जंगल से गांव की तरफ वन्य प्राणियों का पलायन, आखिर क्यों ?

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जंगल को सुरक्षित करने अब सभी को जागरूक होने की जरूरत

अनिल दुबे

सागर। ‘वन है तो जीवन है’ इस तरह के नारे लगाते तो सभी है लेकिन वनों की सुरक्षा करने में आम नागरिक अपना दायित्व निभा रहे है। जिसका सीधा-सा जबाब यह है कि सब यही सोचते है कि इनकी रक्षा करने की जिम्मेदारी तो वन विभाग की है। उनकी बात से सभी सहमत है लेकिन हमारी भी तो कुछ जिम्मेदारी बनती है कि वनों की सुरक्षा को लेकर अपनी तरफ से कुछ प्रयास करे। यह भी सभी को पता है कि वनों का हमारे जीवन में कितना महत्व है। आज जो हवा पानी मिल रही है वह वनों के कारण ही संभव हो पा रहा है। अगर हम सब वनों की सुरक्षा को लेकर सभी को जागरूक करें तो इसका फायदा भी हम सबको मिलेगा लेकिन ऐसा कम ही संभव हो पा रहा है। जिसका प्रभाव हमारे जीवन पर पड़ रहा है। लगातार वनों पर पड़ रहे दवाब के कारण शुद्ध हवा नहीं मिल पा रही है। पानी का लगातार जल स्तर घट रहा है। अगर आज हम समय रहते नही संभले तो फिर इसके दुष्परिणाम हम सबके सामने आएंगे। आज जंगल को वीरान होने से नहीं बचा पाए तो इसका परिणाम हम सबको भोगना पड़ेगा। यहां तक कि जब वनों को सुरक्षित नहीं कर पाएंगे तो जंगल में वन्य प्राणियों पर संकट आना तय है। जिसका परिणाम भी बड़ा घातक रहेगा। जाहिर सी बात है कि जब हम किसी के आशियाने को नष्ट करने का प्रयास करेंगे तो फिर वह अपने को सुरक्षित करने का प्रयास तो करेगा। जब उनके जंगल के आशियाने को बर्बाद किया जाएगा तो फिर वह रहवासी क्षेत्रों में प्रवेश करेगा। जिसका दोष फिर वन्य प्राणियों को देना बेईमानी रहेगी। क्योंकि उनको परेशान करने का काम हम सबने किया तो फिर परिणाम हम सबको भोगना पड़ेगा लेकिन आज यह बात हम समझने के लिए तैयार नही है। सब जंगल को अपनी जागीर समझते है। जंगल को बर्बाद करने में तुले है। जब जंगल ही नही रहेंगे तो फिर वन्य प्राणी अपने प्राणों की रक्षा करने जंगल से तो निकलेगे ही। फिर इसके शिकार हम-तुम होंगे, इसका दोष वन्य प्राणियों को देना कहां तक उचित कहा जाएगा। यह भी सभी भलीभांति जानते है कि जो जंगली क्षेत्र वन्य प्राणियों के लिए आरक्षित है वहां से लकड़ी का एक टुकड़ा भी अपने उपयोग में लेना गैरकानूनी है। इसके बाद भी लोग ऐसे सुरक्षित जंगल में प्रवेश करने की हिम्मत करते है। इसके बाद जंगल की लकड़ी को अपने उपयोग में लाते है। इसके अलावा यहां लगे तेंदूपत्ता के साथ ही तेंदू, आंवला, बेल, अचार की चिरोंजी, महुआ, सीता फल सहित जंगली फल को अपनी जागीर समझकर इसका भरपूर उपयोग करने में लगे रहते है लेकिन वह भूल जाते है कि सुरक्षित जंगल जहां वन्य प्राणी रहते है वह अपना पेट कैसे भरेंगे। चलो यह भी मान लेते है कि मांसाहारी वन्य प्राणियों के पेट भरने की व्यवस्था तो वह कर लेते है लेकिन शाकाहारी वन्य प्राणियों के भोजन पर क्यों डाका डाल रहो हो। हद तो तब हो जाती है जब लोग वन्य प्राणियों के लिए सुरक्षित जंगल में जबरन प्रवेश करते है और अपने फायदे के लिए वह बेल के फल लेने पेड़ की बलि लेकर पूरे फल अपने कब्जे में करने का काम करते है। तेंदू पाने के लिए पेड़ को आग के हवाले करने से भी बाज नही आते और ऐसे में अगर जंगल में आग लग जाए तो फिर वन्य प्राणियों की रक्षा कौन करेगा? लेकिन ऐसे लोगों को तो लालच ने ऐसे जकड़ लिया है कि उन्हें निरीह वन्य प्राणियों की तनिक भी परवाह नहीं है। और जब जंगल से भोजन और पानी की तलाश में वन्य प्राणी रहवासी इलाकों मतलब गांव में प्रवेश करता है तो फिर इसका दोष उस पर ही आता है लेकिन लोग कभी यह विचार नहीं करते कि आखिर इसको अपने घर (जंगल) से निकलने की जरूरत क्यों पड़ी लेकिन उन्हें सिर्फ अपनी चिंता है। यहां तक कि जंगल का सबसे दब्बू वन्य प्राणी सियार को माना जाता है। यह सभी को पता भी है। अक्सर पंचतंत्र की कहानियों में भी इसका उल्लेख मिलता है। अगर दब्बू सियार भी गांव की तरफ आ रहा है तो इसके लिए हम सब दोषी है। जिस दिन यह विचार मन में आ गया कि जब हम उनके रहवासी इलाकों जंगल को नुकसान पहुंचा रहे है। जिसके कारण ऐसी स्थिति बन रही उसी दिन से जंगल से जानवर का गांव की तरफ आना बंद हो जाएगा।
यह भी जगजाहिर है कि स्वच्छता अभियान का असर नगरों की बजाय ग्रामीण क्षेत्रों में कम ही दिखाई दे रहा है। ऐसे में जंगल पर बढ़ रहे दवाब के चलते जंगली जानवर ग्रामों में जगह-जगह लगे कचरों के ढेर तक भोजन की तलाश में पहुंच जाते है। दूसरा शौंचालय का उपयोग नही करने वाले ग्रामीण जब लोटा लेकर मैदान में जाते है तो इस बीच भी ग्रामीण जंगली जानवर के चंगुल में आ जाते है। रही बात वन्य प्राणियों के हमले से घायल होने वाले ग्रामीणजन के इलाज की व्यवस्था की बात तो इसका खर्चा वन विभाग देता है। उनके लिए बस इलाज के दौरान दवाइयों में खर्च हुई राशि के बिल प्रस्तुत करने होते है। इसके बाद वन विभाग 7 से 10 दिन के भीतर खर्च की गई राशि उपलब्ध करा देता है। जिसमें विभाग को 50 हजार रुपए तक राशि देने का अधिकार है लेकिन अगर वन्य प्राणी के हमले से किसी व्यक्ति की जान चली जाती है तो फिर उसकी भरपाई कोई नही कर सकता। इन सबसे निपटने के लिए मुख्य रूप से लोगों को अपनी विचारधारा बदलने की जरूरत है। जब जंगल में वन्य प्राणियों को पर्याप्त भोजन पानी की व्यवस्था रहेगी तो वह कभी ग्रामीण क्षेत्रों में घुसने का प्रयास नही करेगा। जब तक वन्य प्राणियों के लिए सुरक्षित जंगल में सेंध लगाने का कार्य नही रुकेगा तब तक वन्य प्राणी ग्रामीण इलाकों में पहुंचने से भी नही रुक पाएंगे। इसके लिए हम सबको विचार करने की जरूरत है।

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