पीएम आवास में घपला: स्वीकृत किसी और का, बना लिया किसी और ने

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शिकायत के बाद अभी तक नहीं हुई कोई कार्रवाई

मंडला, मामला सामने आने के बाद शिकायत जिला पंचायत में की गई। इसको लेकर गांव की जांच टीम भी पहुंची, लेकिन अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हुई। बताया गया है कि अर्थिक सामाजिक जनगणना वर्ष 2011 के हिसाब से ग्रामीण क्षेत्रों में जिन ग्रामीणों का कच्चा आवास है उन्हे पीएम आवास योजना से लाभांवित किया जा रहा है। यहां बिछिया जनपद की ग्राम पंचायत  दानीटोला की सत्तर वर्षीय उमा बाई पिता राखी माता समारो बाई विश्वकर्मा के नाम पर वर्ष 2018 में पीएम आवास स्वीकृत हुआ है। गरीब और बेसहारा वृद्वा का नाम पीएम आवास योजना में आ गया है, लेकिन इसके पहले ही वह कहीं चली गई,जिसका कोई पता नहीं है। इसका फायदा उठाते हुए दानीटोला के सरपंच सचिव और जनपद के अधिकारियो की मिलीभगत से उमा बाई का स्वीकृत आवास का निर्माण करा लिया है। जो पीएम आवास योजना की गाइडलाइन में आपात्र है।

दानीटोला निवासी 62 वर्षीय भरत लाल ने बताया है कि उमा बाई करीब सत्तर वर्ष की थी, उम्र के अखिरी पड़ाव में उसका सरकारी योजना में नाम आया,लेकिन उसे इसका लाभ नहीं मिल सका। वह अपने कच्चे मकान में अकेली ही रहती थी, पिछले तीन चार साल से उसका कोई पता नहीं है, गांव में किसी को नहीं मालूम है कि वह कहां गई। उसके रिश्तेदार से पता किया गया है लेकिन वे ही कोई जबाब नहीं दे पाए है। ग्रामीण सुशील साहू ने बताया है कि इस मामले की जांच के लिए जिपं से टीम भी आई थी जांच शिकायतकत्र्ता व ग्रामीणो के सामने नहीं की गई, पंचायत में बैठकर कुछ ग्रामीणो अंगूठा लगाकर ले गए। ग्रामीणो ने दोबारा जांच की मांग की है।

जानकारी देते हुये कहा कि पीएम आवास का निर्माण उमा बाई के लिए होना था लेकिन वह गांव में नहीं थी इसका फायदा उठाते हुए लक्ष्मी साहू ने पंचायत में यह शपथ पत्र प्रस्तुत किया है कि उमा बाई ही उसका नाम है। इस लिहाज से पीएम आवास का लाभ उसे दिया जाए। लक्ष्मी बाई के पन्द्रह बिदुओ में पात्रता का सत्यापन पंचायत समन्वयक के द्वारा किया गया है लेकिन उसके घर में ट्रेक्टर,बाइक और मटेरियल सप्लायर के साथ खेती की जमीन है। सब जानते हुए भी आपात्र और शासन को गुमराह करते हुए पीएम आवास का लाभ दे दिया गया। साक्ष्य मिलने के बाद भी जांच की फाईल इधर से उधर की टेबिल में पहुंच रही है, लेकिन धोकाधड़ी करने वाले पर अभी तक ठोस कार्यवाही करने का निर्णय कोई भी अधिकारी नहीं ले पाये, जबकि मामला वर्षों पुराना है।