महाशिवरात्रि पर विशेष: शिव और शक्ति के महामिलन की रात्रि है शिवरात्रि

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देवों के देव महादेव भगवान शिव-शंभू, भोलेनाथ शंकर की आराधना, उपासना का त्यौहार है महाशिवरात्रि। यह पर्व पूरे देश में पूर्ण श्रद्धाभाव के साथ मनाया जाता है। वैसे तो पूरे साल शिवरात्रि का त्यौहार दो बार आता है लेकिन फाल्गुन महीने की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी अर्थात अमावस्या से एक दिन पहले वाली रात को महाशिवरात्रि का त्यौहार मनाया जाता है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार सूर्य देव भी इस समय तक उत्तरायण में आ चुके होते हैं तथा ऋतु परिवर्तन का यह समय अत्यन्त शुभ माना गया है। भगवान शंकर सबका कल्याण करने वाले हैं। अतः महाशिवरात्रि पर सरल उपाय करने मात्र से ही सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं। जहां महिलाओं को अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है वहीं युवतियां अच्छे वर की प्राप्ति के लिए यह व्रत करती हैं। जबकि छात्र वर्ग को विद्या का वरदान मिलता है। वहीं महाशिवरात्रि का दिन किसी भी शुभ के लिए श्रेष्ठ होता है। महाशिवरात्रि को रात के समय शिवलिंग व शिव मूर्ति की पूजा का विशेष महत्व है

Maha Shivaratri Special: Shivaratri night of Shiva and Shakti Mhamiln



सुरेश गांधी
वास्तव में शिव की महिमा अपरंपार है। जिनके कोष में भभूत के अतिरिक्त कुछ नहीं है परंतु वह निरंतर तीनों लोकों का भरण पोषण करने वाले हैं। परम दरिद्र शमशानवासी होकर भी वह समस्त संपदाओं के उद्गम हैं और त्रिलोकी के नाथ हैं। अगाध महासागर की भांति शिव सर्वत्र व्याप्त हैं। वह सर्वेश्वर हैं। अत्यंत भयानक रूप के स्वामी होकर भी स्वयं शिव हैं। शिव अनंत हैं। शिव की अनंतता भी अनंत है। शिव स्वयं आनंदमय हैं। कहते है मानव जब सभी प्रकार के बंधनों और सम्मोहनों से मुक्त हो जाता है तो स्वयं शिव के समान हो जाता है। समस्त भौतिक बंधनों से मुक्ति होने पर ही मनुष्य को शिवत्व प्राप्त होता है। ज्योतिष गणना के अनुसार चतुर्दशी तिथि को चंद्रमा अपनी क्षीणस्थ अवस्था में पहुंच जाते हैं। इस कारण बलहीन चंद्रमा सृष्टि को ऊर्जा देने में असमर्थ हो जाते हैं। चंद्रमा का सीधा संबंध मन से कहा गया है। मन कमजोर होने पर भौतिक संताप प्राणी को घेर लेता है तथा विषाद की स्थिति उत्पन्न होती है। इससे कष्टों का सामना करना पड़ता है। चंद्रमा भगवान शिव के मस्तक पर विराजमान हैं और ऐसे में उनकी आराधना करने मात्र से ही सभी कष्ट दूर हो जाते हैं।

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भगवान शंकर आदि-अनादि हैं और सृष्टि के विनाश व पुनः स्थापना के बीच की कड़ी हैं। भगवान शंकर को सुखों का आधार मान कर महाशिवरात्रि पर अनेक प्रकार के अनुष्ठान करने का महत्व है। प्राचीन ग्रंथों के अनुसार, इस सृष्टि से पहले सत और असत नहीं थे, केवल भगवान शिव थे। जो सर्वस्व देने वाले हैं। विश्व की रक्षार्थ स्वयं विष पान करते हैं। अत्यंत कठिन यात्रा कर गंगा को सिर पर धारण करके मोक्षदायिनी गंगा को धरा पर अवतरित करते हैं। श्रद्धा, आस्था और प्रेम के बदले सब कुछ प्रदान करते हैं। शिव की शक्ति रात्रि ही है जो विश्व के समस्त प्राणियों को जीने की राह सिखाता है। बताता है सत्य ही शिव है, शिव ही सुंदर है, इसके सिवाय कुछ भी नहीं है। अर्थात शिव और शिवत्व की दिव्यता को जान लेने का महापर्व है महाशिवरात्रि। महाशिवरात्रि शिव और पार्वती के वैवाहिक जीवन में प्रवेश का दिन होने के कारण प्रेम का दिन है। यह प्रेम त्याग और आनंद का पर्व है। शिव स्वयं आनंदमय हैं। कहते है मानव जब सभी प्रकार के बंधनों और सम्मोहनों से मुक्त हो जाता है तो स्वयं शिव के समान हो जाता है। समस्त भौतिक बंधनों से मुक्ति होने पर ही मनुष्य को शिवत्व प्राप्त होता है।

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देवाधिदेव महादेव
शिव को देवाधिदेव महादेव इसलिए कहा गया है कि वे देवता, दैत्य, मनुष्य, नाग, किन्नर, गंधर्व पशु-पक्षी एवं समस्त वनस्पति जगत के भी स्वामी हैं। शिव की अराधना से संपूर्ण सृष्टि में अनुशासन, समन्वय और प्रेम भक्ति का संचार होने लगता है। इसीलिए, स्तुति गान है- मैं आपकी अनंत शक्ति को भला क्या समझ सकता हूं। हे शिव, आप जिस रूप में भी हों, उसी रूप को मेरा प्रणाम। शिव यानी ‘कल्याण करने वाला’। शिव ही शंकर हैं। शिव के ‘श’ का अर्थ है कल्याण और क का अर्थ है करने वाला। शिव, अद्वैत, कल्याण- ये सारे शब्द एक ही अर्थ के बोधक हैं। शिव ही ब्रह्मा हैं, ब्रह्मा ही शिव हैं। ब्रह्मा जगत के जन्मादि के कारण हैं। शिव और शक्ति का सम्मिलित स्वरुप हमारी संस्कृति के विभिन्न आयामों का प्रदर्शक है। शिव औघड़दानी है और दुसरों पर सहज कृपा करना उनका सहज स्वभाव है। अर्थात शिव सहज है, शिव सुंदर है, शिव सत्य सनातन है, शिव सत्य है, शिव परम पावन मंगल प्रदाता है, शिव कल्याणकारी है, शिव शुभकारी है, शिव अविनाशी है, शिव प्रलयकारी है, इसीलिए तो उनका शुभ मंगलमय हस्ताक्षर सत्यम् शिवम् सुन्दरम्, को सभी देव, दानव, मानव, जीव-जंतु, प्शु-पक्षी चर-अचर, आकाश-पाताल, सप्तपुरियों में शिव स्वरुप महादेव के लिंग का आत्म चिंतन कर धन्य होते हैं। यह कटु सत्य है। ओउम् नमः शिवाय, यह शिव का पंचाक्षरी मंत्र है।

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महाशिवरात्रि पर क्या हैं मान्यताएं
माना जाता है कि जब कुछ नहीं था अर्थात सृष्टि के आरंभ में इसी दिन मध्यरात्रि को भगवान ब्रह्मा के शरीर भगवान शंकर रुद्र रुप में प्रकट हुए थे। प्रलय की वेला में इसी दिन प्रदोष के समय भगवान शंकर ने तांडव करते हुए ब्रह्मांड को तीसरे नेत्र की ज्वाला से समाप्त किया था। इसीलिए इसे महाशिवरात्रि अथवा कालरात्रि भी कहा गया है। इसी दिन भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह भी इसी दिन हुआ था। इसलिये महाशिवरात्रि हिंदू धर्म में आस्था रखने वालों एवं भगवान शिव के उपासकों का एक मुख्य त्यौहार है। ऐसा भी माना जाता है कि महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव की पूजा करने, व्रत रखने और रात्रि जागरण करने से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं एवं उपासक के हृदय को पवित्र करते हैं। भगवान शंकर के भक्त महाशिवरात्रि के दिन शिव मंदिरों में जाकर शिवलिंग पर बिल्व-पत्र, बेल फल, बेर, धतूरा, भांग आदि चढ़ाते हैं, पूजन करते हैं, उपवास करते हैं तथा रात्रि को जागरण करते हैं। इस दिन रुद्राभिषेक और जलाभिषेक का भी विशेष महत्व होता है। महाशिवरात्रि के अवसर पर कई स्थानों पर रात्रि में भगवान शंकर की बारात भी निकाली जाती है। वास्तव में शिवरात्रि का पर्व स्वयं परमपिता परमात्मा के सृष्टि पर अवतरित होने की स्मृति दिलाता है। यहां रात्रि शब्द अज्ञान अन्धकार से होने वाले नैतिक पतन का परिचायक है। परमात्मा ही ज्ञानसागर है, जो मानव मात्र को सत्यज्ञान द्वारा अन्धकार से प्रकाश की ओर अथवा असत्य से सत्य की ओर ले जाते हैं। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, स्त्री-पुरुष, बालक, युवा और वृद्ध सभी इस व्रत को कर सकते हैं। महाशिवरात्रि भगवान शंकर का सबसे पवित्र दिन है। यह अपनी आत्मा को पुनीत करने का महाव्रत है। कहते हैं इस व्रत को करने मात्र से सभी पापों का नाश हो जाता है। हिंसक प्रवृत्ति बदल जाती है। निरीह जीवों के प्रति दया भाव उपजने लगता है। मान्यता यह भी है कि इस दिन भगवान शिव की सेवा में दान-पुण्य करने व शिव उपासना से उपासक को मोक्ष मिलता है। चतुर्दशी तिथि के स्वामी भगवान शंकर हैं और यह उनकी प्रिय तिथि है। ज्योतिष शास्त्रों में इसे शुभ फलदायी माना गया है और ज्योतिषी महाशिवरात्रि को भगवान शिव की आराधना कर कष्टों से मुक्ति पाने का सुझाव देते हैं।



शुभ मुहूर्त
24 फरवरी को महाशिवरात्रि है। निशिथ काल पूजा- 12.08 से 12.59 तक, 25 फिरवरी को पारण का समय- 06.54 से 15.24 है। 24 फरवरी को चतुर्दशी तिथि आरंभ- 21.38 बजे तथा समापन 25 फरवरी को 21.20 बजे है। महाशिवरात्रि का जागरण 24 फरवरी की रात को सर्वार्थ सिद्धि योग में होगा। चूंकि शुक्रवार को शिवरात्रि होने से इस दिन दूध, चावल, साबूदाना, मिठाई एवं शक्कर के साथ पूजन सामग्री का प्रयोग करना एवं ग्रहण करना विशेष फलदायी रहेगा। इस बार की शिवरात्रि की पूजा शिव भक्तों के लिए विशेष फलदायी भी रहने वाली है। इस दिन रात्रि में चारों पहरों की पूजा के लिए प्रथम प्रहर सूर्यास्त शाम को 6.30 बजे, द्वितीय पहर रात्रि 9.41 बजे, तृतीय प्रहर रात्रि 12.51 बजे एवं चतुर्थ प्रहर तड़के चार बजे से सूर्योदय तक रहेगा। वहीं 24 फरवरी शुक्रवार को निशीथ कालरात्रि 12.14 बजे से 01.04 मिनट तक शुभ है। कुछ ज्योतिषिचार्यों के बीच इस बार शिवरात्रि पूजन को लेकर मतभेद हैं। इस बार कुछ ज्योतिषाचार्य महाशिव रात्रि 25 फरवरी को बता रहे हैं क्योंकि 24 फरवरी को त्रयोदशी तिथि रात्रि 9.38 मिनट तक रहेगी। इसके बाद चतुर्दशी तिथि लगेगी, लेकिन इस रात्रि को निशीथ काल का समय आएगा। वहीं 25 फरवरी शनिवार को चतुर्दशी तिथि रात्रि 09.20 बजे तक की है अर्थात इस दिन निशीथ काल का समय नहीं आएगा। वहीं शिवरात्रि तो 24 फरवरी को मनेगी, लेकिन शिवजी की पूजा 24 फरवरी की रात से 25 फरवरी तक होगी।

चतुर्दशी तिथि के स्वामी है शिव
चतुर्दशी तिथि के स्वामी शिव हैं। सूर्य देव भी इस समय तक उत्तरायण में आ चुके होते हैं। चंद्रमा अपनी क्षीणस्थ अवस्था में पहुंच जाते हैं। इसके चलते बलहीन चंद्रमा सृष्टि को ऊर्जा देने में असमर्थ हो जाते हैं। चंद्रमा का सीधा संबंध मन से कहा गया है। अब मन कमजोर होने पर भौतिक संताप प्राणी को घेर लेते हैं तथा विषाद की स्थिति उत्पन्न होती है। जिससे कष्टों का सामना करना पड़ता है। चंद्रमा शिव के मस्तक पर सुशोभित है। अतः चंद्रदेव की कृपा प्राप्त करने के लिए भगवान शिव का आश्रय लिया जाता है। इसीलिए इसे परम शुभफलदायी कहा गया है।



महाशिवरात्रि पर्व पर कैसे करें शिव का पूजन
महाशिवरात्रि के दिन सुबह से ही शिवमंदिरों में श्रद्धालुओं, उपासकों की लंबी कतारें लग जाती हैं। जल अथवा दूध से श्रद्धालु भगवान शिव का अभिषेक करते हैं। गंगाजल या दूध, दही, घी, शहद और शक्कर के मिश्रण से शिवलिंग को स्नान करवाया जाता है। फिर चंदन लगाकर फूल, फल, बेल के पत्ते अर्पित किये जाते हैं। धूप और दीप से भगवान शिव का पूजन किया जाता है। कुछ श्रद्धालु इस दिन उपवास भी रखते हैं।

कहां करें शिव का पूजन
वैसे तो किसी भी शिव मंदिर में भगवान शिव की आराधना की जा सकती है। लेकिन किसी निर्जन स्थान पर बने शिव मंदिर की साफ-सफाई कर भगवान शिव की पूजा की जाये तो भगवान शिव शीघ्र मनोकामना पूरी करते हैं।

महाशिवरात्रि पर क्या करें भोजन?
भक्त इस बात का ख्याल रखें कि भगवान शंकर पर चढ़ाया गया नैवेद्य खाना निषिद्ध है। ऐसी मान्यता है कि जो इस नैवेद्य को खाता है, वह नरक के दुखों का भोग करता है। इस कष्ट के निवारण के लिए शिव की मूर्ति के पास शालीग्राम की मूर्ति का रहना अनिवार्य है। यदि शिव की मूर्ति के पास शालीग्राम हो, तो नैवेद्य खाने का कोई दोष नहीं है। व्रत के व्यंजनों में सामान्य नमक के स्थान पर सेंधा नमक का प्रयोग करते हैं। लाल मिर्च की जगह काली मिर्च का प्रयोग करते हैं। कुछ लोग व्रत में मूंगफली का उपयोग भी नहीं करते हैं। ऐसी स्थिति में आप मूंगफली को सामग्री में से हटा सकते हैं। व्रत में यदि कुछ नमकीन खाने की इच्छा हो, तो आप सिंघाड़े या कुट्टू के आटे के पकौड़े बना सकते हैं। इस व्रत में आप आलू सिंघाड़ा, दही बड़ा भी खा सकते हैं। सूखे दही बड़े भी खाने में स्वादिष्ट लगते हैं। तो, जितने आपको सूखे दही बड़े खाने हों उतने दही बड़े सूखे रख लीजिए और जितने दही में डुबाने हों दही में डुबो लीजिये। इस दिन साबूदाना भी खाया जाता है। साबूदाना में कार्बोहाइड्रेट की प्रमुखता होती है। इसमें कुछ मात्रा में कैल्शियम व विटामिन सी भी होता है। इसका उपयोग अधिकतर पापड़, खीर और खिचड़ी बनाने में होता है। व्रतधारी इसका खीर अथवा खिचड़ी बना कर उपयोग कर सकते हैं। साबूदाना दो तरह के होते हैं एक बड़े और एक सामान्य आकार के। यदि आप बड़ा साबूदाना प्रयोग कर रहे हैं तो इसे एक घंटा भिगोने की बजाय लगभग आठ घंटे भिगोये रखें। छोटे आकार के साबूदाने आपस में हल्के से चिपके चिपके रहते हैं लेकिन बड़े साबूदाने का पकवान ज्यादा स्वादिष्ट होता है। यदि आप उपवास के लिए साबूदाने की खिचड़ी बनाते हुए उसमें नमक सा स्वाद पाना चाहते हैं तो उसमें सामान्य नमक की जगह सेंधा नमक का प्रयोग करें।



राम-कृष्ण ने भी की शिव आराधना
स्वयं भगवान श्रीराम व श्रीकृष्ण ने भी अपने कार्यो की बाधारहित इष्टसिद्धि के लिए उनकी साधना की और शिवजी के शरणागत हुए। श्रीराम ने लंका विजय के पूर्व भगवान शिव की आराधना की। राक्षसराज हिरणाकश्यप का पुत्र प्रहलाद श्री विष्ण की पूजा में तत्पर रहता था। भगवान भोलेनाथ ने ही नृसिंह का अवतार लेकर भक्त प्रहलाद की रक्षा की। भगवान शिव ने देवराज इंद्र पर कृपादृष्टि डाली तो उन्होंने अग्निदेव, देवगुरु वृहस्पति और मार्केंडेय पर भी कृपा बरसाई। कहा जा सकता है आशुतोष भगवान शिव प्रसंन होते है तो साधक को अपनी दिव्य शक्ति प्रदान करते है जिससे अविद्या के अंधकार का नाश हो जाता है और साधक को अपने इष्ट की प्राप्ति होती है। इसका तात्पर्य है कि जब तक मनुष्य शिवजी को प्रसंन कर उनकी कृपा का पात्र नहीं बन जाता तब तक उसे ईश्वरीय साक्षात्कार नहीं हो सकता।

शिव बारात
संत शिरोमणि गोस्वामी तुलसीदास जी ने मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम के मुखारविन्द से कहलवाया है कि शिवद्रोही मम दास कहावा, सो नर सपनेहु मोहि नहिं भावा अर्थात जो शिव का द्रोह कर के मुझे प्राप्त करना चाहता है वह सपने में भी मुझे प्राप्त नहीं कर सकता। इसीलिए शिवरात्रि में शिव आराधना के साथ श्रीरामचरितमानस पाठ का बहुत महत्व होता है। शिव आदि-अनादि है। सृष्टि के विनाश और पुनःस्थापन के बीच की कड़ी हैं। वास्तव में शिवरात्रि का परम पर्व स्वयं परमात्मा के सृष्टि पर अवतरित होने की स्मृति दिलाता है। कहते है जब शिव जी बारात ले कर हिमालय के घर पहुंचे तो वे बैल पर सवार थे। उनके एक हाथ में त्रिशूल और एक हाथ में डमरू था। उनकी बारात में समस्त देवताओं के साथ उनके गण भूत, प्रेत, पिशाच आदि भी थे। सारे बाराती नाच गा रहे थे। सारे संसार को प्रसन्न करने वाली भगवान शिव की बारात अत्यंत मन मोहक थी। इस तरह शुभ घड़ी और शुभ मुहूर्त में शिव जी और पार्वती का विवाह हो गया और पार्वती को साथ ले कर शिव जी अपने धाम कैलाश पर्वत पर सुख पूर्वक रहने लगे।

महात्म्य
पौराणिक मान्यता है कि एक बार पार्वती जी ने भगवान शिव से पूछा, ऐसा कौन-सा श्रेष्ठ तथा सरल व्रत-पूजन है, जिससे मृत्युलोक के प्राणी आपकी कृपा सहज ही प्राप्त कर लेते हैं? शिवजी ने पार्वती को शिवरात्रि के व्रत का उपाय बताया। इस दिन प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में सूर्योदय से पहले ही उत्तर-पूर्व में पूजन-आरती की तैयारी कर लेनी चाहिए। सूर्योदय के समय पुष्पांजलि और स्तुति कीर्तन के साथ महाशिव रात्रि का पूजन संपन्न होता है। उसके बाद दिन में ब्रह्मभोज भंडारा के द्वारा प्रसाद वितरण कर व्रत संपन्न होता है। यह अपनी आत्मा को पुनीत करने का महाव्रत है। इस व्रत को करने से सब पापों का नाश हो जाता है। हिंसक प्रवृत्ति बदल जाती है। निरीह जीवों के प्रति आपके मन में दया भाव उपजता है।

सुख-शांति-वैभव और मोक्ष
महाशिवरात्रि पूजन का प्रभाव हमारे जीवन पर बड़ा ही व्यापक रूप से पड़ता है। सदाशिव प्रसन्न होकर हमें धन-धान्य, सुख-समृधि, यश तथा वृद्धि देते हैं। महाशिवरात्रि पूजन को विधिवत करने से हमें सदाशिव का सानिध्य प्राप्त होता है और उनकी महती कृपा से हमारा कल्याण होता है। शिवपुराण की कोटिरुद्रसंहिता में बताया गया है कि शिवरात्रि व्रत करने से व्यक्ति को भोग एवं मोक्ष दोनों ही प्राप्त होते हैं। देवताओं के पूछने पर भगवान सदाशिव ने बताया कि शिवरात्रि व्रत करने से महान पुण्य की प्राप्ति तथा मोक्ष की प्राप्ति होती है। महाशिवरात्रि परम कल्याणकारी व्रत है जिसके विधिपूर्वक करने से व्यक्ति के दुःख, पीड़ाओं का अंत होता है और उसे इच्छित फल की प्राप्ति होती है।



शिव का अभिषेक
अभिषेक यानी स्नान करना या कराना। रुद्राभिषेक का मतलब है भगवान रुद्र का अभिषेक यानि शिवलिंग पर रुद्रमंत्रों के द्वारा अभिषेक करना। यह पवित्र-स्नान भगवान मृत्युंजय शिव को कराया जाता है। अभिषेक को आजकल रुद्राभिषेक के रुप में ही ज्यादातर जाना जाता है। अभिषेक के कई प्रकार तथा रुप होते हैं। रुद्राभिषेक करना शिव आराधना का सर्वश्रेष्ठ तरीका माना गया है। शास्त्रों में भगवान शिव को जलधाराप्रिय माना जाता है।

उपवास
शिवरात्रि पर सच्चा उपवास यही है कि हम परमात्मा शिव से बुुिद्ध योग लगाकर उनके समीप रहे। उपवास का अर्थ ही है समीप रहना। जागरण का सच्चा अर्थ भी काम, क्रोध आदि पांच विकारों के वशीभूत होकर अज्ञान रूपी कुम्भकरण की निद्रा में सो जाने से स्वयं को सदा बचाए रखना है।

श्रीकृष्ण की नगरी भी हो जाती है शिवमय
महाशिवरात्रि के पर्व पर तीन लोक से न्यारी श्यामाश्याम की नगरी शिव नगरी बन जाती है क्योंकि श्यामसुन्दर की लीला भूमि में भोलेनाथ ने भी अपनी निराली लीला की थी। श्रीमद्भागवत के अनुसार, भगवान शंकर द्वापर में दो बार व्रजभूमि आए थे। पहली बार श्रीकृष्ण के जन्म के बाद साधु वेष में नंदगोपाल से मिलने और दूसरी दफा जब शरद की धवल चांदनी में श्रीकृष्ण ने गोपियों के साथ महारास किया था। इस महारास में शयामसुन्दर की मुरली की तान ने कैलाश पर्वत पर विराजमान शिव का ध्यान भंग किया था। पार्वती जी के समझाने के बावजूद वह नहीं माने और वृन्दावन की ओर चल पडे। वृन्दावन में वंशीवट पर चल रहे महारास में पार्वती जी तो प्रवेश कर गई किंतु शिव जी को पहरे पर तैनात गोपियों ने रोक दिया और कहा कि इस महारास में श्रीकृष्ण के अलावा किसी अन्य पुरूष को अंदर जाने की इजाजत नहीं है। उन्होंने भोलेनाथ की एक न सुनी तो ललिता सखी ने उन्हें समझाया कि वे महारास में प्रवेश के लिए गोपी बन जाएं। इसके बाद भोलेनाथ ने यमुना महारानी से कहा कि वे उनका गोपी के रूप में श्रृंगार कर दें, क्योंकि वे तो केवल भभूत ही लगाना जानते हैं। भोलेनाथ के अनुरोध पर यमुना महारानी ने उन्हें न के वल लहंगा और ओढनी पहनाया बल्कि उनका श्रृंगार बिंदी, काजल और लाली से कर दिया। गोपी वेश में शिव महारास में प्रवेश तो कर गए किंतु महारास देखने में इतने मग्न हो गए कि उनके सिर से ओढनी खिसक गई तो भी उन्हें पता न चला। यह देख श्यामसुन्दर मुस्कराते हुए उनके पास आए और हाथ पकड़कर आदर सत्कार से उन्हें एक ओर ले गए और बोले कि गोपेश्वर महारास में उनका स्वागत है। राधे जी उन्हें सचमुच गोपी समझकर मानसरोवर चली गईं और इतना रोईं कि आंसुओं से सरोवर बन गया। जब श्रीकृष्ण ने उन्हें बताया कि वह गोपी नहीं बल्कि साक्षात भोलेनाथ हैं तो राधा प्रसन्न हुईं और भोलेनाथ से वर मांगने को कहा। भोलेनाथ बोले कि वे वृन्दावन से बाहर नहीं जाना चाहते इस पर उन दोनों ने तथास्तु कहा। वृन्दावन में बने गोपेश्वर में गर्भगृह में महादेव ही विराजमान हैं चूंकि पार्वती जी उन्हें छोड़कर महारास देखने चली गई थीं इसलिए पार्वती, गणेश, नंदी, कार्तिके य गर्भगृह से बाहर हैं। भगवान श्यामसुन्दर से जुड़ जाने के कारण इस मंदिर में भक्तों का अपार जनसमूह एकत्र होता हैं।



अनंत के साथ एकाकार होना ही शिवयोग
शिव योग का गहरा अर्थ है। शिव का मतलब केवल भगवान शिव नहीं हैं, बल्कि शिव नाम किसी नाम या रूप की सीमाओं से मुक्त है। शिव का अर्थ है अनंत, जिसे ईश्वर, सर्वशक्तिमान, सार्वभौम चेतना आदि के नाम से भी जाना जाता है। योग का अर्थ है एकीकृत होना या विलीन करना। इस तरह शिव योग का अर्थ हुआ अनंत के साथ एकाकार होना या ईश्वर के साथ एकीकृत हो जाना। लेकिन अनंत क्या है, क्या है एकीकृत होना? बाबा जी कहते हैं, यह कहना गलत होगा कि ईश्वर की अनुभूति केवल आत्मदमन से ही संभव है। निश्चित ही यह भी रास्ता है, लेकिन दूसरे रास्ते भी हैं, जिसे विलक्षण संतों ने समझा और जो आज के युग में सर्वाधिक उपयुक्त है। यह रास्ता है दुनियावी कर्तव्यों आंतरिक दायित्वों के बीच खुद में संतुलन बनाने का। किसी भी एक की सिद्धि दूसरे की कीमत पर नहीं की जा सकती। व्यवहार का यह विकास खुद भगवान शिव में दिखता है, जो कम प्रयास से अधिक लाभ सुनिश्चित करता है। गृहस्थ के पास अपने आध्यात्मिक विकास को मापने का बेहतर यंत्र होता है। पहाड़ों पर अकेले रहकर कोई भी कह सकता है कि उसने ईष्र्या-द्वेष पर विजय पा ली। इसकी सही पहचान तभी होती है, जब विभिन्न तरह की स्थितियों में इसे मापा जाए। शिव योग स्वयं को जगाना सिखाता है, जो निश्चित रूप से अकेलापन नहीं है। शिव योग यह समझना है कि धैर्य की अनंत ऊर्जा कहीं बाहर नहीं, बल्कि हमारे भीतर है।

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