3 सालों में 8 हजार गर्भवती महिलाएं कागजों में लापता

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पीसीपीएनडीटी एक्ट में हर गर्भवती महिला की सोनोग्राफी का रखा जाता है रिकॉर्ड

3 सालों का भौतिक सत्यापन अब कर रहा है प्रशासन

भोपाल। पीसीपीएनडीटी एक्ट लागू करने के बाद एक-एक गर्भवती महिला का रिकॉर्ड स्वास्थ्य विभाग द्वारा रखा जाता है। दरअसल डॉक्टर की सलाह पर गर्भवती महिलाओं की सोनोग्राफी करवाई जाती है, जिसके जरिए ये रिकॉर्ड मिलता है, क्योंकि सोनोग्राफी करवाते वक्त गर्भवती महिला से फार्म एफ भरवाया जाता है, जिसमें नाम, पता, उम्र, मोबाइल नम्बर भी दर्ज रहता है। इसका उद्देश्य यह है कि कन्या भ्रूण हत्या पर रोक लगाई जाए, क्योंकि सोनोग्राफी के जरिए लिंग पता लगाकर बड़े पैमाने पर कन्या भ्रूण हत्या भोपाल सहित देशभर में होती रही है। उसी की रोकथाम के लिए केन्द्र सरकार ने यह एक्ट बनाया और सभी सोनोग्राफी सेंटरों को इसके दायरे में लिया गया है। प्रशासन ने समीक्षा के दौरान पाया कि बीते 3 सालों का 8 हजार गर्भवती महिलाओं का रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। लिहाजा अब कागजों पर लापता इन गर्भवती महिलाओं की तलाश करवाई जा रही है।

कुछ साल पहले तक सोनोग्राफी सेंटरों पर आसानी से लिंग परीक्षण हो जाता था, जिसके चलते लड़के और लड़कियों की जन्म दर में काफी अंतर आने लगा। देश के कई क्षेत्र तो ऐसे हैं, जहां 100 लड़कों के जन्म पर 70 से 80 लड़कियों की ही जन्म दर रह गई। इसके पश्चात केन्द्र सरकार ने पीसीपीएनडीटी एक्ट बनाया, जिसमें लिंग परीक्षण पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाया और ऐसा करने वाले चिकित्सकों, सोनोग्राफी सेंटरों को सजा और जुर्माने के दायरे में लाया गया और गर्भपात करवाने वालों को भी सजा देने के कठोर कानूनी नियम बनाए गए। इतना ही नहीं, एक-एक सोनोग्राफी मशीन पर शासन-प्रशासन ने चिप लगवाई, ताकि हर सोनोग्राफी की ट्रैकिंग की जा सके।

दरअसल डॉक्टरों की सलाह पर गर्भवती महिलाओं की सोनोग्राफी करवाई जाती है, लेकिन उन सभी का रिकॉर्ड स्वास्थ्य विभाग रखता है और निजी, सरकारी अस्पतालों से लेकर जितने भी निजी सोनोग्राफी सेंटर, लैब हैं उन सभी को लाइसेंस देते वक्त पीसीपीएनडीटी एक्ट का कड़ाई से पालन करने की हिदायत भी दी जाती है और सभी सेंटरों पर लिंग परीक्षण प्रतिबंधित है इस आशय के सूचना बोर्ड भी लगवाए गए हैं। हालांकि चोरी-छुपे लिंग परीक्षण की शिकायतें सामने आती हैं, जिसके चलते प्रशासन पीसीपीएनडीटी एक्ट के तहत सोनोग्राफी सेंटरों को सील और संबंधित डॉक्टरों के खिलाफ कार्रवाई भी करता है। अभी प्रशासन को समीक्षा के दौरान यह तथ्य पता चला कि बीते 3 सालों में गर्र्भवती महिलाओं की जितनी भी सोनोग्राफी हुई उसकी तुलना में उनके भौतिक सत्यापन की रिपोर्ट प्राप्त नहीं हुई है।

कोरोना काल में घट गई थी सिजेरियन डिलेवरी भी

कोरोना काल में वायु, ध्वनि सहित अन्य प्रदूषणों से राहत मिली, क्योंकि कफ्र्यू-लॉकडाउन के कारण पूरा देश ही बंद रहा, वहीं इस दौरान यानी अप्रैल-मई के महीने में इंदौर सहित देशभर में सिजेरियन डिलेवरी की संख्या भी घट गई। बीते कुछ वर्षों में सामान्य के बजाय ऑपरेशन के जरिए अधिक डिलेवरी करवाई जाती है, ताकि निजी अस्पतालों में डॉक्टर और अन्य इलाज का बिल अधिक वसूल किया जा सके। कोरोना काल में चूंकि अधिकांश अस्पताल और डॉक्टर काम पर कम थे, लिहाजा सिजेरियन, यानी ऑपरेशन से डिलेवरी की संख्या घटी और सामान्य डिलेवरी बढ़ गई। उसके बाद हालांकि फिर सिजेरियन डिलेवरी ज्यादा होने लगी हैं।