आजादी के वर्षों बाद भी समस्याओं की गोद में आदिवासी

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बालाघाट
बड़ा ही बदनसीब है हमारा बालाघाट जिला और यंहा की आदिवासी जनता। जो मूलभूत सुविधाये और आधुनिकता से कोसो दूर है। इनके क्षेत्र में सड़क, बिजली, पानी, आवास, शिक्षा और स्वास्थ-चिकित्सा जैसी न जाने ऐसी कितनी समस्याएं है जिनका वर्षों बाद भी निराकरण नहीं हो पाया है। देश की भोली भाली आदिवासी जनता, जिनकी जिंदगी और दिनचर्या पर नजर डाले तो, देखते ही नजरे झुंक जाती है। इनके लिए योजनाएं तो बनी लेकिन सही मायने में इन्हें लाभ नहीं मिल रहा है।

जिले के नक्सल प्रभावित क्षेत्र में बसने वाली बैगा जनजाति के लोग, वर्षो से विकास कर बाट जोह रहे है। इनके अधिकांश क्षेत्रो में शिक्षा का स्तर लगातार घट रहा है। कहीं स्कूल भवन की कमी है तो शिक्षको की। चिकित्सा सेवा के भी हालात कुछ ऐसे ही है। जिले भर में उप-स्वास्थय केंद्र तो खोले गये है लेकिन यहां चिकित्सकों की कमी है। आदिवासी क्षेत्रो की सड़के इतनी खराब है कि राहगिरो का चलना दुर्भर है। बारिश के दिनों में नदी नाले उफान पर होने के कारण जिले के कई आदिवासी वन बाहुल्य गांव कैद हो जाते है, सडके कट जाती है। इस परिस्थिति में वन बाहुल्य क्षेत्र में रहने वाली आदिवासी जनता बारिश के दिनो घरो में ही दुबक कर रह जाती है। कई वन बाहुल्य गांव ऐसे है जहां बिजली का नामो निशान नहीं है, तो कुछ गांवों को विद्युतीकरण तो कर दिया है लेकिन लोगो के घर रोशन नहीं हुए।

आजादी के वर्षो बाद भी आदिवासी वन बाहुल्य क्षेत्र में दैनिक समस्यायें पीछा नहीं छोड़ रही है। गर्मी के दिनों में पेयजल समस्या से भी कभी नाता नही टूटा। भीषण गर्मी में बालाघाट जिले की आदिवासी जनता नदी नालों की छाती निचोड कर अपनी प्यास बुझाती आ रही है। ऐसी भयावह परिस्थिति से गुजरने के बाद भी हमारी आदिवासी जनता तमाशाबीन बनकर चुनावी दौर में सफेद पोशाक धारियो के लिये ताली ठोकती है।
 रोजगार जैसी समस्या आदिवासी समुदाय के लोगों को दूर प्रदेश तक पलायन करने पर मजबूर करती है। फिर भी रोजगार से जुड़ी इनकी तलाश खत्म नही होती। आज भी जिले में गरीब बैगा आदिवासी परिवार पक्के आशियाने की राह ताक रहे है। झोपडीनुमा आशियाने बैगा आदिवासीयो को बारिश के दिनों खून के आंसू रूलाते है। जिसके चलते उनकी उम्मीदे आज भी सरकार पर टिकी है, कि योजनाओ के माध्यम से उन्हे पक्का आवास मिलेगा।