सांवेर के रण में कांग्रेस का कांग्रेस से मुकाबला, जनता के सामने रहेगी चुनौती

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होगी प्रदेश की सबसे चर्चित भिड़ंत, 22 साल बाद चुनाव मैदान में प्रेमचंद गुड्डू

भोपाल। मध्यप्रदेश में 28 सीटों पर उपचुनाव होने वाले है जो प्रदेश की आगे की सियासत तय करेंगे। हालांकि इन 28 सीटों में से सबसे ज्यादा नजर इंदौर की सांवेर विधानसभा सीट पर रहने वाली हैं। यहां भाजपा और कांग्रेस के बीच प्रदेश की सबसे चर्चित भिड़ंत हैं। भाजपा की ओर से प्रदेश के जल संसाधन मंत्री तुलसीराम सिलावट की उम्मीदवारी तय है जबकि कांग्रेस की ओर से दबंग दलित नेता और पूर्व सांसद प्रेमचंद गुड्डू का मैदान में हंै। इंदौर से लगे सांवेर की कहानी बेहद अलग है। कमलनाथ सरकार में कद्दावर मंत्री रहे तुलसीराम सिलावट ने सिंधिया के इशारे पर कांग्रेस छोड़ी तो सांवेर विधायक विहीन हो गया। पिछले चुनाव में कांग्रेस छोड़ भाजपा में गए प्रेमचंद गुड्डू अब फिर कांग्रेस में हैं। उपचुनाव में गुड्डू और तुलसी के बीच टक्कर होगी। इस तरह से सांवेर के रण में इस बार कांग्रेस का ‘कांग्रेसÓ से मुकाबला है। जनता के सामने अब दो पुराने कांग्रेसियों में से एक को चुनने की चुनौती रहेगी।

भितरघात का खतरा
सांवेर में दोनों प्रत्याशियों को अपने ही पार्टी के नेताओं से भितरघात का खतरा है। ऐसा शायद दूसरी किसी सीट पर नहीं है। भाजपा की तरफ से यहां सोनकर परिवार का वर्चस्व रहा है। ऐसे में पूर्व विधायक राजेश सोनकर और प्रकाश सोनकर का कुनबा कितना सहयोग करेगा तुलसी सिलावट का ये देखना होगा। तुलसी और सोनकर परिवार के बीच शुरुवाती दौर का चुनाव हिंसक भी रहा है। इधर कांग्रेस में जीतू पटवारी और प्रेमचंद गुड्डू के बीच एक बड़ी दरार है। ऐसे में जीतू पटवारी का सहयोग कितना मिलेगा इस पर भी सवाल है।

तकदीर लिखता है खाती समाज
इंदौर जिले की सांवेर विधानसभा सीट अनुसूचित जाति के सुरक्षित है। इस सीट पर कुल दो लाख साठ हजार से ज्यादा मतदाता हैं। सांवेर सीट पर कांग्रेस और भाजपा पूर्व में बारी-बारी से जीतती आईं हैं। सांवेर विधानसभा में जातिगत समीकरण की बात करें तो यहां खाती समाज के वोट निर्णायक साबित होते हैं। खाती बाहुल्य विधानसभा क्षेत्र में राजपूत और एससी-एसटी वोट भी परिणाम बदलने का माद्दा रखते हैं। जहां तक ब्राह्मण वोटों का ताल्लुक है तो वे यहां तकरीबन सात हजार की तादाद में हैं। इस बार तकरीबन एक हजार कावडिय़ों के परिवार भी बड़ा उलटफेर कर सकते हैं। क्षेत्र के जानकार मानते हैं कि जिस प्रत्याशी के पक्ष में अकेला खाती समाज बैठ जाता है उसका जीतना लगभग तय रहता है। ऐसे में जीतू पटवारी की भूमिका भी बढ़ जाती है।

सांवेर विधानसभा का क्षेत्रफल काफी वृहद है लेकिन इसका पसार जितना अधिक है यहां के वोटर राजनीतिक रूप से उतने ही सशक्त और एक हैं। सांवेर विधानसभा चुनाव में लगभग हर बार परंपरागत प्रत्याशी है अपना भाग्य आजमाते रहे हैं। भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दल सोनकर और सिलावट परिवारों को ही टिकट बांटती रही है। वोटर भी दोनों को काम करने का मौका बारी-बारी से देते रहे हैं।

मोदी पर सिंधिया भारी पड़े थे पिछले चुनाव में
बीते चुनाव में भाजपा प्रत्याशी राजेश सोनकर ने सबसे ज्यादा फोकस ग्रामीण क्षेत्रों में रोड नेटवर्क को जोडऩे पर रखा तो तत्कालीन कांग्रेस प्रत्याशी तुलसी सिलावट ने किसानों से जुड़े मुद्दे लगातार उठाए और मांगों के लिए आंदोलन भी किए। तुलसी सिलावट के लिए सिंधिया सभाएं ले चुके थे। जबकि भाजपा प्रत्याशी सोनकर ताई खेमे से थे और उनके के समर्थन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सभा ली थी लेकिन इसका भी कोई असर नहीं दिखा और सिंधिया मोदी पर भारी पड़े।
तुलसी 80 के दशक से सक्रिय तो गुड्डू 98 में जीते थे

सीट सांवेर विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस में रहते हुए तुलसीराम सिलावट 80 के दशक से सक्रिय राजनीति कर रहे हैं। जबकि प्रेमचंद गुड्डू कांग्रेस के टिकट पर 1998 में विधानसभा चुनाव जीत चुके हैं। 2019 में जब उन्हें टिकिट नहीं मिलने का अंदेशा हुआ तो भाजपा में चले गए लेकिन अब उपचुनाव के लिए गुड्डू ने फिर कांग्रेस का हाथ थाम लिया है। बता दे कि सांवेर विधानसभा सीट पर तुलसीराम सिलावट का अच्छा खासा प्रभाव है। वह 1985, 2007, 2008 और 2018 में यहां से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीतकर विधायक बन चुके हैं। हालांकि इस बार वह भाजपा के टिकट पर अपनी किस्मत आजमाएंगे। सिंधिया खेमे से आने वाले तुलसीराम सिलावट कमलनाथ सरकार में भी मंत्री थे, लेकिन सिंधिया की बगावत के बाद वह भी कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए। प्रेमचंद गुड्डू 1998 में इसी क्षेत्र से कांग्रेस के विधायक चुने जा चुके हैं। कांग्रेस के दिग्गज नेता रहे प्रेमचंद गुड्डू विधानसभा चुनावों से पहले भाजपा में शामिल हो गए थे, लेकिन अब एक बार फिर प्रेमचंद गुड्डू भाजपा से कांग्रेस में शामिल हो गए हैं और सांवेर से कांग्रेस प्रत्याशी बन गए हैं।

गौरतलब है कि सांवेर में 1977 के बाद यह पहला मौका होगा जब कांग्रेस और भाजपा दोनों दलों की ओर से सोनकर परिवार का कोई सदस्य चुनाव नहीं लड़ेगा। 1980 से 2018 तक यहां से भाजपा की ओर से केवल सोनकर परिवार के सदस्य ही चुनाव लड़े हैं। इस सीट की विशेषता यह है कि यहां से ज्यादातर बाहरी प्रत्याशी ही विजयी हुए हैं। यहां संघ का भी काफी प्रभाव रहा है। 1967 में यहां से भारतीय जनसंघ के टिकट पर बाबूलाल राठौर चुनाव जीत चुके हैं।

जातिगत समीकरण
सांवेर अनुसूचित जाति सुरक्षित सीट पर खाती, धाकड़ कलोता, राजपूत और दलित समाज का वर्चस्व रहा है। यहां दलितों और खाती समाज के लगभग बराबर वोटर हैं। दलितों में करीब 70 फीसदी मतदाता बलाई समाज के हैं। इसके अलावा कलोता राजपूत और धाकड़ समाज की भी पर्याप्त संख्या यहां है। अगर उम्मीदवारों की बात करे तो भाजपा के तुलसीराम सिलावट खटीक समाज से आते हैं जबकि कांग्रेस के संभावित उम्मीदवार प्रेमचंद गुड्डू पासी दलित से आते हैं। भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ता आ रहा सोनकर परिवार भी खटीक समाज में ही आता है। सांवेर सीट पर 40 हजार मतदाता दलित, 35 हजार मतदाता खाती समाज, 30 हजार मतदाता कलोता राजपूत समाज और 15 -15 हजार मतदाता राजपूत और धाकड़ समाज से आते हैं। अगर सांवेर सीट के इतिहास की बात करें तो यहां से 1962 में कांग्रेस के सज्जन सिंह विश्नार चुनाव जीते थे। इसके बाद 1967 में भारतीय जनसंघ के बाबूलाल राठौर, 1972 में कांग्रेस के राधाकिशन मालवीय,1977 में जनता पार्टी के अर्जुन सिंह का घारू, 1980 में भारतीय जनता पार्टी के प्रकाश सोनकर, 1985 में कांग्रेस के तुलसीराम सिलावट, 1990 और 1993 में भाजपा के प्रकाश सोनकर, 1998 में कांग्रेस के प्रेमचंद गुड्डू, 2003 में भाजपा के प्रकाश सोनकर, 2007 में कांग्रेस के तुलसीराम सिलावट, 2008 में भी कांग्रेस के तुलसीराम सिलावट, 2013 में भाजपा के डॉ राजेश सोनकर और 2018 में कांग्रेस के तुलसीराम सिलावट चुनाव जीते हैं।