नौरादेही अभ्यारण्य में चीता लाने मंजूरी, 18 साल बाद भी दहाड़ का इंतजार

0
3

lakhan vyas

दमोह, भारत में विलुप्त हो चुके चीता की दहाड़ दोबारा प्रदेश में गूंजे इसके लिए नौरादेही अभ्यारण्य की जगह को उपयुक्त मानते हुए 2002 में तकनीकी तो मिल गई थी लेकिन इसके बाद से खटाई में गया यह प्रोजेक्ट अब तक पूरा नहीं हो सका है लोगों को 18 साल बाद भी चीते का इंतजार है तीन जिलों की सीमा पर बसे इस अभ्यारण्य में बाघ से लेकर अन्य जानवर भी पहले से मौजूद हैं हालांकि पर्यटन के लिहाज से अब तक यहां कुछ नहीं है जिसका एक कारण अभ्यारण्य में चीतों को लाने की तैयारी भी बताई गई है विभाग के अनुसार अभ्यारण्य की बसाहट को देखते हुए 2002 में यहा चीता लाने सरकार ने प्रोजेक्ट तैयार किया गया जिसके लिए तकनीकी स्वीकृति भी दी गई थी इसके बाद यह मामला खटाई में चला गया था वर्षों तक इस मामले पर कोई चर्चा नहीं हुई थी 2018 में इस फाइल को फिर से चलाया गया  था.

करीब दस साल पहले बनी थी योजना
भारत में लुप्त हो चुके चीतों को वापस लाने की कल्पना वर्ष 2009 में की गई थी और उसके लिए योजना का खाका तैयार किया गया था लेकिन कई वन्य प्रेमियों द्वारा विदेशी जमीन के चीतों के लिए भारतीय क्षेत्र उपयुक्त ना होने का हवाला देने पर यह योजना ठंडे बस्ते में पड़ गई लेकिन वन्य प्राणियों से जुड़ी संस्थाओं वन विभाग नामीबिया चीता कन्जर्वेशन द्वारा ने चीतों की सुरक्षा व रहवास के लिए भारत को बेहतर मानते हुए रहवास के लिए भारत को बेहतर मानते हुए यहां उनके लिए उचित माहौल तैयार होने की बात कही जिसके बाद इस योजना को दोबारा आगे बढ़ाया गया था.

चीता के लिए दर्जनों गांव विस्थापित
तत्कालीन डीएफओ ने नौरादेही अभ्यारण्य के इस प्रोजेक्ट को गति देने का प्रयास किया कई तरह की मंजूरी भी इसके लिए दिलाई गई और पहले चरण में 6 चीतों को साउथ अफ्रीका से लाने की मंजूरी भी मिल गई थी दोनों देशों से तैयारी अब चीतों के आने का इंतजार किया जा रहा था लेकिन फिर अधिकारी बदला और मामला खटाई में चला गया इस बीच अभ्यारण्य की जद में आ रहे 20 से अधिक गावों को भी विस्थापित कर चीता के लिए जगह खाली करा ली गई थी बीते एक साल से इस प्रकरण को लेकर कोई भी गतिविधि विभाग की ओर से सामने नहीं आई है.

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होते है संरक्षण के प्रयास
दरअसल लुप्त प्राय या हो चुके वन्य प्राणियों के संरक्षण के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रयास किए जाते हैं और इसके लिए इस क्षेत्र से जुड़ी हुई अंतर्राष्ट्रीय संस्था इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजेर्वेशन नेजर (आईयूसीएन) द्वारा ट्रांसलोकेशन यानी स्थांतरण की पहल की जाती है इसके पीछे मंश यह होती है कि कोई भी लुप्तप्राय प्राणी को आबादी एक ही स्थान पर ना रहे ताकि एकाएक किसी अनहोनी समस्या या बीमारी के चलते उनकी प्रजाती व आबादी पर खतरा न आए ऐसे में अफ्रीका में मौजूद चीतों का संरक्षण भी अन्य स्थानों पर रखकर किया जाएगा इस सोच को मूर्त रूप देने के लिए जिसके लिए भारत में नौरादेही अभ्यारण्य चुना गया था.

सुप्रीम कोर्ट से भी मिल चुकी है अनुमति
मध्यप्रदेश में चीता को लेकर जनवरी 2020 में आए सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले में स्पष्ट किया गया है कि नौरादेही अभ्यारण्य में चीयो को बसाने के लिए अनुकूल जगह है तो बसाया जाना चाहिए नौरादेही अभ्यारण्य को इसके लिए उपयुक्त भी माना गया है माना जा रहा है कि वर्षों से खटाई में पड़े इस प्रोजेक्ट के सभी रास्ते क्लीयर होने के बाद अब चीतों को जल्द ही अभ्यारण्य में लाया जाएगा लेकिन नौ महीने बाद भी पहल नहीं है.

चीता के लिए विस्थापित गांव में तैयार किया गया था जंगल
करीब दो वर्ष पूर्व नौरादेही में चीता लाने की तैयारियां बड़े जोरों शोरों से चल रही थी चीता के लिए सबसे जरुरी होता है घास का मैदान इसलिए यहां ऐसा जंगल तैयार किया गया था जहां सबसे अधिक घास मौजूद है क्योंकि चीता घास के बीच छिपकर अपना शिकार करता है जानकारी के अनुसार नौरादेही के विस्तार के लिए कई गांव का विस्थापन किया गया है और उन्हीं गांव में चीता के रहने के लिए घास का मैदान तैयार किया गया था जो आज बिलकुल तैयार है चीता दुनिया का सबसे तेज दौड़ने वाला प्राणी है एक अनुमान के मुताबिक उसकी दौड़ने की रफ्तार110 से 120 किमी प्रति घंटा रहती है वर्ष 1947 में आखरी बार चीता भारत में देखा गया था इसके बाद यह प्रजाति भारत से पूर्ण रूप से विलुप्त हो गई.

नजदीक से निहारिए नौरादेही की खासियतें

  • नौरादेही अभ्यारण्य की स्थापना 1975 में की गई थी उस समय इसे भेड़ियों का प्राकृतिक आवास घोषित किया गया था.
  • साल 1984 में अभ्यारण्य को वन मंडल का दर्जा दिया गया था.
  • प्राकृतिक रूप से यहां साल 2006 से 08 तक 12बाघ स्वच्छंद विचरण करते रहे हैं.
  • बीते दो साल में कान्हा और बांधवगढ़ से यहां बाघ बाघिन को लाकर बसाया गया था.
  • बाघ किशन बाघिन राधा के मिलने के बाद तीन शावकों होने से कुनबा पांच बाघों का हो गया है.
  • अभ्यारण्य सागर दमोह व नरसिंहपुर जिले की सीमाओं को छूते हुए कुल 1197 वर्ग किलोमीटर में बसा है.
  • नाइट विजन कैमरे अभ्यारण्य में लगाए गए हैं ड्रोन से मोनिटरिंग की जा रही है.
  • अभ्यारण्य में 8 मई 2019 को जन्मे थे तीनों शावक.

नौरादेही अभ्यारण्य प्रदेश का एकमात्र ऐसा अभ्यारण्य है जो सबसे अधिक क्षेत्रफल में है मार्च2018 में बाघिन राधा और अप्रैल 2018 में यहां नर बाघ किशन को लाया गया था जिन्होंने एक साल बाद 8 मई 2019 को तीन शावकों को जन्म दिया था जो आज पूर्ण रूप से स्वस्थ हैं और लगातार अपनी मां राधा से शिकार की बारीकियां सीख रहे हैं जिन्हें मिलाकर पांच बाघों का कुनबा अभ्यारण्य में मौजूद है.

ऐसा है चीता प्रोजेक्ट
भारत में विलुप्त हो चुके चीता को वापस लाने के लिए सरकार पुनर्वास योजना लाई थी जिसके तहत चीतों को बसाने योग्य अभ्यारण्यों की जानकारी ली गई थी विशेषज्ञों के निरीक्षण के बाद नौरादेही को उपयुक्त माना गया था और तकनीकी स्वीकृति मिली थी इसके बाद भारतीय वन्यजीव संस्थान देहरादून ने नौरादेही अभ्यारण्य को चुना था इसके बाद यहां चीता लाने की तैयारी थी नेशनल टाइगर कंजेर्वेशन अथॉरिटी एनटीसीए को प्रोजेक्ट की पूरी तैयारी होना बताया था इसके बाद बताया गया था कि 6 चीते साउथ अफ्रीका से नौरादेही में जल्द आएगी .

यह है भविष्य की योजनाएं
केंद्र और राज्य सरकारें नौरादेही वन्य अभ्यारण्य को गांधी नेशनल पार्क घोषित करने जा रही है जिसका प्रस्ताव वन विभाग पहले ही तैयार कर चुका है वही अभ्यारण्य में पर्यटन को भी विकसित करने की कई योजनाएं है जिनसे यह पर्यटन का केंद्र बनेगा|

जबलपुर मार्ग से लाने की बनाई गई थी योजना
डेढ़ साल पहले नौरादेही में चीता लाना बिलकुल तय हो गया था उस दौरान अधिकारियों ने बताया था कि उसे हवाई मार्ग द्वारा सबसे पहले डुमना जबलपुर लाया जाएगा और वहां से जबलपुर सड़क मार्ग से पाटन होते हुए नौरादेही अभ्यारण्य में शिफ्ट किया जाएगा यदि उस समय चीता यहां आ गया होता तो पूरे भारत में नौरादेही एकमात्र ऐसा जंगल होता जहां चीता देखने मिलता और पर्यटन को बढ़ावा मिलता |

अभी कोई तैयारी नहीं
नौरादेही की नवपदस्थ डीएफओ राखी नंदा ने बताया कि चीता प्रोजेक्ट को लेकर अभी कोई तैयारी उनके आने के बाद समझ नहीं आई है यह प्रोजेक्ट किस स्थिति में है इसकी जानकारी प्रोजेक्ट फाइल देखकर ही दी जा सकती है.
राखी नंदा, डीएफओ नौरादेही अभ्यारण्य, सागर मप्र