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भदोही का यशस्वी जायसवाल क्रिकेट की दुनिया में बना भारत की शान

मैदान में गोलगप्पे बेचकर चलाते थे खर्च

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विश्वकप सेमीफाइनल में पाकिस्तान के खिलाफ भदोही के यशस्वी जायसवाल ने न सिर्फ शतक लगाई, बिल्क जीत भी दर्ज कराई है। इस जीत के जश्न में हर कोई फर्श से अर्श पर पहुंचे यशस्वी को बधाईयां दे रहा है। खासकर जायसवाल क्लब के राष्ट्रीय अध्यक्ष मनोज जायसवाल ने अपने बधाई संदेश में भदोही के यशस्वी को न सिर्फ भारत की बल्कि जायसवाल समाज की शान बताया है। उनके संघर्षों से प्रेरणा मिलती है कि आदमी चाहे तो अपनी मेहनत से कुछ भी हासिल कर सकता है। उसके भीतर के खिलाड़ी में लोग भविष्य का सचिन, धौनी और विराट देख रहे हैं
सुरेश गांधी
जी हां, मुंबई में पानी-पूरी, गोलगप्पे बेचते हुए दर-दर भटके यशस्वी जायसवाल के बल्ले की गूंज अब न सिर्फ भारत बल्कि पूरी दुनिया में सुनाई देने लगी है। हर तफ फिल्ड में उनके द्वारा लगाई गयी चैके-छक्के की ही चर्चा हो रही है। उनकी कामयाबी हजारों लाखों युवाओं की प्रेरणास्रोत बन चुका है। पायदान-दर-पायदान तक पहुंचने से पहले उनके कठिन चुनौतियों की किस्से हर किसी की जुबान पर है कि किस तरह मुश्किल वक्त में हर तरह के चैलेंज से लड़ते हुए यशस्वी ने क्रिकेट की दुनिया में अपनी जगह बनाई। क्रिकेट का जुनून उन्हें इस कदर सवार था कि अपनी सारी शर्म व शान को ताख पर रख जिन खिलाड़ियों के साथ खेलते थे, शाम को उन्हीं को आजाद मैदान में गोलगप्पे बेचा करते थे, क्योंकि पिता द्वारा भेजे गए पैसों से उनका गुजारा नहीं चल पाता था।

फिरहाल, उनकी त्याग और तपस्या उनके जीवन को एक झटके में बदल दिया। हाल यह है कि अब तो यशस्वी के बल्ले के करोड़ो लोग मुरीद बन चुके हैं। उन्होंने 4 फरवरी 2020 को पोचेस्त्ररूम (साउथ अफ्रीका) में पाकिस्तान के खिलाफ जिस तरह की पारी खेली, उसे देखकर कहा जाने लगा है कि भारतीय क्रिकेट का भविष्य सुरक्षित हाथों में है। इस मैच में यशस्वी ने नाबाद 105 रन बनाए और छक्के के साथ टीम की जीत और अपना शतक पूरा किया।
यह सब उनके कोच ज्वाला सिंह की बदौलत हुआ। इसीलिए वे खुद अपनी कामयाबी का श्रेय उन्हें ही देते है। यशस्वी ने बताया कि बल्लेबाजी के अभ्यास के दौरान उनकी मुलाकात स्थानीय कोच ज्वाला सिंह से हुई। कहते है ज्वाला सिंह ने जब यशस्वी को ए-डीवीजन गेंदबाज की गेंदे को आसानी से खेलते हुए देखा तो वह बहुत प्रभावित हुए और यशस्वी को प्रशिक्षण देने का फैसला किया। वह यशस्वी को अपने साथ घर ले गए और रोजाना क्रिकेट का अभ्यास कराने लगे। यही वजह है कि यशस्वी आज अपनी कामयाबी का श्रेय कोच ज्वाला सिंह को ही देते हैं। बता दें, उत्तर प्रदेश के भदोही के सुरियावां गाँव में उनका जन्म 28 दिसम्बर 2001 को हुआ था। उनके पिता भूपेन्द्र कुमार जायसवाल की हार्डवेयर की एक छोटी सी दुकान है। मां कंचन जायसवाल गृहिणी हैं। यशस्वी मुंबई में पानी-पूरी, गोलगप्पे बेचते हुए दर-दर भटकते रहे, लेकिन किक्रेट का जुनून इस कदर उन पर सवार था कि उसके लिए सारी परेशानियां हवा बनकर टलती रही। कभी पुटपाथ पर सोया तो कभी प्रैक्टिस करते-करते पिच ग्रांडड पर, तो कभी एक वक्त की ही रोटी नसीब हुई, लेकिन हौसला बना रहा। सोते-जागते बस एक ही ख्वाब था मुझे देश के लिए खेलना है। मेहनत रंगत लाई और आज वह पाकिस्तान को 10 विकेट से हराकर क्रिकेट-विश्व की सुर्खियों में आ चुका हैं।
टीमों की गुम बॉल तलाशने वाले मुंबई के युवा बल्लेबाज यशस्वी जायसवाल, जो आज इतिहास रच रहे हैं, वह तभी से क्रिकेटर बनने का सपना देखने लगे थे, जब 11 साल की उम्र में ही मुंबई पहुंच कर एक डेयरी में काम करने लगे थे। लेकिन एक दिन उनको डेयरी वाले ने भी काम से हटा दिया। दरअसल, रिश्तेदार संतोष ने उनको उस डेयरी में सोने की व्यवस्था की थी, जिसमें यह शर्त थी कि वे काम में थोड़ी मदद किया करेंगे, लेकिन वह दिनभर क्रिकेट का अभ्यास करते और रात में आकर सो जाते थे। इसीलिए डेयरी मालिक ने उनको अपने यहां सोने से मना कर दिया। वह पहली बार भदोही से सीधे मुंबई के वर्ली में रह रहे अपने के पास पहुंचे थे। चाचा के ठिकाने पर रहने की जगह बहुत कम थी। इसलिए वह वहां से निकलकर रहने का कोई दूसरा ठिकाना तलाशने लगे। उनके पास रहने के लिए कोई जगह नहीं थी। वह बताते हैं -’मैं सिर्फ यही सोचकर आया था कि मुझे बस क्रिकेट खेलना है और वह भी सिर्फ और सिर्फ मुंबई से। जब एक टेंट में रहते हैं तो आपके पास बिजली, पानी, बाथरूम जैसी सुविधाएं भी नहीं होती।’ उन्होंने तीन साल तक मुस्लिम यूनाइटेड क्लब में ग्राउंडमैन के साथ टेंट में गुजारे। टेंट में रहने के लिए भी बड़ी मशक्कत का सामना करना पड़ा था।
घरेलू क्रिकेट में दोहरा शतक लगाने वाले सबसे युवा खिलाड़ी यशस्वी आज मुंबई की तरफ से खेलते हैं। वह सलामी बल्लेबाज के तौर पर टीम में अपनी भूमिका निभाते हैं। यह युवा प्रतिभाशाली खिलाड़ी आईपीएल में राजस्थान रॉयल्स का भी लाड़ला बन चुका है। यशस्वी का नाम पहली बार उस वक़्त सुर्खियां बना, जब 2015 में स्कूली क्रिकेट प्रतियोगिता में उन्होंने 319 रन बना दिए और उनका नाम ’लिम्का बुक ऑफ वल्र्ड रिकॉर्ड’ में दर्ज हो गया। फिर उनका अंडर 16 और अंडर 19 में चयन हुआ। वह 2018 में अंडर-19 एशिया कप में टिम का हिस्सा बने। टीम के ओपनर के रूप में उन्होंने 85 रन बनाकर टिम को जीत दिलाई तो ’मैन ऑफ द मैच’ के खिताब से नवाजे गए। उस दिन भारत की इस अंडर-19 ने श्रीलंका की टीम को 144 रन से हराकर रेकॉर्ड छठी बार एशिया कप अपने नाम कर लिया। इस सीरीज के दौरान कई खिलाड़ियों ने बेहतरीन प्रदर्शन किया और उनमें से ही एक थे यशस्वी। यशस्वी ने तीन मैचों में 214 रन बनाए, जो टूर्नामेंट में किसी बल्लेबाज के सर्वाधिक रन रहे। अब उनकी बल्लेबाजी की दास्तान मुंबई की सड़कों से शुरू होकर विश्व कप तक पहुंच चुकी है। भारतीय टीम ने इस मैच में यशस्वी जैसे खिलाड़ियों के बूते ही पाकिस्तान को 10 विकेट से हराकर लगातार तीसरी बार इस टूर्नामेंट के फाइनल में जगह बनाई। यशस्वी ने अपने साथी दिव्यांश सक्सेना के साथ मिलकर पहले विकेट के लिए 176 रन जोड़े।
पिता भूपेन्द्र बताते है जब काफी दिन तक उसे कामयाबी नहीं मिली तो वे निराश हो गए थे। लेकिन यशस्वी कभी हार नहीं माना, जब भी बात होती तो यही गाना सुनाता ‘हम होंगे कामयाब एक दिन‘। आज उसकी मेहनत व हौसला का ही परिणाम है कि उसकी प्रतिभा को देश दुनिया सलाम कर रही है। उन्होंने बताया कि उसका चयन साउथ अफ्रीका में 2020 में खेले जाने वाले अंडर19 वल्र्ड कप 19 के लिए टीम इंडिया में हुआ है। अंडर19 वल्र्ड कप का आयोजन 17 जनवरी से 9 फरवरी तक किया जाएगा। ऑल इंडिया जूनियर सेलेक्शन कमेटी ने जैसे ही भारतीय टीम के ऐलान के साथ ही यशस्वी जायसवाल का नाम भी टीम के लिए घोषित किया, वैसे ही उनका सीना चैड़ा हो गया। उनके खुशी का ठिकाना नहीं रहा। पिता ने बताया कि वह बचपन से ही क्रिकेटर बनने का सपना देखने लगे था। उसे अपनी प्रतिभा पर भरोसा था। यह बात जब यशस्वी ने मुझे बताया तो हमने उसे मुंबई के वर्ली में रहने वाले भाई के पास भेजा।
11 साल की उम्र से यशस्वी खेलने तो लगे, लेकिन वहां उसे कई समयाओं से जुझना पड़ा। लेकिन उसकी सारी परेशानियां आज खुशी में बदल गयी है। पहली कामयाबी के बाद वह 3 फरवरी को हैदराबाद से बाबतपुर एयरपोर्ट पर पहुंचा, जहां से घर तक लोगों ने उसका गर्मजोशी से स्वागत किया। इसके बाद सुरियावां जाते समय चैरी बाजार में युवा क्रिकेट प्रेमियों ने स्वागत करते हुए फूलमाला से लाद दिया। पूरा गृहनगर जश्न में डूबा है। यशस्वी के सफतला के धागे में पिरोने वाले मां-बाप को लोग बधाईयां दे रहे है। मां कंचन गांव के ही एक स्कूल में अध्यापक है। कंचन ने बताया कि बेटे के संघर्ष के पीछे उसका परिश्रम है। सप्ताहभर पहले रात करीब साढ़े नौ बजे उससे बात हुई थी, लेकिन वह अपने भविष्य को लेकर परेशान था। असमंजस में था कि क्या होने वाला है उसके साथ। मुझे ढाई करोड़ नहीं चाहिये, चाहत है तो सिर्फ यशस्वी के यश की। वह फटाफट क्रिकेट खेले फिर भारतीय टीम की जर्सी भी पहने, तब पूरी होगी मां-बाप के दिल की हसरत। बता दें, यशस्वी जायसवाल को आईपीएल 2020 की कोलकाता में चल रही नीलामी में उनके बेस प्राइस से अधिक की रकम में खरीद लिया गया है। उन्हें लंबी बोली के बाद दो करोड़ और और 40 लाख रुपये में ख़रीदा गया।

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