मांधाता के रण में आसान नहीं नारायण की राह

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कब्जा बरकरार रखने कांग्रेस फूंक-फूंक बढ़ा रही कदम

भोपाल। खंडवा जिले की मांधाता विधानसभा से पूर्व कांग्रेस विधायक नारायण पटेल द्वारा इस्तीफा देने के बाद रिक्त हुई सीट पर उपचुनाव की तैयारियां शुरू हो गई हैं। भाजपा और कांग्रेस ने अपने नेताओं को सक्रिय कर दिया है। भाजपा की तरफ से नारायण पटेल का चुनाव लडऩा तय माना जा रहा है। वहीं कांग्रेस पार्टी प्रत्याशी चयन की कवायद में जुटी हुई है। उधर, मांधाता से जिस तरह के फीडबैक आ रहे हैं उसमें पटेल की स्थिति संतोषजनक नहीं है। उपचुनाव में उनकी राह आसान नहीं दिख रही है। उन्हें वोटकटवा उम्मीदवारों की चुनौती का सामना करना पड़ सकता है। नारायण पटेल ने 2018 में भाजपा के नरेंद्र सिंह तोमर को 1,236 वोट से हराया था, जबकि वोटकटवा उम्मीदवारों को 9,551 मिले थे। इस सीट पर 7 प्रत्याशी मैदान में थे और कुल 1,50,831 वोट पड़े थे। नारायण पटेल को 71,288, तोमर को 69,992 वोट मिले थे।

निमाड़ अंचल के तहत आने वाले खंडवा जिले की मान्धाता विधानसभा सीट पर इन दिनों सभी की निगाहें लगी हुई हैं। वजह है इस सीट पर होने वाला उपचुनाव। यह सीट कुछ दिनों पहले ही कांग्रेस विधायक नारायण पटेल द्वारा इस्तीफा देने की वजह से रिक्त हुई है। पटेल अब भाजपा में शामिल हो चुके हैं। भाजपा से उनका प्रत्याशी बनना तय है, लेकिन कांग्रेस से कौन उन्हें चुनौती देगा इस पर अभी पार्टी में मंथन चल रहा है। इस मंथन के बीच कांग्रेस संगठन इस सीट पर प्रत्याशी चयन के लिए पर्यवेक्षक भेजकर कार्यकर्ताओं के बीच राय शुमारी करा रही है। पटेल के इस्तीफा के बाद इस सीट पर कांग्रेस के आधा दर्जन नेता टिकट के लिए दावेदारी कर रहे हैं। इनमें वे नेता भी शामिल हैं, जो बड़े नेताओं के करीबी होने की वजह से मान रहे हैं कि इस बार पार्टी का टिकट उन्हें ही मिलेगा।

कांग्रेस में खिंचतान कम हुई
दरअसल प्रदेश में पहले कांग्रेस के प्रभावशाली क्षत्रपों के पांच गुट हुआ करते थे, लेकिन अब इनकी संख्या दो तक ही सीमित रह गई है। इसकी वजह है सिंधिया का भाजपा में शामिल हो जाना और सुरेश पचौरी का अप्रभावशाली हो जाना। पटेल के इस्तीफा के बाद अरुण यादव गुट भी बैकफुट पर आ चुका है। अब सिर्फ कमलनाथ और दिग्विजय गुट ही प्रभावशाली रह गया है। अगर इन दोनों ही प्रभावशाली गुटों की बात की जाए तो प्रदेश के मामले में अब दिग्विजय सिंह गुट पर कमलनाथ गुट भारी दिखाई देता है। इसके बाद भी दिग्गी के करीबी अवधेश सिसौदिया मानकर चल रहे हैं कि इस बार उन्हें ही टिकट मिलेगा। इसके अलावा जातिगत समीकरणों के चलते राज नारायण सिंह और उनके बेटे उत्तम पाल सिंह भी टिकट की उम्मीद में हैं। यह बात अलग है कि पूर्व में राज नारायण सिंह और पार्टी के बीच अक्सर पटरी नहीं बैठी है। उनकी अरुण यादव से भी पटरी नहीं बैठती है, इसके बाद भी वे अपना टिकट पक्का मानकर चल रहे हैं।

इस बार फूंक-फूंक कर कदम रख रही कांग्रेस

पुराने नेताओं की दावेदारी के बीच एक नया नाम तेजी से उभर रहा है। यह हैं पूर्व मुख्यमंत्री भगवंतराव मंडलोइ के परिवार के सदस्य अमिताभ मण्डलोई। इस परिवार के एक अन्य सदस्य पूर्व मुख्यमंत्री भगवंतराव मंडलोई के पुत्र रघुनाथ राव मंडलोई वर्ष 1972 में मांधाता, यानी निमाडख़ेड़ी का विधानसभा में प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। अमिताभ इस विधानसभा के ग्राम मोरधड़ी में मण्डलोई फाउंडेशन के जरिये पिछले आठ वर्षों से लगातार गरीब छात्र-छात्राओं की मदद करते हुए उन्हें मुफ्त शिक्षण सामग्री उपलब्ध करवा रहे हैं। चूँकि कांग्रेस अपने ही मोहरों के वजह से सरकार गंवा चुकी है। यही वजह है कि इस बार पार्टी फूंक-फूंक कर कदम रख रही है। यही वजह है कि कमलनाथ ने प्रत्याशी चयन की पूरी कमान खुद ही अपने पास रखी हुई है।

कांग्रेस ने चला गुर्जर पत्ता
मांधाता विधानसभा में जहां भाजपा ने युवा राजपूत चेहरे को अवसर दिया है तो कांग्रेस ने फिर पिछले चुनाव में हार चुके गुर्जर नेता को प्रत्याशी बनाया है। यहां कुल 1 लाख 90 हजार 974 वोटर हैं। इनमें से सबसे अधिक 29 हजार गुर्जर, 18500 बंजारा और 18 हजार राजपूत मतदाता हैं। आदिवासी मतदाताओं की संख्या करीब 4500 और मुस्लिमों की 9800 है। जातिगत वोटरों को साधने के लिए राजपूत प्रत्याशी अपने साथ गुर्जर समर्थकों और गुर्जर प्रत्याशी राजपूत समर्थकों को रखकर डैमेज कंट्रोल का प्रयास कर रहे हैं।

किसानों की समस्याओ को लेकर वे सक्रिय हुए
नारायण पटेल मूल रूप से मांधाता के बलड़ी विकासखंड के सेगवा गांव के निवासी हैं। यह क्षेत्र इंदिरा सागर बांध परियोजना में डूब में आ चुका है। खेती-किसानी से जुडे पटेल ने राजनीतिक सफर जनपद सदस्य का चुनाव लड़कर आरंभ किया। जनपद सदस्य बनते ही उन्हें बलड़ी जनपद के उपाध्यक्ष पद की राजनीति करने का मौका मिला। डूब क्षेत्र के किसानों की समस्याओ को लेकर वे सक्रिय हुए। जनपद उपाध्यक्ष रहते हुए उन्होंने अपना कदम पेट्रोल पंप व्यवसाय में रखा। मूंदी का एक पंप उन्होंने किराए पर लिया। इसके बाद पटेल ने 2003 मे जिला पंचायत का चुनाव लड़कर जीत हासिल की। 2008 में कांग्रेस से टिकट नहीं मिला तो निर्दलीय चुनाव लड़कर कांग्रेस को शिकस्त दिलाने में अहम भूमिका निभाई। इसके बाद उन्होंने अरुण यादव का दामन थाम लिया। इसके चलते 2013 में कांग्रेस का निष्कासन समाप्त कराकर उन्हें कांग्रेस का उम्मीदवार बना दिया। इसमें उन्हें हार मिली लेकिन यादव बंधुओं से घनिष्ठता ने 2018 में फिर उन्हे कांग्रेस ने मौका मिला। हालांकि 1250 मतों से ही वे जीते लेकिन मांधाता में अन्य पिछड़ा वर्ग का झंडा गाडऩे में सफल रहे। अब उन्होंने एकाएक बिना किसी कारण के कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थामा तो समूचे क्षेत्र में इसे लेकर कई तरह की चर्चाएं शुरू हो गई है।