मप्र के 95 लाख आदिवासियों पर मंडरा रहा रोजी-रोटी का संकट !

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वनवासियों को बेदखल कर औद्योगिक घरानों के हवाले जंगल करने की रची जा रही है साजिश

vinod upadhyay
भोपाल। जलवायु परिवर्तन, अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं और राजस्व की आड़ में केंद्र सरकार ने समुदाय संचालित वन्य व्यवस्था पर कानून की कुल्हाड़ी चलाने जा रही है। इसके लिए सरकार 92 साल पुराने भारतीय वन अधिनियम (आईएफए), 1927 को बदलने जा रही है। इस बदलाव के साथ निजी कंपनियों को वन क्षेत्र सौंपे जाएंगे, ताकि वे वन उत्पादों से कमाई कर सरकार के राजस्व में वृद्धि करा सकें। ऐसा करने के लिए अकेल मप्र के 95 लाख आदिवासियों को जंगल से खदेड़ दिया जाएगा।

गौरतलब है कि मध्य प्रदेश की कुल जनसंख्या का लगभग 21 प्रतिशत यानी 1.5316 करोड़ आदिवासी हैं। इनमें से 95 लाख ऐसे हैं जो 77,462 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैले जंगल में या उसके आसपास निवास करते हैं और वन संपदा पर निर्भर हैं। प्रस्तावित संशोधन ऐसे समय आया है, जब वन अधिकार अधिनियम के होने के बावजूद वनवासियों के अधिकारों पर खतरा मंडरा रहा है। वन अधिकार अधिनियम के कार्यान्वयन पर जनजातीय कार्य मंत्रालय के द्वारा नवंबर, 2018 में संकलित आंकड़ों के अनुसार, भूमि पर मालिकाना अधिकार के लिए अब तक जताए गए कुल 42.1 लाख दावों में से सिर्फ 17.4 लाख दावों को ही स्वीकृत किया गया है। इनमें से सिर्फ 79,000 दावों को ही सामुदायिक वन अधिकार के तहत मान्यता दी गई है। नई व्यवस्था लागू होने के साथ ही इन पर भी खतरा आ जाएगा।

राज्यों को भेजा पत्र
जानकारी के अनुसार 7 मार्च को देश के सभी राज्यों के प्रमुख वन अधिकारियों को गोपनीय दस्तावेज भेजा गया है। भारत के वन महानिरीक्षक (वन नीति) नोयल थॉमस की तरफ से भेजे गए इस दस्तावेज में औपनिवेशिक काल के आईएफए को बदलने का प्रस्ताव है। सूत्रों के अनुसार, 2015 में एनडीए सरकार ने वन्य प्रशासनिक व्यवस्था में बदलाव का सुझाव देने के लिए टीएसआर सुब्रमण्यम समिति का गठन किया था। इसकी प्रमुख सिफारिशों में से आईएफए में संशोधन करना था। 2010 में एमबी शाह आयोग ने भी संशोधन का सुझाव दिया था। शुरुआत में ही आईएफए में संशोधन प्रक्रिया को गोपनीय बना दिया गया। 23 सितंबर, 2016 में पर्यावरण, वन एवं जलवायु मंत्रालय ने वन अधिकारियों के प्रभुत्व वाली एक समिति का गठन किया। इसमें चार राज्यों, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और मणिपुर के प्रधान मुख्य वन संरक्षक शामिल थे। समिति में तत्कालीन वन महानिरीक्षक रेखा पई, तत्कालीन वन उप महानिरीक्षक (वन नीति) नोयल थॉमस और सहायक महानिदेशक (वन्यजीव) एमएस नेगी थे। तीन गैर-सरकारी सदस्यों में वल्र्ड वाइड फंड फॉर नेचर (डब्ल्यूडब्ल्यूएफ) के महासचिव रवि शंकर, नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की भोपाल शाखा में पर्यावरण, वन एवं जलवायु मंत्रालय के सलाहकार शंकर श्रीवास्तव और उच्चतम न्यायालय के वकील संजय उपाध्याय शामिल थे।

निजी कंपनियों का बढ़ेगा दखल
एक और विवादास्पद बिंदु जो वन अधिकार अधिनियम को प्रभावित करता है, वह है सरकार द्वारा समर्थन प्राप्त उत्पादन वनों के निर्माण की योजना, जिसे सरकार ने 2015 में वनों की कटाई में निजी भागीदारी के मसौदे के रूप में मंजूरी दी थी, ताकि निजी कंपनियां वन भूमि पर पौधरोपण कर सकें। इसका उल्लेख राष्ट्रीय वन नीति, 2018 के मसौदे में किया गया था। प्रस्तावित संशोधन में निजी कंपनियों की सहायता से राष्ट्रीय और राज्य वन निधि के निर्माण की बात कही गई है। लेकिन, विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के वनों का निर्माण व्यावसायिक बाजारों के लिए लकड़ी के उत्पादन को बढ़ावा देगा, जो कुछ हद तक औपनिवेशिक काल में भी मौजूद थे। यह राष्ट्रीय वन नीति, 1988 के एकदम विपरीत है, जिसके केंद्र बिंदु में राजस्व नहीं, बल्कि पारीस्थितिकीय तंत्र और आजीविका की जरूरतें हैं।

वनोपज पर कंपनियों का अधिकार
वनांचल में वनोपज का संग्रहण कर आदिवासी अपनी दो वक्त की रोजी-रोटी की जुगाड़ करते हैं। इसके लिए उन्हें तपती-जलती गर्मी में मीलों भटकना पड़ता है। आदिवासी परिवार की आय का मुख्य जरिया वनोपज ही होती है। कोई जंगल से छिंदबाहरी काटता है तो कोई चिरायता के पौधे लाता है तो कोई महुआ बिनता है। लघु वनोपज को जंगलों से लाने का कार्य कोई और नहीं बल्कि आदिवासी ही करते हैं। लघुवनोपज से जहां उन्हें रोजगार भी मिल रहा है। वहीं उन्हें अतिरिक्त आय भी हो रही है। लघु वनोपज को शासन ने रायल्टी मुक्त किया है। जिसके चलते इन लघु वनोपज पर किसी भी प्रकार का शुल्क नहीं लगता है। इसी वजह से आदिवासियों द्वारा बड़ी मात्रा में लघु वनोपज की कटाई की जाती है। लेकिन इस पर भी कंपनियों की नजर लग गई है। समाजवादी जन परिषद के राजेंद्र गढ़वाल कहते हैं कि भारतीय वन अधिनियम, 1927 को बदलने की कवायद कंपनियों के इशारे पर की जा रही है।

वह कहते हैं कि बंगलौर, चेन्नई, दिल्ली या कोलकाता जैसे देश भर के विभिन्न प्रक्रिया स्थानों के लिए मध्य प्रदेश ही जड़ी बूटियों के कच्चे माल का मुख्य स्रोत रहा है। देश के 131 कृषि जलवायु क्षेत्रों में से मध्यप्रदेश में 11 क्षेत्र उपलब्ध है। यह औषधि उद्योग में इस्तेमाल होनेवाली 50 प्रतिशत से अधिक जड़ी बूटियों का प्राकृतिक निवास स्थान है। सरकार की मंशा है कि इससे एक बड़ा राजस्व प्राप्त करने के लिए इन्हें संग्रहित करने का अधिकार कंपनियों का दे दिया जाए। गढ़वाल कहते हैं कि यह तभी संभव है जब आदिवासियों को वन क्षेत्र से दूर कर दिया जाए।

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