कांग्रेस के सामने गढ़ बचाने की चुनौती, डबरा में इमरती के सामने नहीं मिल पा रहा दमदार चेहरा

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भोपाल। आगामी समय में डबरा विधानसभा सीट पर उपचुनाव होना है। डबरा विधानसभा सीट 2003 में अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हुई तभी से 2008, 2013 और 2018 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की प्रत्याशी इमरती देवी ने जीत दर्ज की। अगर चुनाव परिणामों को देखें तो यह सीट कांग्रेस का गढ़ रही है। लेकिन अब समीकरण बदल चुका है। क्योंकि अब इमरती देवी भाजपा में आ गई हैं। ऐसे में अब दोनों पार्टियों के सामने गढ़ बचाने की चुनौती है। अभी तक डबरा में भाजपा कमजोर स्थिति के पीछे सबसे बड़ा कारण यहां भाजपा के दो गुट होना रहा है। केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर और जल संसाधन मंत्री नरोत्तम मिश्रा के अलग-अलग गुट होने का फायदा कांग्रेस की इमरती देवी को मिलता रहा है।

भाजपा का आकलन है कि महिला एवं बाल विकास मंत्री इमरती देवी की उपचुनाव में जीत तय है। इसकी वजह यह है कि इस बार इमरती भाजपा की तरफ से चुनाव मैदान में होंगी। 2018 में डबरा सीट पर कुल 12 प्रत्याशी थे। यहां वोटकटवा उम्मीदवारों को 12,584 वोट मिले थे। 2018 में यहां कुल 1,49,489 वोट पड़े थे। इमरती देवी को 90,598, भाजपा के कप्तान सिंह सेहसरी को 33,152 और बसपा के पीएस मंडेलिया को 13,155 वोट मिले थे।

मप्र में भाजपा सरकार के लंबे दौर में चुनिंदा विस सीटें रहीं, जहां कांग्रेस बड़े अंतर से जीतती रही। ऐसी ही सीट रही है डबरा। कांटे के मुकाबले में नरोत्तम मिश्रा इसे भाजपा के पाले में ला सके थे, लेकिन पिछले 12 साल में हुए तीन विस चुनावों में इमरती देवी ने हर बार ज्यादा बड़े अंतर से सीट फतह की। ये जीत उन्हें कांग्रेस के टिकट पर मिलती रही, लेकिन अब वह भाजपा में हैं। वह शिवराज कैबिनेट में महिला एवं बाल विकास मंत्री हैं। उनका यहां से उपचुनाव लडऩा लगभग तय है। इधर, कांग्रेस इमरती देवी के खिलाफ मजबूत प्रत्याशी की तलाश में है। उसने कई दावेदारों को तैयारी करने को कहा है। जो ज्यादा मजबूत दिखेगा, मौका उसे ही मिल सकता है।

जातीय समीकरण
ग्वालियर जिले की डबरा सीट एससी के लिए सुरक्षित है। जातिगत समीकरण देखें तो यहां 14.1 प्रतिशत जाटव, 9.9 प्रतिशत ब्राह्मण, 9 प्रतिशत कुशवाह, 8.5 प्रतिशत बघेल, 6.6 प्रतिशत बनिया मतदाता हैं।
इसके सियासी मिजाज को समझने के लिए यदि पिछले तीन दशक के चुनावों को देखें तो पता चलता है कि मुकाबला भाजपा-कांग्रेस में ही रहा है। बीएसपी मैदान में होती है, लेकिन दूसरे या तीसरे स्थान के लिए। 1993 में बीएसपी के जसवंत सिंह रावत ने कड़े मुकाबले में कांग्रेस के सीताराम दुबे को 5038 वोटों से मात दी थी। भाजपा के नरोत्तम मिश्रा तीसरे स्थान पर थे। इसके बाद वह अब तक यहां जीत दर्ज नहीं कर सकी है। 1998 में नरोत्तम ने बीएसपी को पीछे छोड़ते हुए कांटे के मुकाबले में 3737 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की। समाजवादी पार्टी तीसरे, तो कांग्रेस चौथे स्थान पर रही। 2003 में भी मुकाबला बेहद रोमांचक रहा। नरोत्तम मिश्रा ने 769 वोटों के बारीक अंतर से जीत दर्ज कर सीट बरकरार रखी। इस बार कांग्रेस दूसरे, तो बीएसपी चौथे स्थान पर रही। 1993 में बीएसपी से विधायक रहे जसवंत सिंह रावत बतौर निर्दल मैदान में थे, जो तीसरे स्थान पर रहे। 2008 में नरोत्तम मिश्रा ने दतिया से चुनाव लड़ा और 11 हजार से अधिक वोटों से जीत दर्ज की। इधर डबरा सीट कांग्रेस के खाते में चली गई। इमरती देवी ने बीएसपी के हरगोविंद जौहरी को 10 हजार 630 वोटों के बड़े अंतर से हराया। भाजपा सीधे तीसरे स्थान पर चली गई। पार्टी प्रत्याशी डॉ। कमलापत आर्य 16 हजार 277 वोट ही हासिल कर सके। 2013 में भी इमरती देवी ने सीट बरकरार रखी। उन्होंने भाजपा के सुरेश राजे को 33 हजार 278 वोट के भारी अंतर से हराया। बीएसपी तीसरे स्थान पर सिमट गई। इस चुनाव में इमरती देवी ने 67 हजार 764 वोट हासिल किए थे। 2018 में भी इस सीट के परिणाम में कोई अंतर आया। कांग्रेस के टिकट पर इमरती देवी ने पहले से अधिक अंतर से जीत दर्ज की। उन्होंने 57,446 वोटों से भाजपा के कप्तान सिंह को पराजित किया। इस बार भी बीएसपी तीसरे स्थान पर रही।

इमरती देवी को सबक सीखाने की तैयारी
संदेह नहीं कि डबरा विस क्षेत्र में इमरती देवी मजबूत चेहरा रही हैं, जिसकी परख इस उपचुनाव में होना है, क्योंकि तीन चुनाव में भाजपा उन्हें पराजित न कर सकी और अब कांग्रेस उन्हें जीत से रोकने की हरसंभव कोशिश करेगी। इस बार की जीत उनका राजनीतिक कद काफी हद तक बढ़ा सकती है। कांग्रेस पार्टी विधानसभा उपचुनाव में डबरा सीट को लक्ष्य कर जातीय समीकरणों में तालमेल बैठाने का प्रयास कर रही है। जिला ग्रामीण कांग्रेस की कमान अशोक सिंह को सौंपने के बाद अब उनकी मदद के लिए कल्याण सिंह कंषाना, रंगनाथ तिवारी, सुल्तान सिंह रावत व पुष्पेंद्र जाटव को ग्रामीण जिला कांग्रेस का कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त किया गया है। ग्रामीण में कांग्रेस का पहले से मजबूत जनाधार है। विधानसभा चुनाव में 3 में से 2 सीटों पर कांग्रेस ने कब्जा बरकरार रखा था। इसी जनाधार को बनाए रखने के लिए प्रदेश कांग्रेस ने ब्राह्मण, गुर्जर, रावत व दलित को साधने का प्रयास किया है, अशोक सिंह पर पहले से प्रदेश की काफी जिम्मेदारी है। डबरा विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस के चुनाव चिन्ह पर इमरती देवी सुमन तीसरी बार जीत दर्जकर विधानसभा में पहुंची थीं। उन्हें ज्योतिरादित्य सिंधिया के कोटे से कमलनाथ मंत्री मंडल में कैबिनेट मंत्री बनाया गया था। इमरती देवी ने सिंधिया के समर्थन में मंत्री व विधायकी से इस्तीफा देकर भाजपा की सदस्यता ग्रहण कर ली है। इस कारण डबरा विधानसभा सीट पर उपचुनाव होना है। तमाम कोशिशों के बाद भी भाजपा डबरा व भितरवार में मजबूत जनाधार नहीं बना पाई है। इमरती देवी सुमन के पार्टी से इस्तीफा देने के बाद कांग्रेस जनाधार को बरकरार रखने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रही हैं। डबरा के समीकरणों के ध्यान में रखते हुए डबरा के ब्राह्मण व रावत वोटों को जोड़े रखने के लिए रंगनाथ तिवारी व सुल्तान सिंह रावत को कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त किया है। भितरवार से पुष्पेंद्र जाटव व ग्वालियर ग्रामीण से ताल्लुक रखने वाले कल्याण सिंह कंषाना को यह दायित्व सौंपा है।

दावेदार सक्रिय
डबरा विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा और कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्ताओं ने समीकरण बिठाने शुरू कर दिए हैं। कोई कार्यकर्ताओं और जनप्रतिनिधियों से ऑनलाइन कॉन्टेक्ट कर रहा है तो कोई टिकट के लिए भोपाल तक दौड़ लगा रहा है। कुछ नए चेहरों ने तो भोपाल मुख्यालय तक अपने बॉयोडेटा भेज दिए हैं और विधानसभा चुनाव लडऩे के लिए टिकट की मांग करनी शुरू कर दी है। भाजपा में इतने चेहरे अभी तक सामने नहीं आए जितने कांग्रेस के नए चेहरों ने इस बार चुनाव लडऩे की इच्छा जताई है और पार्टी के नेताओं को अपने लिए जोडऩे में लगे हुए हैं। भाजपा की ओर से तो हाल ही कांग्रेस से इस्तीफा देकर शामिल हुई इमरती देवी की मजबूत दावेदारी है। इधर कांग्रेस में पहले से ही सुरेश राजे, वृंदावन कोरी, सत्यप्रकाशी परसेडिय़ा का नाम चर्चा में है। इनके अलावा मध्यप्रदेश कांग्रेस कमेटी अनुसूचित जाति विभाग के संभागीय संयोजक डीडी बंसल और मप्र कांग्रेस अनुसूचित जाति की जिला संगठन मंत्री गुंजा जाटव ने भी बायोडेटा टिकट के लिए भिजवाए हैं। इधर चुनाव को लेकर पार्टियों ने सर्वे के माध्यम से लोगों का मन टटोलना शुरू कर दिया है।

वर्तमान में सबसे बड़ी समस्या
कोरोना के चलते डबरा क्षेत्र की रौनक फिलहाल इस बार नवरात्रि मेले में दंगल, नुक्कड़ नाटक आदि न होने से फिकी रह सकती है। इसमें हर साल लाखों की संख्या में लोग आते रहे हैं। फिर भी सियासी माहौल बनने लगा है। लोग हर चुनाव में उठने वाले मुद्दों पर बात कर रहे हैं। फैक्ट्री निर्माण से रोजगार की चर्चा भी है। क्षेत्र में मुख्य मांग रोजगार, बिजली और पानी की है। पार्वती शुगर मील से गन्ना पेमेंट का मामला भी उठता रहा है। शहर व ग्रामीण क्षेत्र में पेयजल समस्या का निदान नहीं होना, क्षेत्र में अवैध रेत का उत्खनन होना, बेरोजगारों को रोजगार उपलब्ध नहीं होना, शराब का अवैध कारोबार क्षेत्र में बढ़ा है। इसके अलावा अवैध रेत के परिवहन और लगातार इससे हो रही दुर्घटनाओं को रोकने के लिए कोई खास इंतजाम नहीं हैं। सिविल अस्पताल में पर्याप्त डॉक्टर नहीं होने से गंभीर घायल को ग्वालियर रैफर कर दिया जाता है।