नियमों पर भारी पड़ रही अप-डाउनकी परंपरा

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मुख्यालय में नहीं रहते अधिकारी-कर्मचारी

khemchandra vishwakarma
रीठी। कटनी जिले के गठन के साथ ही रीठी को 28 जुलाई 2001 में तहसील का दर्जा दिया गया था और उक्त तिथि से रीठी में तहसील कार्यालय का शुभारंभ भी किया गया था। जिसके साथ एसडीएम के भी बैठने की व्यवस्था की गई थी, लेकिन आज देखने में यह आ रहा है कि न तो तहसीलदार ही मुख्यालय में बैठना मुनासिब समझते न ही एसडीएम के ही दीदार हो पाते हैं। हालाकि तहसील मुख्यालय बनने के बाद से कुछ दिनों तक एसडीएम सप्ताह में एक दिन बैठकर लोगों की समस्या सुनते थे और लोगों को हद तक राहत भी मिलती थी, लेकिन जिले भर में व्याप्त अफसरशाही के कारण यह व्यवस्था भी बंद हो गई।
जिला मुख्यालय की राह पकड़ते हैं ग्रामीण
आलम यह है कि ग्रामीणों को अपनी समस्या या आवेदन देने के लिए 30 किलो मीटर दूर जिला मुख्यालय कटनी की राह पकडऩी पड़ती है। जिनका पूरा दिन आने-जाने में ही गुजर जाता है और वहां भी अधिकारी न मिले तो रही सही कसर भी पूरी हो जाती है। इसके अलावा रीठी में पदस्थ अन्य विभागों के अधिकारी एवं कर्मचारी मुख्यालय में निवास बनाकर रहने और ग्रामीणों की समस्याओं से उन्हें निजात दिलाने की बजाय उप-ंउचयडाउन करने की परंपरा का निर्वहन कर रहे हैं।
मुंह चिड़ा रहे सरकारी दफ्तर
इसी प्रकार बीआरसी विनीत गौतम, परियोजना अधिकारी सुल्ताना बेगम, पोषण पुर्नवास केन्द्र प्रभारी अंजना सिंह, हाई स्कूल प्राचार्य ऊषा दुबे, पोस्ट आफिस, अस्पताल, छात्रावास सहित अन्य विभागों के अधिकारी व कर्मचारी अप-डाउन संस्कृति को बड़ावा दे रहे हैं। जिसके चलते रीठी वासियों को परेशान होकर संबंधित कामों को लेकर जिला मुख्यालय की ओर भागना पड़ता है। रही बात रीठी तहसील की तो ग्रामीणों ने समस्या जाहिर करते हुए खुले शब्दों में कहा कि 15 वर्ष से अधिक का समय गुजर जाने के बाद आज भी यहां मौजूद सरकारी अमले की लापरवाही से ही साक्षात्कार हो रहे हैं। जबकि सुविधाओं के लिए बनाए गए कार्यालय महज मुहं चिड़ाने का काम ही कर रहे हैं।
ग्रामीणों को होती है परेशानी
जाहिर सी बात है कि ऐसे में शासन की योजनाओं का सही क्रियान्वयन नहीं हो पा रहा है। फिर ग्रामीणों को शासन द्वारा संचालित हितग्राही मूलक योजनाओं का लाभ मिलने की बात तो भला कोसों दूर है और तो और तहसील मुख्यालय क कमान संभाल रहे तहसीलदार स्वंय मुख्यालय पर रहने की बजाए उप-डाउन संस्कृति के वायरस से पीडि़त हैं। फिर उनके अधीनस्थ काम करने वाले कर्मचारी नियमों के मुंह पर तमाचा तो मारेंगें ही। ऐसा नहीं है कि तहसीलदार के मुख्यालय में न रहने के कारण ग्रामीणों को परेशानीयों का सामना करना पड़ रहा है और अपने कामों को लेकर तहसील कार्यालय के चक्कर काटना पड़ता है। बल्कि ऐसा ही कुछ आलम जनपद पंचायत का भी है। यहां मुख्य कार्यपालन अधिकारी एसके माल्वीय सहित सभी उपयंत्री भी प्रतिदिन अपने निवास से आवागमन करते हैं।