कृषि विधेयक: विरोध के बहाने जमीन तलाशता विपक्ष

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आनन्द शुक्ल
प्रधानमंत्री मोदी द्वारा कृषि सुधार के लिए लाये गये विधेयकों को लेकर इन दिनों देश में विपक्षी दलों द्वारा भारी विरोध किया जा रहा है। देश के किसानांे को मजबूती और आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में किये गये मोदी के प्रयासों का विरोध करना औचित्य से परे लगता है। ऐसा लग रहा है जैसे मोदी की सफलताओं से आहत कांग्रेस और समूचा विपक्ष अब किसानों में भ्रम फैलाकर खुद के लिए राजनीतिक संजीवनी तलाशने में जुट गया है। इसमें वह राफेल की तरह एक बार फिर औंधे मुंह गिरेगा इसमें शंका नहीं। क्योंकि भ्रम की बैसाखी से मैराथन जीतने का सपना देख रहा है विपक्ष। क्योंकि 2004 से 2014 तक केन्द्र में यूपीए की सरकार थी और उसी दौरान वर्ष 2006 में स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट आयी थी जिसमें किसानों की उपज के समर्थन मूल्य को बढ़ाकर डेढ़ गुना किए जाने की सिफारिश थी। सवाल यह है कि कांग्रेस नीति यूपीए ने उसे लागू क्यों नहीं किया? गौर करने वाली बात यह है कि 10 वर्षों के शासन काल में अर्थात 2014 तक कांग्रेस उसे लागू नहीं कर पायी। अब जबकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इन विधेयकों के माध्यम से किसानों को अपनी फसल को बेचने की आजादी, समर्थन मूल्य प्रथा को बनाये रखने के साथ-साथ ‘वन नेशन-वन मार्केट‘ जैसे नये प्रावधान के तहत किसानों को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में निर्णय ले रहे हैं तब विपक्ष अपना विरोध दर्ज करा रहा है। ऐसे में चाहिए कि पहले वो अपने 10 वर्षों की किसान हितैषी नीतियों को आम जन और किसानों के बीच ले जाये और फिर बताये कि इस बिल में खामी क्या है?

कृषि विधेयकों के नये प्रावधानों की बात करें तो एक बात स्पष्ट हो रही है कि देश का अन्नदाता किसान अपनी फसल को ऊंचे दामों पर बेचने के लिए स्वतंत्र होगा। दूसरी बात कि बिचैलियों से किसानों को मुक्ति मिलेगी। वह अपनी फसल को खेत, खलिहान या घर से बेचने के लिए आजाद होगा। इसके साथ ही वो चाहे तो मण्डी भी जा सकता है या ई-ट्रेडिंग के माध्यम से भी लाभ ले सकता है। खास बात यह है कि अब कृषि में भी बड़े निवेशक अपना निवेश कर सकते हैं। यह निवेश भूमि के लिए नहीं बल्कि फसलों के लिए है। ऐसे में फसलों को लेकर होने वाले करार के मामले में यह कहना कि यह किसानों के साथ छलावा है नये भारत उन्नत भारत का विरोध करने जैसा है।

हमारे देश की अर्थव्यवस्था कृषि प्रधान है। ऐसे में हर हाल में किसानों के लिए जितनी भी कोशिशें की जायें उतना कम है। होना तो यह चाहिए कि समय के अनुसार कृषि क्षेत्र में उठाये गये इस प्रकार के सुधारवादी के लिए विपक्ष को अपनी रचनात्मक भूमिका निभानी चाहिए। उसे इन विचारों से भी उपर उठना होगा कि विपक्ष का मतलब केवल विरोध करना है।

मध्यप्रदेश की बात की जाये तो राज्य की शिवराज सरकार ने पहले से ही किसानों को मजबूती देने वाले कई प्रकार के प्रावधान किए हैं जिसमें प्रमुख रूप से प्रदेश में सिंचाई का रकबा बढ़ाना, नियमित बिजली सुविधा प्रदान करना, शून्य प्रतिशत ब्याज पर किसानों को ऋण उपलब्ध कराना, फसल बीमा तथा फसल का उचित मूल्य दिलाने, प्राकृतिक आपदा से सुरक्षा सुनिश्चित करने जैसे कई फैसले शामिल हैं। गौर करने वाली बात यह है कि शिवराज सरकार ने पहले से ही खेती को लाभ का धंधा बनाने का संकल्प ले रखा है। इस प्रकार का संकल्प देश की किसी और राज्य सरकार ने अभी फिलहाल लागू नहीं किया है। खेती की दिशा में शिवराज सरकार की कोशिशों का परिणाम है कि मध्यप्रदेश अब गेंहू उत्पादन में देश में सबसे आग्रणी है।

शिवराज सरकार के इन कदमों का भी स्वागत किया जाना चाहिए कि अभी हाल ही में उन्होंने खेती करने वाले किसानों के साथ-साथ पशुपालकों और मत्स्य पालकों को भी शून्य प्रतिशत ब्याज दर पर ऋण देने का फैसला किया है। इसके साथ ही प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि हितग्राहियों को किसान क्रेडिट कार्ड दिये जाने का फैसला किया गया है।
किसानों के हित में केन्द्र और राज्य सरकार द्वारा लिए जा रहे फैसले आने वाले नये आत्मनिर्भर भारत की बुनियाद है। इस को राजनीतिक नजरिये से नहीं बल्कि कृषि क्षेत्र में विस्तार, किसानों की आत्मनिर्भरता, आय दोगुनी और रोजगार से जोड़कर देखना चाहिए। इन कदमों से खेती के प्रति युवाओं के मन में रूझान पैदा होगी जो कि स्वागत योग्य है।