कर जिताया। 2003 में कांग्रेस पर भरोसा किया। इसके बाद फिर बसपा उम्मीदवार को जिताया। 2013 में भाजपा और फिर 2018 में कांग्रेस पर भरोसा किया।