कर्ज में डूब रहे पीएम आवास के लाभान्वित हितग्राही

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मंहगे दामो में मिल रही रेत, बजट के अभाव में कई आवास अधर में अटके

rafi ahmad ansari
बालाघाट। आखिर यह कैसी योजना है जो हितग्राहीयों को आवास तो दे रही है लेकि दूसरी ओर उन्हे कर्ज में डूबोयें जा रही है। हम बात कर रहे है केंद्र सरकार की पीएम आवास योजना की, हितग्राहियों के लिये गले की हड्डी बनी गई है। इस योजना के नाम पर शासन ग्रामीण अंचलो में हितग्राहीयों को महज डेढ लाख रूपये ही प्रदान कर रही है लेकिन महंगाई के इस दौर में यह राशि हितग्राहियों को ऊंट के मुंह में जीरा साबित हो रही है। एक ओर इस कोराना काल में आम लोगो के बीच आर्थिक समस्या बढ गई है, तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि जिले के वन बाहुल्य क्षेत्रो में बसने वाली आदिवासी जनता के क्या हालात होगें। उन्हे तो रोटी रोजी व घर गुजारा चलाने के लिये रोजगार तक नसीब नही हो रहे है, कुछ तो कृषि कार्य पर ही निर्भर है, जिनके पास फुंटी कौडी तक जमा नही है। ऐसी परिस्थिति से गुजर रहे आदिवासी का दुख दर्द जानने हमारी टीम ने ऐसे गांवो का दौरा किया, जहां पीएम आवास का पूरा करने मे जुटे हितग्राही कर्ज के बोझ तले दफन हो रहे है। मंहगाई के गुजरते इस दौर में एक गरीब परिवार का मुखया कम बजट में आखिर अपना आवास कैसे बना पायेंगा, यह सवाल गंभीर बना हुआ है। वही दूसरी ओर पीएम आवास योजना के नाम सुनते ही योजनो को आडे हाथ लेकर मटेरियल सामाग्री भी मंहगे दामो में बेची जा रही है। आदिवासी ईलाको में रेत न मिलने के कारण कई आवास अधूरे पडे है तो वही रेत के दाम भी आसमान छू रहे है। जिससे पीएम आवास योजना का लाभ लेने वाले हितग्राहीयों का बजट लडखडा गया है और वे कर्ज में डूबे जा रहे है।

यह जमीनी हकिकत परसवाडा जनपद पंचायत के अंतर्गत ग्राम पंचायत जगनटोला के आदिवासी गांव घोंदी में देखने में मिली। जहां अधिंकाश पीएम आवास अधर में अटके हुए नजर आयें। एक नजरियें से देखे तो मकानो को लेकर गांव 50 फिसदी विकासशील नजर आया, लेकिन मकान अधर मे अटके होने के कारण गांव का विकास अधूता है। इस संदर्भ में हमने कुछ ग्रामीणो से चर्चा की तो उन्होने बताया कि राशि तो बराबर मिल रही है लेकिन मटेंरियल मंहगे दाम में बेचे जा रहे है। जहां उन्होने सबसे बडी समस्या रेत की बताई जो करीब 05 हजार रूपये से लेकर 5500 रूपये तक एक ट्राली बेची जा रही है। रेत मंहगे दाम में मिलने के कारण आवास निर्माण में उनका बजट लडखडा गया है और राशि खत्म हो गई है। उनके पास कोई जमापूंजी भी नही है जिससे वे अपना अधूरा आवास नियमो के तहत पूर्ण करते जायें। इस कारण ही गांव में स्वीकृत हुए अधिकांश पीएम आवास अधर में अटक गये है तो कुछ खंडहर में तब्दील हो चुके है।
ग्रामीणो का दर्द जानकर हमने पंचायत पहुचकर रोजगार सहायक चंदन परते से जानकारी ली तो उन्होने बताया कि गांव में 113 पीएम आवास स्वीकृत हुए है लेकिन महज 16 आवास ही पूर्ण रूप से कम्प्लीट हो चुके है। शेष 97 स्वीकृत पीएम आवास अधर में अटके है। इनके कुछ आवास अंतिम चरण में कंप्लीट होने की कगार पर है। रोजगार सहायक चंदन परते ने भी अधूरे आवास होने के पीछे मुख्य वजह रेत का मंहगे दाम पर मिलना बताया। श्री परते ने बताया कि कुछ ग्रामीण हितग्राही ऐसे भी जो अपना आवास पूर्ण करने के इच्छुक नजर नही आ रहे। जब भी उन्हे आवास पूर्ण करने कहा जाता है तो अपने अन्य काम काज होने का हवाला देते रहते है। लेकिन दूसरी ओर रेत जैसी महत्वपूर्ण मटेरियल के उच्च दाम सुनकर ग्रामीणो के हाथ पांव ठंडे पड जाते है। जानकारी मिली है कि क्षेत्र में रेत का अभाव है, जिस कारण दूरस्थ क्षेत्रो से रेत बुलवानी पडती है। इसी कारण रेत सप्लाई करने वाले कारोबारी भी मंहगे दाम में रेत बेच रहे है। पहले निर्माण कार्योे के लिये पंचायत को रायल्टी प्रदान की गई थी लेकिन इस वर्ष रायल्टी प्रदान नही हुई जिस कारण रेत मंहगे दाम में ग्रामीण हितग्राहीयों को उपलब्ध हो रही है। रेत के दाम आसमान छू रहे है तो वही अन्य मटेरियल के भी दाम मंहगे हो गये है। जिस कारण पीएम आवास के लिये शासन द्वारा प्रदान की जा रही राशि कम पड जाती है और हितग्राही कर्ज में डूबकर आवास पूर्ण कर रहे है। आवश्यक्ता है शासन स्तर से ग्रामीण क्षेत्रो के लिये पीएम आवास राशि बढाई जाये या फिर पीएम आवास हितग्राहीयों को एक निर्धारित दर पर मटेरियल उपलब्ध कराया जाये।

इनका कहना है- इस संदर्भ में जानकारीयां लगी थी। इसके लिये प्रशासन की ओर से पंचायत स्तर पर मैपिंग का कार्य किया जा रहा है। 1 तारिख से रेतघाट चालू हुए है जहां रेत घाटो से निर्धारित मूल्य पर रेत प्रदान करवाई जायेगी। मैपिंग का कार्य 2-4 दिनो में पूर्ण हो जायेगा, उसके बाद हितग्राहीयों को सुलभता से रेत मिलेगी। अभी जिले भर में 13 करोड रूपये पीएम आवास की राशि का वितरण करना बाकि है।
आर.उमा माहेश्वरी,सीईओ
जिला पंचायत बालाघाट