कृषि विषयों पर पारित तीनों अध्यादेशों का कांग्रेस ने किया विरोध

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कृषि विषयों पर पारित तीनों अध्यादेशों का कांग्रेस ने किया विरोध

अध्यादेशों को किसान और देश विरोधी बताया

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Syed Javed Ali
मंडला – देश के अंदर संसद में जिस तरह से जनमत को विश्वास में लिए बिना कृषि विधेयक पारित किए गए हैं, वह भारत में कृषक समाज को पूरी तरह मिटा देने और उसे उसके खेत पर मजदूर बना देने की साजिश का हिस्सा है। कांग्रेस पार्टी ने तय किया है कि प्रत्येक स्तर पर इन तुगलकी अध्यादेशों का भरपूर विरोध किया जाए। उक्त उद्गार कांग्रेस पार्टी के जिला अध्यक्ष अधिवक्ता राकेश तिवारी प्रेस वार्ता में व्यक्त किये। कांग्रेस कार्यालय में आयोजित इस पत्रकारवार्ता को राजेंद्र राजपूत, अधिवक्ता संजय चौरसिया और अभिनव नट्टू चौरसिया ने भी सम्बोधित किया। इस दौरान अमित शुक्ला, सुभाष पांडेय, मंजूर अली और कुलदीप कछवाहा मौजूद थे। पत्रकारवार्ता के दौरान जारी विज्ञप्ति में कांग्रेस ने विस्तार से अपनी बात राखी है। जारी विज्ञप्ति में निम्न बाते कही गई है-

(अ) मोदी सरकार ने आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 में संशोधन किया है। जिसके जरिये खाद्य पदार्थों की जमाखोरी पर लगा प्रतिबंध हटा दिया गया. इसका मतलब है कि अब व्यापारी असीमित मात्रा में अनाजए दालें, तिलहन, खाद्य तेल प्याज और आलू को इकट्ठा करके रख सकते हैं। केंद्र सरकार 23 प्रकार की फसलों का समर्थन मूल्य घोषित करती है। मगर सिर्फ धान और गेहूं समर्थन मूल्य पर खरीदती है और बहुत सीमित मात्रा में दाल, वो भी इसलिए क्योंकि सार्वजनिक वितरण प्रणाली में वितरित करना होता है और आपात स्थिति के लिए संग्रहित करना होता है। बाकी की फसलों के लिए किसान बाजार के भरोसे होता है। अगर, बड़े व्यापारी असीमित मात्रा में भंडारण करके रखेंगे और किसानों की फसलों के आने पर उसे बाजार में उतार देंगे तो किसानों की उपज की कीमत जमीन पर आ जाएगी और किसान औने-पौने दाम में अपनी फसल बेचने पर मजबूर होगा। इतना ही नहीं हाल ही में खुद केंद्र सरकार के कृषि लागत एवं मूल्य आयोग की रबी 2020-21 की रिपोर्ट में यह आरोप सरकार पर लगाया गया है कि वो किसानों से दाल खरीद कर स्टाक करती है और जब दाल की फसल आने वाली होती है तो उसे खुले बाजार में बेच देती है, जिससे किसानों को उचित मूल्य नहीं मिल पाता है। तब क्या जमा करने की सीमा खत्म कर देने पर जमाखोर ये नहीं करेंगे। वर्ष 2015-16 में कुछ मुट्ठी भर व्यापारियों ने विदेशों से 45 रूपये किलो दाल मंगाकर और भारत में उत्पादित दाल का संग्रहण करके दालों के भाव 230 रूपये प्रतिकिलो तक पहुंचा दिये थे और ढाई लाख करोड़ रूपयों का घोटाला किया गया था।
(ब) दूसरा सरकार ने एक नया कानून- कृषि उत्पादन व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) अध्यादेश, 2020 पेश किया है, जिसका उद्देश्य कृषि उपज विपणन समितियों (एपीएमसी मंडियों) के बाहर भी कृषि उत्पाद बेचने और खरीदने की व्यवस्था तैयार करना है।
1. इस नए कानून के तहत सरकार ने कहा है कि मंडियों के बाहर उपज की बिक्री और खरीद पर कोई राज्य कर नहीं लगेगा। वहीं एपीएमसी मंडियों में टैक्स लगता रहेगा। इसकी वजह से ये आशंका है कि अब व्यापारी एपीएमसी मंडियों के अंदर खरीद नहीं करेंगे और वे किसानों से इसके बाद खरीददारी करेंगे जहां उन्हें टैक्स नहीं देना पड़ेगा। इस पृष्ठभूमि में चिंता ये है कि धीरे-धीरे एपीएमसी मंडियां खत्म हो जाएंगी और तब ट्रेडर्स अपने मनमुताबिक दाम पर किसानों से खरीददारी करेंगे। सरकार ने इस अध्यादेश को महिमामंडित करते हुए कहा कि किसान मंडिया के बाहर भी फसल बेच सकता है, जबकि यह सरासर झूठ है कि पहले भी किसानों को अपनी फसलें बाहर बेचने पर कोई प्रतिबंध नहीं था।
2. सरकार एक राष्ट्र, एक मार्केट बनाने की बात कर रही है, लेकिन उसे ये नहीं पता कि जो किसान अपने जिले में ही अपना उत्पाद नहीं बेच पाता है। वो राज्य के बाहर क्या बेच पाएगा। किसान के पास न साधन है और न ही गुंजाइश है कि वह अपनी फसल दूसरे मंडल या प्रांत में ले जा सके। इस अध्यादेश की धारा 4 में कहा गया है कि किसान को पैसा उस समय या तीन कार्य दिवस में दिया जाएगा। किसान का पैसा फंसने पर उसे दूसरे मंडल या प्रांत में बार-बार चक्कर काटने होंगे। न तो दो-तीन एकड़ जमीन वाले किसान के पास लड़ने की ताकत है।न बसूलने की।
3. देश में 86 फीसदी से अधिक छोटे एवं मध्यम किसान हैं, जिनके पास पांच एकड़ से कम भूमि है। वहीं मध्यप्रदेश में वर्ष 2011 से 2016 के बीच 24.25 प्रतिशत स्माल और मार्जिनल किसान बढ़ गये हैं। जिनके पास औसत जोत 0.49 हेक्टेयर और 1.41 हेक्टेयर है। अतः किसानों की उतनी ज्यादा उपज नहीं होती है कि वो दूसरे प्रांतों और बाजार में बेच सकें। बिहार ने वर्ष 2006 में एपीएमसी एक्ट खत्म कर दिया था। नाबार्ड की वर्ष 2016 की रिपोर्ट बताती है कि देश में सबसे कम आय बिहार के किसानों की है। इस अध्यादेश से कृषक समाज मजदूर बन जायेगा।
(स) तीसरा केंद्र ने एक और नया कानून- मूल्य आश्वासन पर किसान (बंदोबस्ती और सुरक्षा) समझौता और कृषि सेवा अध्यादेशए 2020 पारित किया हैए जो कि कान्ट्रैक्ट फार्मिंग को कानूनी वैधता प्रदान करता है ताकि बड़े बिजनेस और कंपनियां कान्ट्रेक्ट पर जमीन लेकर खेती कर सकें। कान्ट्रेक्ट फार्मिंग को बढ़ावा देने के लिए लाए गए तीसरे अध्यादेश को लेकर सरकार कहती है कि इससे किसानों की आमदनी बढ़ेगी और उसके उत्पाद की बिक्री सुनिश्चित रहेगी।
इस अध्यादेश की धारा 2 (एफ) से पता चलता है कि ये किसके लिए बना है। एफपीओ को किसान भी माना गया है और किसान तथा व्यापारी के बीच विवाद की स्थिति में बिचैलिया भी बना दिया गया है। उन्होंने आगे कहा, इसमें विवाद की स्थिति उत्पन्न होने पर किसान ही भुगतेगा। इसके तहत आपसी विवाद सुलझाने के लिए 30 दिन के भीतर समझौता मंडल में जाना होगा। वहां न सुलझा तो धारा 13 के अनुसार एसडीएम के यहां मुकदमा करना होगा। एसडीएम के आदेश की अपील जिला अधिकारी के यहां होगी और जीतने पर किसानों को भुगतान करने का आदेश दिया जाएगा। देश के 86 फीसदी किसान के पास दो-तीन एकड़ जोत है। विवाद होने पर उनकी पूरी पूंजी वकील करने और मुकदमा लड़ने में चली जायेगी। इन अध्यादेशों में न खेत मजदूरों के अधिकारों के संरक्षण का कोई प्रावधान है और न ही जमीन जोतने वाले बटाईदारों के संदर्भ में। तीनों अध्यादेश संघीय ढांचे पर प्रहार है। क्योंकि खेती व मंडियां भारतीय संविधान के अनुच्छेद 246 के तहत सातवीं अनुसूची की स्टेट लिस्ट की इंट्री 14 और 28 में आते हैं। अर्थात केंद्र को इन संदर्भो में किसी प्रकार के कानून बनाने का कोई अधिकार नहीं है। ऐसा प्रतीत होता है कि मोदी सरकार वर्ष 2015 में आयी शांताकुमार कमेटी की सिफारिशों को लागू करने की ओर कदम बढ़ा रही है और देश में समर्थन मूल्य पर अनाज खरीदने के खात्मे की बुनियाद रख रही है। अंतः यदि सरकार इतना ही किसानों के हित को लेकर सोचती है तो उसे एक और अध्यादेश लाना चाहिए जो किसानों को एमएसपी का कानूनी अधिकार दे दे। जो सुनिश्चित करेगा कि एमएसपी के नीचे किसी से खरीद नहीं होगी। इससे किसानों का हौसला बुलंद होगा।