सुरखी में आसान जीत के प्रति आश्वस्त गोविंद की राह हुई मुश्किल

0
4

उपचुनाव को पारूल ने बनाया रोचक

भोपाल। मध्यप्रदेश की राजनीति में मार्च में उठे जलजले ने पूरा का पूरा फ्रेम ही उल्टा कर दिया है। कार्यकर्ताओं के हुजूमों के हाथों से रातों रात झंडे बदल दिए गए। जुबान पर चढ़े नारे उतारकर नए नारे चढ़ाए गए। कुर्सी का वल्र्ड कप वही है, बस खिलाडिय़ों ने टीमें बदल ली हैं। राजनैतिक आईपीएल की तरह ही इस कुर्सी प्रीमियर लीग में कोई भी खिलाड़ी किसी भी टीम से खेल रहा है। लेकिन कांटे का मुकाबला सुरखी में है जहां पाला बदलकर राजनीति के दो दिग्गज आमने सामने हैं।

मध्यप्रदेश में उपचुनावों के बीच सबसे ज़्यादा चर्चाओं में रहने वाली सीट सागर जिले की सुरखी विधानसभा बन गयी है। कमलनाथ ने 2013 में सुरखी में गोविंद सिंह को अपने पहले ही चुनाव में मात देने वाली पारुल साहू केसरी को तुरुप का इक्का बनाया है। पारुल साहू के अचानक बीजेपी से कांग्रेस में आने के बाद समीकरण पूरी तरह बदल गए हैं। 7 साल पहले भी दोनों एक दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़े थे लेकिन तब गोविंद सिंह पंजे के साथ थे तो पारुल साहू फूल के साथ। जगह वही है, वोटर भी वही हैं और नेता भी वही, लेकिन पार्टियां बदल गयीं हैं। इससे पहले आसान जीत की तरफ बढ़ रहे सिंधिया समर्थक मंत्री गोविंद सिंह राजपूत को अब कड़ी चुनौती मिलती दिखाई दे रही है।

ऐसे में कांग्रेस के इस वाइल्ड कार्ड ने भाजपा को प्लान बी की तरफ मुडऩे को मजबूर जरूर किया है। अब देखना होगा कि पारुल साहू के खिलाफ मैनेजमेंट गुरु मंत्री भूपेंद्र सिंह, जिन पर सुरखी में जीत दिलाने का दारोमदार है, क्या तिकड़म बिठाते हैं।

वहीं पारुल अपने पांच साल के कार्यकाल में सुरखी में हुए कामों का प्रचार करेंगी। बांध, सड़कें, तहसीलों और नगर पंचायतों का दर्जा दिलाने जैसे कामों से पारुल एक विकासवादी नेत्री के रूप में सामने आईं थीं। कहा जा रहा है कि 2018 के चुनावों में बीजेपी ने उनको टिकट नहीं दिया और इसी का बदला लेने वे कांग्रेस में आई हैं। खबर यह भी है कि राजपूत की उम्मीदवारी से नाराज पारुल साहू को बीजेपी के जमीनी नेताओं का समर्थन भी मिल सकता है। ऐसे में बीजेपी के थिंक टैंक में लहरें उठने लगीं हैं।