प्रकृति के प्रति कृतज्ञता जताने का उत्सव है छठ पर्व

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सूर्य के प्रति समर्पण का सामूहिक भाव दिखने लगा है। जब यह भाव दिखे तो समझिएं छठ पर भगवान सूर्य को अघ्र्य देने की घड़ी है। ऋग्वेद में सूर्य उपासना का उल्लेख है। गायत्री मंत्र भी सूर्य को समर्पित है। वास्तव में छठ पर्व सूर्य की पूजा है। वैसे तो समूचे देश व विदेशों में सूर्य की पूजा और छठ का त्योहार अलग-अलग ढंग से मनाया जाता है, लेकिन बिहार और यूपी खासकर भगवान शिव की नगरी काशी में छठ पूजा की एक अलग ही छटा बिखेरती है। इस पर्व में सूर्य के प्रति कृतज्ञता प्रकट की जाती है। कहते हैं कि छठी मइया स्कंदमाता पार्वती का स्वरूप है। सूर्य की पूजा को छठी मइया कह कर सूर्य के वात्सल्य भाव को प्रकट किया जाता है

सुरेश गांधी
पौराणिक कथाओं में भी भगवान भास्कर को अर्घ देने का जिक्र मिलता है। तब से अब तक जमाना चाहे जितना बदल गया हो, छठ करने के तरीके में कोई बदलाव नहीं आया है। न मंत्र न पुरोहित, बल्कि प्रकृति के नेमत के साथ हम डूबते और उगते सूर्य के सामने समर्पण करते हैं। भला क्यों नहीं, सूर्य ही एकमात्र ऐसे जागृत देवता है साक्षात दिखते हैं। सात घोड़ों पर सवार होकर अरुणिमा फैलाता पृथ्वी पर आता है सूर्य। दिनकर, दीनानाथ, मार्तंड होता हुआ दिवाकर अवसान की ओर बढ़ जाता है, कल पुनः लौटने के लिए। कोणार्क का सूर्य मंदिर तो इसका जीता जागता उदाहरण है। मानव हो या पशु-पक्षी अंधकार छटने और सूर्योदय की लालिमा देखने से शुरु होती दिनचर्या शाम ढलने पर ही खत्म होती है। इसी के सहारे सारे प्राणी सोते-जागते पूरी सृष्टि का नजारा देखते हैं। यह साथ होता है तो सबकुछ साफ-साफ दिखता है, नहीं होता तो कुछ भी नहीं, लेकिन यह वश में नहीं हैं। इसकी कृपा हो सकती है – धरती पर, जल और जमीन पर, लेकिन इस पर कोई कृपा नहीं की जा सकती। या यूं कहे सूर्य से ही सारी सृष्टि चल रही है। सब कुछ सूर्य पर निर्भर है। प्रकाश ही नहीं, जीवन भी देता है सूर्य। यही खासियत और अनुशासन सूर्य को देवता बनाता है। यही वजह है कि चर-अचर समेत पूरे कायनात में सबसे पूज्नीय देवताओं में से एक है भगवान सूर्य। वह अदम्य है, अथाह है, अक्षुण्य है। उसका होना पृथ्वी और चंद्र सहित सभी ग्रहों-उपग्रहों के लिए अनिवार्य हैं। वह न हो तो कोई भी ग्रह पिंड में तब्दील में हो जाये। लोकजन में भी सूर्य को आरोग्य देवता भी माना जाता है। सूर्य की किरणों में कई रोगों को नष्ट करने और निरोग करने की क्षमता पायी जाती है। माना जाता है कि ऋषि-मुनियों ने छठ के दिन इसका प्रभाव विशेष पाया और यहीं से छठ पर्व की शुरुआत हुई। ऐसे प्रत्यक्ष देवता की पूजा भला कौन नहीं करना चाहेगा।

Chhath festival is a celebration of gratitude towards natureकहा जाता है कि सम्पूर्ण अनुष्ठान एवं पूर्ण भक्ति-भाव से इस व्रत का पालन करने से जीवन में सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य एवं सौभाग्य की प्राप्ति होती है तथा एक साधक उन सभी सिद्धियों को प्राप्त करने में सफल होता है, जिनकी प्राप्ति के लिए देवी-देवता भी कठिन साधना करते हैं। गौर करने वाली बात यह है कि सूर्य उपासना का पर्व छठ एक सांस्कृतिक और सामाजिक उत्सव भी है। सूर्य, नदी, तालाब, पेड़ और फल से जुड़ा यह प्रकृति पर्व सफाई, सामूहिकता और बराबरी का बोध कराता है। सामाजिक समरसता के साथ-साथ इस महापर्व में गंवई संस्कृति देखने को मिलती है। जबकि वर्ण व्यवस्था की सबसे मुख्य शर्तें हैं- जातिवाद और उच्च-नीच की भावना, मूर्तिपूजा, मुहूर्त व मंत्र। छठ में ये सारी भावनाएं कमोबेश लुप्त हो जातीं हैं। ये सारी बातें छठ की तैयारी से ही दिखने लगतीं हैं। सूर्य को अघ्र्य देने के लिए सूप की जरूरत पड़ती है। यह सूप ब्राह्मणों द्वारा समाज में सबसे नीच, अछूत व अश्पृस्य कहलाने वाली डोम जाति के लोग तैयार करते हैं। यह वह जाति है जिससे आज भी लोग सबसे अधिक छुआछूत मानते हैं। यह जाति आज भी मोटे तौर पर समाज से बहिष्कृत होकर ही रहती है। परंतु, छठ का पर्व इस जाति की आवश्यकता समाज को महसुस कराता है और इस तरह से कि पूजा का सबसे प्रमुख उपकरण इन्हीं के द्वारा तैयार किया जाता है। हालांकि अब पूंजीवाद इसका रूप बिगाड़ने की कोशिश कर रहा है। लोग पीतल, सोना, चांदी व कांसा के सूप से अघ्र्य देने लगे हैं। फिर भी पूंजीवाद पर छठ की मूल भावना अभी तक भारी पड़ रही है। जातिवाद पर छठ जितना चोट करता है, उतना कोई दूसरा पर्व नहीं। यहां तक कि कई मायनों में किसी भी समाज सुधारक आंदोलन से भी अधिक। अघ्र्य स्थल पर किसी को किसी की जाति से कोई मतलब नहीं होता। समानता यहां तक बढ़ जाती है कि अगर कोई महादलित व्रती भी दंडवत कर रहा होता है तो सवर्ण समुदाय के लोग भी उसका पैर छूते हैं। हिन्दू धर्म में बिना मूर्ति के कोई पूजा फिलहाल संभव नहीं है। स्वामी दयानंद सरस्वती ने भले ही कहा हो कि मूर्तिपूजा हिंदू धर्म के विरूद्ध है, लेकिन उनका यह उपदेश चंद आर्य समाजियों तक ही सिमटा रह गया। हिंदुओं के सारे पर्व मूर्ति के साथ ही संभव हैं। परंतु, छठ इसका अपवाद है। इसमें कोई प्रतिमा की जरूरत नहीं होती। हाल के वर्षों में इसका भी रूप कुछ लोग बिगाड़ने में लग गये हैं। सूर्य की मूर्ति बनायी जाने लगी है लेकिन यह छठ की मूल भावना के विरूद्ध है। आज भी सामान्य जन बिना मूर्ति के ही छठ की पूजा करते हैं। यहां तक इसके लिए किसी मंदिर की जरूरत भी नहीं पड़ती।

पुरोहितों ने ऐसी व्यवस्था कर रखी है कि उनके बिना कोई पूजा हो ही नहीं सकती। मंत्रों पर तो उनका सदियों से अलिखित पेटेंट है। आम जनता के लिए तो वेद मंत्रों को पढ़ना क्या, सुनना भी घोर अपराध घोषित कर दिया गया। परंतु, छठ यहां भी वर्ण व्यवस्था को चुनौती देते हुए नजर आता है। छठ में किसी पुरोहित की जरूरत नहीं होती। इसे शुरू करने से पूर्णाहुति तक अमीर-गरीब सभी खुद ही पूरा कर लेते हैं। छठ के लिए किसी मुहूर्त का भी इंतजार नहीं होता। सभी व्रती अपने हिसाब से सूर्य ढलने के समय प्रथम अघ्र्य और अगले दिन सूर्य उगने के समय दूसरा अघ्र्य देकर व्रत पूरा करते हैं। कहा जा सकता है इस पर्व में सहकारिता की भावना जितनी दिखती है, वह अन्यत्र कहीं नहीं दिखती। सभी लोग बिना किसी सरकारी मदद के पूरे गांव व शहर को साफ-सुथरा बना डालते हैं। गंदगी फैलाने वाले लोगों का विवेक भी इस दिन जग जाता है। लोक आस्था का महापर्व छठ केवल सामाजिक समरसता का ही संदेश नहीं देता है, बल्कि समाज के द्वारा समाज पर नियंत्रण का भी संदेश देता है। इसके अलावा जीवन से जुड़े उद्देश्यों का भी संदेश देता है। इस पर्व में न तो केवल डूबने और उगते हुए सूर्य की पूजा होती है, बल्कि संदेश स्पष्ट है कि उदय के बाद अस्त और अस्त के बाद उदय जिंदगी का सार्वभौम सत्य है। जल में खड़ा होकर अर्घ देने का संदेश यह है कि जल सभ्यता की जननी है। वहीं, महापर्व बेटी बचाओ आंदोलन की वकालत करने के साथ प्रकृति के महत्व को भी दर्शाता है। यही एक पर्व है, जहां डूबते सूर्य की पूजा भी की जाती है। इसकी मुख्य वजह इस पर्व में निहित उद्देश्य और भावना है। लोक आस्था का यह पर्व प्रकृति की पूजा और शुद्धता एवं पवित्रता के संगम के साथ सामाजिक सद्भाव और संयम इस महापर्व में निहित है।

वैसे भी छठ पर्व केवल सामान्य आस्था का पर्व नहीं रहा, यह लोक आस्था का महापर्व बन गया है। छठ व्रत को लेकर अनेक कथाएं जनश्रुति के रूप में प्रचलित हैं। एक कथा के अनुसार, जब पांडव अपना सारा राजपाट जुए में हार गये, तब श्रीकृष्ण ने द्रौपदी को छठ व्रत रखने की सलाह दी। इसके उनकी मनोकामनाएं पूरी हुईं और पांडवों को राजपाट वापस मिल गया। कुछ कथाएं लोक परंपरा पर आधारित होती हैं। ऐसी ही एक कथा के अनुसार सूर्यदेव और छठी मइया भाई-बहन हैं और षष्ठी की पहली पूजा सूर्य ने ही की थी। छठ पर्व की वैज्ञानिक व्याख्या भी पढ़ने को मिलती हैं। षष्ठी तिथि यानी छठ को एक विशेष खगोलीय परिवर्तन होता है। इस समय सूर्य की पराबैगनी किरणें पृथ्वी की सतह पर सामान्य से अधिक मात्रा में एकत्र हो जाती हैं। इस दौरान होने वाले अनुष्ठान से इसके संभावित दुष्प्रभावों से रक्षा करने का सामथ्र्य प्राप्त होता है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार यह घटना कार्तिक और चैत्र मास की अमावस्या के छह दिन उपरांत आती है। इसीलिए इसका नाम छठ पर्व रखा गया है। स्त्री और पुरुष समान उत्साह से इस पर्व को मनाते हैं। लेकिन, जैसा कि आप सभी जानते हैं, इस पुरुष प्रधान समाज में व्रत की जिम्मेदारी महिलाओं पर आ जाती है। इसमें व्रत निर्जला और बेहद कठिन होता है और बड़े विधि विधान के साथ रखना होता है। पुरुष इसमें सहभागी जरूर होता है। हालांकि कुछ पुरुष भी इस व्रत को रखते हैं। लेकिन, अधिकतर कठिन तप महिलाएं ही करती हैं। चार दिनों के इस व्रत में व्रती को लगातार उपवास करना होता है। भोजन के साथ ही सुखद शैय्या का भी त्याग किया जाता है। पर्व के लिए बनाये गये कमरे में व्रती फर्श पर एक कंबल अथवा चादर के सहारे ही रात बिताती हैं। छठ पर्व को शुरू करना कोई आसान काम नहीं है। एक बार व्रत उठा लेने के बाद इसे तब तक करना होता है, जब तक कि अगली पीढ़ी की कोई विवाहित महिला इसके लिए तैयार न हो जाये। इसके नियम बहुत कड़े हैं। इसमें छूट की कोई गुंजाइश नहीं है। इसका मूल मंत्र है शुद्धता और पवित्रता। इस दौरान तन और मन दोनों की शुद्धता और पवित्रता का भारी ध्यान रखा जाता है।