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राजनीति की कड़ाही में ‘पकौड़ा‘ रोजगार

'Pokura' employment in the pan of politics

पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘पकौड़ा‘ बेचने वाले को ‘रोजगारी‘ क्या कहा, पूरे देश में भुचाल आ गया है। सोशल मीडिया हो प्रिंट इलेक्ट्रानिक हो या शहर से लेकर गांव-देहात के चट्टी चैराहे हर जगह पकौड़े पर ही बहस छिड़ी हुई हैं। या यूं कहे मोदी के इस बयान के बाद ‘चाय‘ की तर्ज पर पकौड़े की भी राजनीति में एंट्री हो गई है। पक्ष-विपक्ष सभी ‘पकौड़े‘ की सियासत में जुट गए है। कहा जा सकता है जिस तरह ‘लोकसभा चुनाव – 2014‘ में ‘चाय पार्टी‘ ही बहस का मुद्दा बना था कुछ ऐसा ही लोकसभा चुनाव – 2019 में ‘पकौड़ा‘ ही छाया रहेगा। लेकिन बड़ा सवाल तो यही है क्या अपने फायदे के लिए ‘पकौड़े पर सियासत‘ कर रही है बीजेपी?

सुरेश गांधी
फिरहाल, इन दिनों सिर्फ एक ही चर्चा है, ‘अगर एक चायवाला भी देश का प्रधानमंत्री बन सकता है तो ‘पकौड़ा‘ तलने वाला उद्योगपति क्यों नहीं बन सकता‘? हालांकि मोदी को छोड़ दे तो चाय बेचने वाला, फेरी लगाने वाला, हाड़तोड़ मेहनत करने वाला मजदूर इस देश में उद्योगपति बना है, इसके एक-दो नहीं कई उदाहरण है। लेकिन जिस तरह देश में बढ़ती बेरोजगारी के बीच पकौड़े को रोजगार से जोड़ा जा रहा है, पढ़े-लिखे लाखों-करोड़ों युवाओं की पकौड़ा रोजगार से जोड़कर खिल्ली उड़ाई जा रही है वह समझ से परे हैं। खासतौर से तब जब खुद विकास की राह पर ले जाकर युवाओं को रोजगार देने का वादा पीएम नरेंद्र मोदी लगातार करते चले आ रहे हो।

'Pokura' employment in the pan of politicsचाय के बाद अब पकौड़ा पालिटिक्स में राजनीतिक पिच पर मोदी कितना सफल होंगे ये तो आठ प्रदेशों में होने जा रहे चुनाव और लोकसभा चुनाव 2019 के परिणाम बतायेंगे। लेकिन सच तो यही है मोदी सरकार अपने वादे के मुताबिक युवाओं को रोजगार देने में असफल ही रही है। केंद्र सरकार के लेबर ब्यूरो के आकंड़ों के मुताबिक साल 2016 में मैन्यूफेक्चरिंग, कंस्ट्रक्शन, ट्रेड समेत 8 प्रमुख सेक्टर में सिर्फ 2 लाख 31 हजार, साल 2015 में सिर्फ 1 लाख 55 हजार लोगों को ही नौकरियां दे सकी है। जबकि साल 2014 में 4 लाख 21 हजार लोगों को नौकरियां मिलीं। अगर सिर्फ 2017 की बात करें तो सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी की रिपोर्ट के मुताबिक 2017 में सिर्फ 20 लाख नौकरियां मिलीं। हालांकि सरकार एक रिपोर्ट के हवाले से यह दावा कर रही है कि 2017 में 70 लाख नौकरियां जबकि देश में अब भी 6 करोड़ 5 लाख 42 हजार लोग बेरोजगार हैं और मोदी ने वादा किया था कि सत्ता में आने के बाद हर साल एक करोड़ रोजगार पैदा करेंगे।

'Pokura' employment in the pan of politicsबेशक, बेरोजगारों की बढ़ती संख्या के बीच पहले प्रधानमंत्री और फिर अमित शाह ने जिस तरह ‘पकौड़े‘ का जिक्र किया है उसे 2014 के चाय पालिटिक्स से जोड़कर देखा जाने लगा है। मोदी एंड कंपनी द्वारा हवा फैलाई जा रही है कि एक आम आदमी चाय बेचकर प्रधानमंत्री बन सकता है तो ‘पकौड़े बेचने वाला बिजनेसमैन क्यों नहीं बन सकता है। कोई इसको रोजगार से जोड़कर देख रहा है तो कोई इसके माध्यम से सत्ता पक्ष पर तंज कस रहा है। कई राजनेता तो ऐसे हैं जो सत्ता पक्ष का विरोध करने के लिए सड़कों पर पकौड़े तलते देखे गए हैं। जो भी हो, बेचारे पकौड़े को भी आखिरकार चाय पर चर्चा के बाद तवज्जो मिल ही गई। इसके भी दिन बहुरे और आखिरकार सियासत के काम आया। वैसे भी चाय के साथ पकौड़े या पकौड़ी का जबर्दस्त कांबीनेशन बनता है। इसका चाय पे चर्चा के बीच पीछे छूटना सियासत को भा नहीं रहा था। सो, इसकी भी सियासी मेन्यू में शामिल कर कम से कम इसका भी मान रखने का काम किया गया है। जगह-जगह पकोड़ा तलकर और लोगों में बांटकर पीएम के बयान की आलोचना हो रही है। बेंगलुरु, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान हर जगह पीएम के इस बयान की आलोचना हो रही है। बेंगलुरु में छात्रों ने डिग्री लेते समय पहना जाने वाला गाउन पहनकर पकोड़े बेचे तो यूपी में पीएम पकोड़ा सेंटर तक खोल दिया गया।

'Pokura' employment in the pan of politicsबता दें, साल 2013 में आगरा की एक ऐतिहासिक रैली में मोदी ने कांग्रेस सरकार को रोजगार के मुद्दे पर घेर कर युवा पीढ़ी की दुखती रग पर हाथ रखा था। मोदी ने भारत को युवाओं का देश बताते हुए उन्हें विकास की राह पर ले जाकर रोजगार का सपना दिखाया था। युवाओं का वो सपना साकार हुआ या नहीं और क्या सरकार युवाओं को रोजगार देने का वादा पूरा कर पाई? यह अलग बहस का मुद्दा है लेकिन लगातार ट्रेंड कर रहे पकौड़ा पाॅलिटिक्स में कितने युवाओं को नौकरियां मिलीं और क्या देश में बेरोजगारी दर घटी? के सावल पीछे छूट गए हैं। हाल यह है कि पूरब से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक पकौड़ों की कड़ाहियों में राजनीतिक तेल उबाल पैदा कर दिया है। सोशल मीडिया पर इसका मजाक उड़ाया जा रहा है। कहा जा रहा है ‘ क्या पीएम पढ़े-लिखों से पकौड़े बनवाना चाहते हैं? कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम ने फिर ट्वीट कर कहा कि ‘अगर पकौड़े बेचना जॉब है, तो फिर भीख मांगना भी रोजगार है।‘ फिर बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने राज्यसभा में जो जवाब दिया उस पर तो प़क्ष-विपक्ष से लेकर चट्टी-चैराहों तक जंग छिड़ी है, क्या ‘पकौड़े‘ को रोजगार से जोड़ने पर बीजेपी को सियासी फायदा मिलेगा? माना जा रहा है कि शाह के इस बयान के पीछे कुछ न कुछ रणनीती जरूर होगी, क्योंकि शाह के मुंह से कोई बात यूंही नहीं निकलती। अगर शाह के बयान को राजनीतिक चश्मे से देखा जाए, तो पता चलता है कि बीजेपी ‘पकौड़े‘ के जरिए अपनी सियासत चमकाने की कोशिश कर रही है।

'Pokura' employment in the pan of politicsपीएम मोदी ने जब पहली बार ‘पकौड़े वाले‘ का जिक्र किया था, तो शायद ही किसी ने सोचा होगा कि ये एक दिन रोजगार और गरीबी जैसे बड़े मुद्दों पर भी भारी पड़ जाएगा। बीजेपी ने अब ‘पकौड़े‘ को सिंबल बना दिया है। ऐसा सिंबल जिसके जरिए सियासत की जा रही है। जिस तरह से 2014 के लोकसभा चुनावों में ‘चाय वाले‘ को सिंबल बनाया गया था, ठीक उसी तरह से 2019 में ‘पकौड़े वाले‘ को सिंबल बनाया जा रहा है। इसके जरिए गरीब लोगों को और छोटे-मोटे धंधे लगाने वालों को टारगेट करने की कोशिश की जा रही है। बीजेपी पकौड़े के जरिए गरीबी और बेरोजगारी जैसी गंभीर समस्या को ‘गौरव‘ में बदलने की कोशिश कर रही है। बातें फैलाई जा रही है कि देश में एक ऐसा प्रधानमंत्री है, जो गरीबों और मेहनतकश लोगों के दुख-दर्द को समझता है। खुद प्रधानमंत्री भी चुनावी रैलियां हों या अंतर्राष्ट्रीय मंच, खुदको ‘चाय वाला‘ बताने में हिचकते नहीं हैं, ताकि गरीबों से कनेक्शन बने रहे। ऐसे में अगर विरोधी उनके ऐसे किसी बयान का मजाक उड़ाते हैं, तो उसे तुरंत गरीबों के अपमान से जोड़ दिया जाता है। ये कोई आज की बात नहीं है। ये हमेशा देखने को मिलता रहा है। बीजेपी ने कुछ नया किया और विरोधियों ने उसका मजाक उड़ाया तो बीजेपी ने उसे सीधे ‘अपमान‘ करार दिया। इस बार भी यही हुआ।

बीजेपी ने चितंबरम के बयान को ‘गरीबों के अपमान‘ से जोड़ दिया। बीजेपी ने ट्विटर पर एक वीडियो शेयर करते हुए कहा है कि ‘कांग्रेस पार्टी ने गरीब और आकांक्षी भारतीयों का फिर से अपमान किया है। लाखों भारतीयों की आजीविका की तुलना भीख मांगने से करके कांग्रेस ने गरीबों का हमेशा की तरह अपमान किया है।‘ अगर इस वक्त किसी राज्य में चुनाव होते तो बेशक चिदंबरम का ये बयान कांग्रेस के लिए गले की हड्डी बन जाता। ठीक वैसे ही, जैसे गुजरात चुनावों में मणिशंकर अय्यर का बयान बना था। अभी तक ऐसा होता रहा है कि शहरी मिडिल क्लास बीजेपी के वोटर रहे हैं और चुनावों में भी इसी तबके ने बीजेपी को सबसे ज्यादा वोट दिया है। लेकिन मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से पिछड़ों और दलितों में भी बीजेपी के वोटर बढ़े हैं और इसका असर पिछले साल हुए यूपी चुनावों में देखने को मिला। अब हाल ही में मोदी सरकार का जो आखिरी फुल बजट पेश हुआ है, उसमें आम आदमी को कोई राहत नहीं दी गई। जिससे मिडिल क्लास में बीजेपी को लेकर नाराजगी है, लेकिन ये नाराजगी कब तक रहती है ये तो चुनावों में ही पता चलेगा। उससे पहले बीजेपी अपना गरीब वोट बैंक तैयार कर रही है और उसके लिए बजट में भी गरीबों का ध्यान रखा गया और अब ‘पकौड़े‘ के जरिए भी गरीब वोटरों को साधने की कोशिश की जा रही है। इस बात को माना जाए या न माना जाए, लेकिन पकौड़े वालों की बात करके बीजेपी ने गरीबों को अपनी तरफ खींचा तो है। अमित शाह तो बढ़ती इस बेरोजगारी का ठिकरा तो कांग्रेस पर हीि फोड़ा, कहा समस्या है मगर 55 साल से कांग्रेस शासन के बाद ये हाल है तो कौन जिम्मेदार है?

जीरों से हीरो बनने के कई उदाहरण
‘पकौड़ा‘ पॉलिटिक्स का लाभ होगा या हानि, लेकिन सच तो यही है कि जो लोग इसकी खिल्ली उड़ा रहे है, वे यह क्यों नहीं समझते कि चाहे वह बड़े उद्योगपतियों का घराना हो या फिल्मी जगत अधिकांश छोटे-मोटे रोजगारों से ही फर्श से अर्श पर पहुंचे है। चाट पकौड़े या ठेला खुमचा लगाने वाले भी इसी कड़ी में शामिल है। योग गुरु बाबा रामदेव इसके ज्वलंत उदाहरण है। उनकी जीवनी संघर्षो से भरा पड़ा है। उनका जीवन किसी करिश्में से कम नहीं है। उन्हें महज आठ साल की उम्र में आधे शरीर में पैरालिसिस का अटैक आ गया था। बिस्तर से उठ नहीं सकते थे। उनकी एक आंख पर उस अटैक का असर अब भी दिखता है। लेकिन वे जड़ी बूटी युक्त दवाइयों के कारोबार से हजारों हजार करोड़ के मालिक बन गए हैं। जिस टूटही स्कूटर से वे दवाईयों की फेरी लगात थे, वह अब भी उनके आश्रम में जतन से रखा गया है। रामदेव सिर्फ अपने उत्पादों को लेकर ही नहीं, बाकी चीजों में भी स्वदेसी के आग्रही हैं। ठेला लगाने वाले संजय यादव कहते है नेताजी भले ही पकौड़े को लेकर कुछ भी कह रहे हों लेकिन असलियत में बेरोजगार रहने से तो अच्छा है कि पकौड़े बनाकर कमाई करें और किसी के आगे हाथ न फैलाएं। वे बताते हैं कि उनके साथ ठेले पर काम करने वाले तीन-चार और लोगों की रोजी चल रही है। कोई कुछ भी कहे लेकिन हमारे लिए पकौड़ा ही श्जिंदगीश् चलाने का जरिया है।

बेरोजगारी पर पीएम मोदी का पलटवार
पीएम बोले कि जो लोग रोजगारी और बेरोजगारी की चर्चा करते हैं वो आंकड़ा पूरे देश का होता है। जब बेरोजगारी का आंकड़ा दिया जाता है तो देश का लेकिन रोजगारी का आंकड़ा राज्य के आधार पर दिया जाता है। राज्य सरकारों ने आंकड़े दिए हैं उनका मानना है कि करीब 1 करोड़ लोगों को रोजगार मिला है। ये आंकड़ा गैर-एनडीए राज्य सरकारों ने दिया है। सिर्फ बंगाल, कर्नाटक, ओडिशा, केरल में 1 करोड़ रोजगार मिला है। मिडिल क्लास परिवार का नौजवान नौकरी के लिए भीख नहीं मांग रहा है। आजकल युवा स्टार्टअप की तैयारी कर रहे हैं, हम उनकी मदद कर रहे हैं। सरकार ने पीएम मुद्रा योजना के तहत 10 करोड़ लोगों लोन दिया गया।

भारत में 12 करोड़ लोग बेरोजगार
भारत में खासकर युवा तबके में बढ़ती बेरोजगारी गंभीर चिंता का विषय बनती जा रही है। केंद्र सरकार की ओर से जारी ताजा आंकड़ों में कहा गया है कि देश की आबादी के लगभग 11 फीसदी यानि 12 करोड़ लोगों को नौकरियों की तलाश है। सबसे चिंता की बात यह है कि इनमें पढ़े-लिखे युवाओं की तादाद ही सबसे ज्यादा है। बेरोजगारों में 25 फीसदी 20 से 24 आयुवर्ग के हैं, जबकि 25 से 29 वर्ष की उम्र वाले युवकों की तादाद 17 फीसदी है। 20 साल से ज्यादा उम्र के 14.30 करोड़ युवाओं को नौकरी की तलाश है। वर्ष 2011 की जनगणना के आधार पर केंद्र सरकार की ओर से हाल में जारी इन आंकड़ों में महिला बेरोजगारी का पहलू भी सामने आया है। नौकरी की तलाश करने वालों में लगभग आधी महिलाएं शामिल हैं। इससे यह मिथक भी टूटा है कि महिलाएं नौकरी की बजाय घरेलू कामकाज को ज्यादा तरजीह देती हैं। इनमें कहा गया है कि बेरोजगारों में 10वीं या 12वीं तक पढ़े युवाओं की तादाद 15 फीसदी है। यह तादाद लगभग 2.70 करोड़ है. तकनीकी शिक्षा हासिल करने वाले 16 फीसदी युवा भी बेरोजागारों की कतार में हैं। इससे साफ है कि देश के तकनीकी संस्थानों और उद्योग जगत में और बेहतर तालमेल जरूरी है।

पकौड़ा क्यों नहीं बन सकता विकल्प
देखा जाएं तो पढ़े-लिखे युवा छोटी-मोटी नौकरियां करने की बजाय बेहतर मौके की तलाश करते रहते हैं। बेरोजगार युवाओं में लगभग आधे लोग ऐसे हैं जो साल में छह महीने या उससे कम कोई छोटा-मोटा काम करते हैं। उनमें पकौड़ा स्टाल भी है। लेकिन उनको स्थायी नौकरी की तलाश है। कुल बेरोजगारों में ऐसे लोगों की तादाद लगभग 34 फीसदी यानि 1.19 करोड़ है। वर्ष 2001 से 2011 के दौरान 15 से 24 वर्ष के युवाओं की आबादी में दोगुनी से ज्यादा वृद्धि हुई है, लेकिन दूसरी ओर उनमें बेरोजगारी की दर 17.6 फीसदी से बढ़ कर 20 फीसदी तक पहुंच गई है। वर्ष 2001 में जहां 3.35 करोड़ युवा बेरोजगार थे वहीं 2011 में यह तादाद 4.69 करोड़ पहुंच गई। वर्ष 2001 में युवाओं की आबादी एक करोड़ थी जो 2011 में 2.32 करोड़ हो गई यानि इसमें दोगुना से ज्यादा वृद्धि दर्ज हुई। इसके मुकाबले इस दौरान देश में कुल आबादी में 17.71 फीसदी वृद्धि दर्ज हुई। इन आंकड़ों से साफ है कि युवाओं की तादाद जहां तेजी से बढ़ रही है वहीं उनके लिए उस अनुपात में नौकरियां नहीं बढ़ रही हैं। ऐसे में पकौड़ा या अन्य स्टाल बेहतर विकल्प क्यों नहीं बन सकते।

पकौड़े बेचकर रामू जैसे कई बने उद्यमी
बात करीब 28 साल पुरानी है, नौकरी के लिए लाख जतन करने के बाद रामू को जब सफलता हाथ नहीं लगी तो उन्होंने सोच लिया कि अब वो कुछ अपना काम करेंगे। बस फिर क्या था कुछ पैसे उधार लिए और वाराणसी के जगतगंज रोड पर पकौड़े का ठेला लगाना शुरु किया। धीरे-धीरे ‘पकौड़े के स्वाद‘ ने ‘रफ्तार‘ पकड़ी और ये पारिवारिक बिजनेस बन गया। उनके पिता और उनके चाचा, ताऊ के लड़के भी पकौड़े तलने के बिजनेस में जुट गए और फिर पकौड़े के साथ-साथ खस्ते भी बेचने शुरू कर दिया। बेटे और भतीजे सबके सब सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक हर रोज यही करते हैं। उनका कहना है कि हम अपने बिजनेस से बहुत खुश हैं और रोजाना हजारों रुपए का टर्नओवर है। नेताओं की पकौड़ा कथा से हमारे बिजनेस का प्रचार हो रहा है। उनका कहना है कि नेता पकौड़े को कुछ भी कहें लेकिन हमारे लिए तो ‘जिंदगी‘ का हिस्सा है। पांडेयपुर व कचहरी के सलीम व नरोत्तम की भी रामकहानी ऐसी ही है। उनके मुताबिक, मेरे अलावा ऐसे कई लड़कों को एक झटके में नौकरी से अलग कर दिया गया। उसके बाद दोबारा रोजगार नहीं मिला। काफी कोशिश के बाद भी जब सफलता नहीं मिली तो चाय नाश्ता की दुकान खोल ली। अब बहुत ही अच्छा है नौकरी से ज्यादा आमदनी है। अगर इसी तरह पढ़े-लिखे बेरोजगारों के साथ मजाक होता रहा तो कैसे युवा अपने परिवार का भरण पोषण करेंगे। उनका कहना है कि शासन की रोजगार नीति काफी लचर है। जिसके चलते पढ़े लिखे युवाओं को बेरोजगारी झेलना पड़ रही है।

भारत में बढ़ सकता है बेरोजगारी
संयुक्त राष्ट्र श्रम संगठन की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2017 और 2018 के बीच भारत में बेरोजगारी में मामूली इजाफा हो सकता है और रोजगार सृजन में बाधा आने के संकेत हैं। रिपोर्ट के अनुसार रोजगार जरूरतों के कारण आर्थिक विकास पिछड़ता प्रतीत हो रहा है और इसमें पूरे 2017 के दौरान बेरोजगारी बढ़ने तथा सामाजिक असामनता की स्थिति के और बिगड़ने की आशंका जताई गई है। वर्ष 2017 और वर्ष 2018 में भारत में रोजगार सृजन की गतिविधियों के गति पकड़ने की संभावना नहीं है क्योंकि इस दौरान धीरे धीरे बेरोजगारी बढ़ेगी और प्रतिशत के संदर्भ में इसमें गतिहीनता दिखाई देगी। रिपोर्ट के अनुसार, ‘‘आशंका है कि पिछले साल के 1.77 करोड़ बेरोजगारों की तुलना में 2017 में भारत में बेरोजगारों की संख्या 1.78 करोड़ और उसके अगले साल 1.8 करोड़ हो सकती है। प्रतिशत के संदर्भ में 2017-18 में बेरोजगारी दर 3.4 प्रतिशत बनी रहेगी।’’ वर्ष 2016 में रोजगार सृजन के संदर्भ में भारत का प्रदर्शन थोड़ा अच्छा था। रिपोर्ट में यह भी स्वीकार किया गया कि 2016 में भारत की 7.6 प्रतिशत की वृद्धि दर ने पिछले साल दक्षिण एशिया के लिए 6.8 प्रतिशत की वृद्धि दर हासिल करने में मदद की है। रिपोर्ट के अनुसार, ‘‘विनिर्माण विकास ने भारत के हालिया आर्थिक प्रदर्शन को आधार मुहैया कराया है, जो क्षेत्र के जिंस निर्यातकों के लिए अतिरिक्त मांग बढ़ाने में मदद कर सकता है।’’ रिपोर्ट में कहा गया है कि वैश्विक बेरोजगारी दर और स्तर अल्पकालिक तौर पर उच्च बने रह सकते हैं क्योंकि वैश्विक श्रम बल में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है। विशेषकर वैश्विक बेरोजगारी दर में 2016 के 5.7 प्रतिशत की तुलना में 2017 में 5.8 प्रतिशत की मामूली बढ़त की संभावना है।

ajay dwivedi
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