मेहगांव में त्रिकोणीय मुकाबले का आसार

0
364

मेहगांव में पाला बदलने वालों को माफ नहीं करते हैं मतदाता

भोपाल। 2018 में भिंड जिले की मेहगांव सीट पर कांग्रेस प्रत्याशी ओपीएस भदौरिया ने 25,814 वोटों से भाजपा के वरिष्ठ नेता राकेश शुक्ला को हराया था। लेकिन भदौरिया ने पाला बदलकर भाजपा का दामन थाम लिया है। अब वे भाजपा सरकार में नगरीय विकास एवं आवास राज्य मंत्री हैं। उपचुनाव में वे भाजपा प्रत्याशी होंगे। अगर मेहगांव का इतिहास देखें तो यहां के मतदाता पाला बदलने वालों को बर्दास्त नहीं करते हैं। अगर इस बार भी ऐसा हुआ तो भदौरिया का पाला बदलना भारी पड़ सकता है। इस सीट पर 2018 में 34 प्रत्याशी मैदान में थे। यहां कुल 1,62,410 वोट पड़े थे। ओपीएस भदौरिया को 61,560, भाजपा प्रत्याशी राकेश शुक्ला को 35,746 और बहुजन संघर्ष दल के रंजीत सिंह गुर्जर को 28,160 वोट मिले थे।

उपचुनाव में मेहगांव में त्रिकोणिय मुकाबले होने के आसार हैं। वैसे मप्र की राजनीति दो दलीय रही है। भाजपा और कांग्रेस के बीच तीसरे दल को कभी जगह नहीं मिल सकी। हालांकि उप्र सीमा से सटे कुछ क्षेत्रों में बसपा और सपा का सीमित प्रभाव दिखता है, लेकिन इससे भी एक कदम आगे है भिंड जिले की मेहगांव विधानसभा सीट। सामान्य के लिए सुरक्षित इस सीट पर जीत के समीकरण निर्दलीय या अन्य दलों की दमखम से प्रभावित होते रहे हैं। पिछले तीन दशक के चुनाव देखें तो छह में से तीन बार भाजपा ने जीत दर्ज की, लेकिन बेहद मामूली अंतर से, जबकि बसपा, कांग्रेस और निर्दलीय ने एक-एक बार यहां कब्जा जमाया। 2018 में कांग्रेस के टिकट पर जीत दर्ज करने वाले ओपीएस भदौरिया अब भाजपा में जा चुके हैं, जिसके चलते यहां भी उपचुनाव होने हैं। पूरी संभावना है कि वही भाजपा के टिकट पर मैदान में होंगे।

मेहगांव किसी एक पार्टी का गढ़ नहीं
चंबल संभाग में सात सीटों पर उपचुनाव है जिसमे भिंड जिले की दो सीटे मेहगांव व गोहद भी शामिल है। वैसे तो मेहगांव विधानसभा क्षेत्र अब तक किसी भी दल का गढ़ बन नहीं पाया, 1998 में पहली बार भाजपा को सफलता मिली और अब तक तीन बार भाजपा के विधायक चुने जा चुके हैं। जबकि कांग्रेस को दो बार प्रतिनिधित्व का मौका मिला है। तीसरा चुनाव कांग्रेस ने 2018 मे जीता और ओपी एस भदोरिया विधायक चुने गए थे, जो कांग्रेस छोडकर अब भाजपा में है जो संभवत: उपचुनाव मे भाजपा के उम्मीदवार भी होंगे। लेकिन राजनीति में कब क्या हो जाए, अभी कुछ भी कह पाना मुश्किल है। पाला बदलने पर तेरह साल तक रायसिंह बाबा को नहीं किया था। मेहगांव विधानसभा क्षेत्र की जनता पाला बदलने वाले को कितना पसंद करती है। इसके प्रमुख साक्षी स्व. रायसिंह भदोरिया बाबा है, जो मेहगांव विधानसभा क्षेत्र के तेज- तर्रार दबंग जन नेता के रूप में पहचाने जाते थे। ऐसे जननेता को मेहगांव के मतदाताओं ने पाला बदलने पर तेरह साल तक माफ नहीं किया था। इसकी पुष्टि के लिए राजनैतिक इतिहास को खंगालने के साथ ही मतदाताओं के अंदर झाकने के लिए मेहगांव की राजनैतिक पृष्ठ भूमि को जानना जरूरी होगा। यह विधानसभा जातीय समीकरणों के आधार पर भदोरिया व ब्राह्मण व पिछडा वर्ग जाति बाहुल्य है। 1967 मे जनसंघ से राय सिंह भदोरिया विधायक चुने गए थे। उन्होंने 1972 मे जनसंघ से पाला बदल कर कांग्रेस से चुनाव लड़ा तो न केवल बुरी हार हुई बल्कि तेरह साल तक जीत की खुशी नसीब नहीं हुई थी। 72 के बाद 77 में भी जनता ने नकार दिया था और तेरह साल वाद जनता ने माफ कर निर्दलीय विधायक चुनकर भेजा था।

महल का प्रभाव नहीं
स्वतन्त्रता के बाद लोकतान्त्रिक प्रणाली में अब तक हुए चुनाव में मेहगांव महल के प्रभाव में कम ही रहा है। माधवराव सिंधिया के समय में 1990 मे मेहगांव से चुनाव जीते हरी सिंह नरवरिया को अपवाद मान ले तो अब तक सिंधिया समर्थक को हार ही मिली है। हरीसिंह नरवरिया को टिकट दिलाने का श्रेय जरूर महल को जाता है। लेकिन जीत के पीछे जातीय एकता बताई जाती है। वर्ना सिंधिया की कृपा से 1993, 1998, 2008 मे हरी सिंह को टिकट तो कांग्रेस से मिला पर जीता नहीं पाए थे। 2013 मे सिंधिया समर्थक ओपीएस भदोरिया को कांग्रेस ने टिकट दिया। 1985 के लंबे अंतराल पश्चात किसी राष्ट्रिय दल ने भदोरिया को उम्मीदवार बनाया था। मेहगांव का भदोरिया एक जुट था और अन्य जातीय बिखरी हुई थी। इसके बाबजूद ओपीएस चुनाव हार गए। 2018 का चुनाव जीते यह जीत सिंधिया के प्रभाव से मान भी ले पर यथार्थ वजह भदोरिया जातीय का लामबंद होना था। सिंधिया के कारण विधायकी त्यागने वाले भदोरिया को टिकट मिलना उनका अधिकार है और मिलना भी चाहिए। इस बात को मेहगांव के सभी दावेदार भी मान रहे हैं। मेहगांव से आम चुनाव में टिकट मांगने वालों की लंबी कतार होती है लेकिन इस उपचुनाव में ठीक उसी तरह सारे दावेदार शांत बैठे हैं, जिस तरह सहानुभूति चुनाव में कोई आगे मैदान में नहीं आता, लेकिन यह नेता तो मौके की नजाकत भांप कर अपनी रणनीति का खेल खेलते हंै।

जातिगत समीकरण का प्रभाव
भिंड की अन्य सीटों की तरह मेहगांव में भी सियासत को जातिगत समीकरण काफी हद तक प्रभावित करते हैं। यहां 18 प्रतिशत ठाकुर, 16.80 प्रतिशत ब्राह्मण, 14 प्रतिशत जाटव, 8 प्रतिशत लोधी, 7.2 प्रतिशत कुशवाह और 6 प्रतिशत पाल बघेल मतदाता हैं। ये वर्ग भाजपा, कांग्रेस और बीएसपी के अलावा अन्य छोटे दलों और निर्दल के साथ भी आते रहे हैं, जिससे हर बार सियासी जमावट में बड़ा बदलाव देखा जाता रहा है। होने जा रहे उपचुनाव के लिए भी राजनीतिक दलों के साथ निर्दल प्रत्याशियों ने इस पर जोर आजमाइश शुरू कर दी है। पिछले तीन दशक के चुनावों का विश्लेषण करें तो निर्दल और अन्य दलों के दखल का सहज अंदाजा लग जाता है। 1993 में बीएसपी से नरेेश सिंह गुर्जर (28.4 प्रतिशत) ने भाजपा के कोक सिंह (18.4 प्रतिशत) को 10 प्रतिशत से हराया था, जबकि इस अंतर से कहीं ज्यादा 18.2 प्रतिशत वोट शेयर निर्दल राय सिंह ने हासिल किया था, वहीं कांग्रेस से हरि सिंह (16.7 प्रतिशत) चौथे स्थान पर रह गए थे। 1998 के चुनाव में भाजपा के राकेश (35.3 प्रतिशत) ने कांग्रेस के हरि सिंह (30.4 प्रतिशत) को हराकर जीत दर्ज की। अंतर 4.9प्रतिशत वोट का रहा, जबकि समाजवादी पार्टी ने 3.6 प्रतिशत वोट बटोरे थे। बड़ी गिरावट के साथ बीएसपी के नरेश सिंह (19.8 प्रतिशत) तीसरे स्थान पर पहुंच गए थे। 2003 तक तस्वीर काफी बदल चुकी थी। इस चुनाव में राजनीतिक दलों के पीछे छोड़ते हुए निर्दल मुन्ना सिंह ने (24.9 प्रतिशत) सीट पर कब्जा किया। भाजपा के राकेश शुक्ला (20.4 प्रतिशत) महज 4.5प्रतिशतवोट से सीट गंवा बैठे, जबकि निर्दल राय सिंह बाबा ने 16.2प्रतिशतवोट शेयर लेकर तीसरा स्थान हासिल किया था। कांग्रेस (10.4 प्रतिशत) चौथे और बीएसपी (6.7 प्रतिशत) छठे स्थान पर रही।
2008 में भाजपा के राकेश शुक्ला (26.6 प्रतिशत) ने वापसी तो की, लेकिन उन्हें राष्ट्रीय समानता दल के राय सिंह भदौरिया बाबा (22.3 प्रतिशत) से कड़ी टक्कर मिली। शुक्ला महज 4.2 प्रतिशत वोट से जीत सके। कांग्रेस तीसरे और बीएसपी चौथे स्थान पर रही। 2013 में भाजपा ने कब्जा बरकरार रखा। चौधरी मुकेश सिंह चतुर्वेदी (21.1 प्रतिशत) ने कांग्रेस के ओपीएस भदौरिया (20.2 प्रतिशत) को करीबी मुकाबले में महज 1273 वोटों से पराजित किया, जबकि समाजवादी पार्टी ने 12 प्रतिशत वोट हासिल किए थे।

2018 में भदौरिया ने करीब 16 प्रतिशत के लंबे अंतर से भाजपा के राकेश शुक्ला को पराजित किया। कांग्रेस के टिकट पर ओपीएस भदौरिया को 38 प्रतिशत, जबकि शुक्ला को 22.1 प्रतिशत वोट मिले। सबसे ज्यादा नुकसान बीएसपी को हुआ, जो 4.7 प्रतिशत वोट के साथ पांचवे स्थान पर सिमट गई। गौर करने वाली बात है कि भदौरिया और शुक्ला के बीच 16 प्रतिशत का अंतर था, जबकि बहुजन संघर्ष दल ने 17.4 प्रतिशत वोट लेकर तीसरा स्थान हासिल किया। राष्ट्रीय लोक समता पार्टी ने भी 9.4 प्रतिशत वोट के साथ चौथा स्थान हासिल किया।

कांग्रेस से 21 ब्राह्मण दावेदार
भिंड जिले की इस विधानसभा सीट पर दो ही जातियों का वोट बैंक सबसे ज्यादा माना जाता है। क्षत्रिय और ब्राह्म्ण। इस सीट पर नगरीय प्रशासन राज्य मंत्री और पूर्व विधायक ओपीएस भदौरिया को भाजपा से टिकट मिलना लगभग तय है। राज्य मंत्री भदौरिया क्षत्रिय समाज से आते हैं। ऐसे में कांग्रेस से दावेदारों की लंबी फेहरिस्त में सबसे ज्यादा ब्राह्मण उम्मीदवार हैं। इस सीट से कांग्रेस से 27 नेताओं ने दावेदारी जताई है, लेकिन इनमें 21 ब्राह्मण समाज से हैं। इससे पहले भी यहां ज्यादातर चुनाव में क्षत्रिय-ब्राह्मण नेता ही आमने-सामने रहे हैं।