आसान बने सूचना के अधिकार की राह: आत्मदीप, पूर्व सूचना आयुक्त

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जनता का ब्रह्मास्त्र है सूचना का अधिकार। सरकार व सरकारी तंत्र को जनता के प्रति जवाबदेह बनाने और सार्वजनिक क्रियाकलाप में शुचिता एवं पारदर्शिता लाने का यह प्रभावी उपकरण है। यह हर नागरिक को अपने देश की व्यवस्था का पहरेदार (चैकीदार) बनने की ताकत देता है। मौजूदा व्यवस्था ने इस मौलिक अधिकार की राह कठिन बना दी है, जिस पर राष्ट्रीय बहस की आवश्यकता है।

देश में यह कानून लागू होने से अब तक 15 सालों में सूचना के अधिकार के प्रचार-प्रसार के लिए कोई सार्थक कदम नहीं उठाये गये हंै। नतीजा यह कि देश की अधिकतर आबादी अपने इस अधिकार की जरूरी जानकारी से अभी तक वंचित है। इसके चलते बमुश्किल एक फीसदी आबादी ही इसका उपयोग कर पा रही है। सीबीएसई की तरह राज्यों के शिक्षा बोर्ड भी अपने पाठ्यक्रम में इस कानून को शामिल कर नई पीढ़ी को इसके प्रति जागरूक बना सकते हैं।

दुर्भाग्यवश इस अधिकार के प्रति सरकारी तंत्र की नकारात्मक मनोवृत्ति बनी हुई है। इसके कारण जनता को चाही गई जानकारी नियत समय सीमा में नहीं मिल पाती। आटीआई एक्ट के क्रियान्वयन से जुडे लोकसेवकों को नियमित रूप से इसका प्रशिक्षण देने के कानूनी प्रावधान का पालन भी सरकारें नहीं कर रही हैं। इस कर्तव्यविमुखता के चलते लोकसेवकों के बड़े हिस्से को इस कानून का पर्याप्त ज्ञान नहीं है। इसका खामियाजा जनता को भुगतना पड़ रहा है। इस कानून में हर दफ्तर में रिकाॅर्ड का सरल व सुव्यवस्थित प्रबंधन कराने का अनिवार्य प्रावधान है, लेकिन सरकारें इसकी अनुपालना कराने में विफल रहीं।

बड़ी सख्या में प्रथम अपीलीय अधिकारी अपने अर्द्धन्यायिक दायित्व का न्यायोचित ढंग से निर्वहन नहीं करते हैं। उन्हें दंड देने की शक्ति न दिये जाने के कारण प्रथम अपील पर दिये गये उनके आदेश का कई लोक सूचना अधिकारी पालन नहीं करते। इसमें सुधार के लिए अपीलीय अधिकारियों को समुचित प्रशिक्षण व दंडात्मक शाक्ति देना और कर्तव्य विमुख अपीलीय अधिकारियों के खिलाफ कार्यवाही का प्रावधान किया जाना आवश्यक है।

स्वीकृत पदों पर नियुक्तियां समय पर नहीं
सूचना आयोगों को और सुदृढ़ बनाने में भी सरकारें कोताही बरत रही हैं। वे इन आयोगों मेे स्वीकृत पदों व आवश्यकता के अनुसार पर्याप्त संख्या मंे सूचना आयुक्तों की नियुक्तियां समय पर नहीं करती हैं। वे आयोगांे को जरूरत के मुताबिक कार्यकुशल स्टाॅफ मुहैया कराने का जिम्मा भी ठीक से नहीं निभाती। नतीजन लोगांे की शिकायतांे व अपीलों के निराकरण में अनावश्यक देरी होती है। काफी मामलों में ऐसा होता है कि आयोग के आदेष के बाद जब तक आवेदक को मांगी गई जानकारी मिलती है, तब तक उसकी उपयोगिता ही खत्म हो जाती है। साल-दो साल बाद जानकारी मिलने से सूचना के अधिकार का उद्देश्य ही परास्त हो जाता है।

अधिकतर सरकारें मुख्य सूचना आयुक्त व सूचना आयुक्त के पदों पर नियुक्ति में सुपात्र नागरिकों की बजाय सेवानिवृत्त नौकरशाहों को प्राथमिकता देती है, भले ही उन नौकरशाहों का सेवाकाल कैसा भी रहा हो। यानी उनका चयन भी मेरिट के आधार पर नहीं किया जाता है। जबकि नौकरशाहों की जगह योग्य नागरिकों को नियुक्ति में प्राथमिकता देकर लोकहित व शासनहित को अधिक साधा जा सकता है।

भारत सरकार द्वारा गठित सरकारिया आयोग की संसद में स्वीकृत सिफारिशों में स्पष्ट कहा गया कि सूचना आयोगों में सिविल सोसायटी के श्रेष्ठ जनों को अधिक से अधिक संख्या मंे नियुक्त किया जाना चाहिए, रिटायर्ड नौकरशाहांे कोे नहीं। क्योंकि नौकरशाहांे में सूचनाएं दबाने-छुपाने की स्वभावतः प्रवृत्ति होती है। वीरप्पा मोईली की अध्यक्षता में गठित दूसरे प्रशासनिक सुधार आयोग ने 9 जून 2006 को भारत सरकार को ‘सूचना का अधिकारः सुशासन की कंुजी‘ विषयक रपट सौंपी थी। उसमें भी सूचना आयोगों में गैर नौकरशाहों को नियुक्त करने की सिफारिशें की गई हंै। पर सरकारें इसके एकदम उलट भूमिका निभा रही हंै।

आयोग के निर्णय पर पुनर्विचार का प्रावधान हो
कुछ सूचना आयुक्त शिकायतों व अपीलों पर त्रुटिपूर्ण आदेश पारित कर देते हैं। ये आदेश आटीआई एक्ट के प्रावधानों, न्यायिक विवेक और प्राकृतिक न्याय व न्याय शास्त्र के सिद्धांतों की कसौटी पर खरे नहीं उतरते। ऐसे आदेश लोगों का बुरी तरह आहत करते हैं। ऐसे गलत फैसलों से निजात पाना जनता के लिए आसान नहीं हैं। कारण कि मुख्य सूचना आयुक्त व आयुक्तों के निर्णय अंतिम व सभी पक्षों के बाध्यकारी होते हैं। ये आयुक्त अपील या शिकायत पर पारित अपने आदेश पर पुनर्विचार की मांग भी प्रायः ठुकरा देते हंै। यह कहकर कि आयोग को अपने फैसले का पुनरीक्षण करने का अधिकार नहीं हैं। आयोग के फैसलों के खिलाफ कहीं अपील भी नहीं की जा सकती। सिर्फ हाईकोर्ट मेें रिट याचिका दायर की जा सकती है, जिस पर होने वाला खर्च ज्यादातर लोग नही कर पाते हैं। ऐसे में आयोग के गलत निर्णय से व्यथित लोग मायूस होकर रह जाते हैं। इस व्यवहारिक समस्या के समाधान के लिए ऐसा कानूनी उपाय करने की बेहद जरूरत है जो आम आदमी की पहुंच में हो।

अधिकार का दुरूपयोग भी रोका जाये
एक बात और, सूचना का अधिकार सद्भाविक प्रयोजन के लिए दिया गया है। इसका दुरूपयोग करना इस अधिकार के पावन ध्येय के साथ दुष्कृत्य करने के समान है। पर कई लोगों ने खुद को आरटीआई कार्यकर्ता घोषित करते हुए सूचना के अधिकार को सूचना का रोजगार बना लिया है। ऐसे लोग किसी से बदला लेने, व्यक्ति विशेष को परेशान करने, कारोबारी हित या निजी स्वार्थ साधने के लिए इस पवित्र अधिकार का बेजा इस्तेमाल करते हंै। किसी भी तरह अनुचित लाभ उठाने की फिराक में रहने वाले ऐसे लोग आये दिन, हर कहीं आरटीआई, शिकायतंे व अपीलंे दायर करते हंै। इनके मामले निपटाने पर सार्वजनिक संसाधनांे का बहुत अपव्यय होता है। इनके कारण सदुपयोग करने वालों को जरूरी जानकारी/राहत मिलने में भी देरी होती है और इस कानून की छवि भी बिगड़ती है।
– आरटीआई संबंधी वैधानिक जानकारी के लिए फेसबुक पेज ‘‘राइट टू इन्फाॅरमेशन जर्नलिस्ट‘‘ देख सकते हैं।