उज्जैन के नारायणा गांव में मौजूद हैं श्रीकृष्ण-सुदामा द्वारा एकत्रित लकड़ियां

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brijesh parmar

उज्जैन। मथुरा, वृंदावन की तरह धर्मधानी उज्जयिनी भी भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं की साक्षी रही है। जिले की महिदपुर तहसील का गांव नारायणा आज भी इस बात की गवाही दे रहा है। गांव में पांच हजार साल बाद भी दोनों मित्रों द्वारा जंगल से लाई गई लकड़ियां मौजूद हैं। कालांतर में यह स्थान श्रीकृष्ण-सुदामा के मैत्री स्थल के रूप में प्रसिद्ध हुआ। यहां भगवान कृष्ण व सुदामाजी का भव्य मंदिर है। देशभर से हजारों कृष्ण भक्त प्रतिवर्ष इस दिव्य स्थान के दर्शन करने आते हैं।
जन्माष्टमी पर भव्य उत्सव मनाया जाता है। हालांकि इस बार कोरोना संक्रमण के कारण केवल पूजन-आरती होगी। तीर्थ नगरी अवंतिका में गुरुश्रेष्ठ सांदीपनि से शिक्षा ग्रहण करने आए भगवान श्रीकृष्ण गुरुमाता की आज्ञा से मित्र सुदामा के साथ गांव नारायणा स्थित वन में ईंधन के लिए लकड़ियां एकत्र करने गए थे। शाम को लौटते समय तेज वर्षा होने लगी।

बारिश से बचने के लिए दोनों मित्र एकत्र की गई लकड़ियों का गट्ठर जमीन पर रखकर पेड़ पर चढ़ गए। रातभर बारिश होती रही, अगले दिन सुबह मुनि सांदीपनि दोनों बालकों को खोजने जगंल पहुंचे और उन्हें आश्रम लेकर आए। इस दौरान लकड़ियों का गट्ठर जंगल में रह गया। कालांतर में भक्तों ने इस स्थान पर भगवान श्रीकृष्ण व सुदामाजी का भव्य मंदिर बनवाया। आज भी लकड़ी के दोनों गट्ठर हरे-भरे दिव्य वृक्ष के रूप में मंदिर के दोनों ओर नजर आते हैं। भक्त इनकी पूजा कर परिक्रमा लगाते हैं।

मैत्री का उल्लेख श्रीमद्भागवत महापुराण में मिलता है
श्रीमद्भागवत महापुराण के दसवें स्कंध में भगवान श्रीकृष्ण व सुदामाजी की मैत्री का उल्लेख मिलता है। यह स्थल उज्जैन जिले की महिदपुर तहसील के गांव नारायणा को बताया जाता है। पांच हजार साल बाद भी लकड़ियों के गट्ठर का मौजूद रहना भगवद् कृपा को दर्शाता है। श्रीकृष्ण के हिस्से के चने खाए थे, इसलिए हुए दरिद्र मान्यता है कि लकड़ियां एकत्रित करने के लिए वन भेजते समय गुरुमाता ने दोनों मित्र (कृष्ण-सुदामा) को खाने के लिए चने दिए थे।
बाद में नारायणा गांव में बारिश के दौरान सुदामा ने श्रीकृष्ण के हिस्से के चने भी खा लिए। बताया जाता है कि भगवान के हिस्से का अन्न खाने के कारण ही सुदामा दरिद्र हुए। बाद में कृष्ण द्वारिकाधीश हुए और अपने मित्र की दरिद्रता को दूर किया।