मुख्यमंत्री से कृषि अवार्ड लेने नहीं गए किसान बाबूलाल

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Farmers have moved towards commercial farming: Virender Singh Mast

सरकार को किसानों के कर्ज में डूबने और मौत का जिम्मेदार मानते हैं बाबूलाल

शिवराज सिंह चौहान को समापन सत्र पर देना था पुरष्कार लेकिन नहीं गए बाबूलाल

rajesh dwivedi
सतना। मंदसौर में हुए किसान आंदोलन के दौरान प्रशासन व किसान के बीच बढ़ी दूरी को पाटने की कोशिश में जुटी शिवराज सरकार क ी मुश्किलें खत्म होने का नाम नहीं ले रही हैं। एक ओर प्रदेश किसान कार्यसमिति की बैठक आयोजित कर किसानों को पार्टी के प्रति उपजे संदेह को दूर करने का प्रयास किया जा रहा है तो दूसरी ओर किसानों का गुस्सा शांत नहीं हो रहा है।

Farmers have moved towards commercial farming: Virender Singh Mastइसका नमूना 10 सितंबर को तब देखने को मिला जब किसान समिति की बैठक के समापन सत्र में कृषि अवार्ड के लिए चयनित किए गए बाबूलाल दाहिया नहीं पहुंचे और अवार्ड लेने से इंकार कर दिया। यह अवार्ड मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को चित्रकूट की बैठक के समापन सत्र में देना था। प्रदेश में किसानों की दुर्दशा और उनके लगातार कर्ज में डूबते जाने के लिए सरकार को जि मेदार मानते हुए किसान आंदोलनों में शहीद किसानों की स्मृति का स मान करते हुए मध्यप्रदेश सरकार से इस पुरस्कार को न लेने का निर्णय लिया है ।अपनी अस्वीकृति से स बंधित अधिकारियों को लिखित रूप से अवगत भी करा दिया है बाबूलाल दाहिया का कहना है कि मध्यप्रदेश सरकारसे किसी भी प्रकार का स मान लेना किसानों के हित में आंदोलन कर रहे व कुछ दिन पहले शहीद हुए किसानों के साथ एक तरह का धोखा होगा।

कौन हैं बाबूलाल
बाबूलाल दाहिया सतना जिले के उचहेरा ब्लाक के पिथौराबाद के निवासी है, वे पिछले 10-12 वर्षों से देशी बीजों के संरक्षण और संवर्धन का काम कर रहे हैं।

बाबूलाल दाहिया की कुल 10 एकड़ जमीन है जिसमें से 2 एकड़ में ही देशी धान का प्रयोग कर रहे हैं। बाकी 6 एकड़ में भी देशी किस्में लगाते हैं, वह भी बिना किसी रासायनिक खाद के। साथ ही उचहेरा ब्लाक के 30 गांवों में भी किसानों के साथ मिलकर धान और मोटे अनाज (कोदो,कुटकी,ज्वार) की खेती कर रहे हैं।

वे कहते हंै कि लोक साहित्य में काम करते हुए महसूस हुआ कि विस्मृत होकर विलुप्त होने का खतरा सिर्फ साहित्य पर ही नहीं है, बल्कि हमारेलोक के अनाज भी इनसे अछूते नहीं है। अंचल में अनाज की पर परागत किस्में तेजी से विलुप्त हो रही हैं।। लेकिन जबसे उन्हें यह एहसास हुआ कि जैसे लोकगीत व लोक संस्कृति लुप्त हो रही है, वैसे ही लोक अन्न भी लुप्त हो रहे हैं, तबसे उन्होंने इन्हें सहेजने और बचाने का काम शुरू कर दिया। उनके पास देशी धान की 120 से अधिक किस्में हैं। इ उन्होंने विलुप्त होने वाले देसी अनाज की 110 किस्मों को यहाँ-वहाँ से खोजा। इसकेलिये उन्होंने सतना सहित आसपास के जिलों रीवा, सीधी, शहडोल के गाँव-गाँव में जाकर इनके बीज इक_ा किए और सबसे पहले अपने खेत में इन्हें रोपा। बारिश होने तथा प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद यहाँ देसी धान की सभी 120 से ज्यादा प्रजातियाँ अच्छे से फली-फूली हैं। इलाके में यह खेत किसी धान तीर्थ की तरह पहचाना जाता है।

कृषि क्षेत्र में नवाचार की पहचान
उन्होंने जब इसकी पहल की तो पहले दस-बारह, फिर खोजते हुए 30-40, फिर 60-70 का यह आँकड़ा पहुँचते-पहुँचते अब सौ से ऊपर तक जा रहा है। इनमें कुछ प्रजातियां महज 70 से 90 दिनों में पक जाती है तो कुछ सौ से सवा सौ दिनों में। लेकिन कुछ (30 से 40) किस्में 130 से 140 दिनों में भी पकती है। ये सभी सुगन्धित और पतले धान की किस्में हैं। श्री दाहिया हर किस्म की धान के रूप-रंग, आकार-प्रकार और उसकी प्रकृति से भली-भाँती परिचित हैं। उन्होंने इलाके में देसी धान की किस्मों को बचाने-सहेजने के लिये बी?ा उठाया हुआ है। वे अपने गाँव के दूसरे किसानों को भी यह सलाह दे रहे हैं। उनसे प्रेरित अन्य किसान भी अब इस बात को समझने लगे हैं। हालाँकि वे खुद बघेली बोली के अच्छे साहित्यकार हैं और देश के कुछ विश्वविद्यालयों में उनकी किताबों पर शोधार्थी पीएचडी कर रहे हैं लेकिन अब उन्होंने अपना पूरा ध्यान देसी किस्मों को पुनर्जीवित करने पर लगा दिया है। वे अब प्रदेश भर में इसका प्रचार-प्रसार भी कर रहे हैं। बाबूलाल दाहिया को जैव विविधताके क्षेत्र में उनके इस अभूतपूर्व काम के लिये मु बई और भोपाल में स मानित भी किया जा चुका है। उनके काम की कई जगह प्रदर्शनी भी लगाई जा चुकी है।

इनका कहना है
यह सही है कि हम लोगों ने बाबूलाल दाहिया के नवाचारों का स मान करने के लिए उनके नाम का चयन किया था। हम चित्रकूट में उनका इंतजार कर रहे हैं लेकिन वे नहीं आए। किसानों की दुर्दशा के चलते उन्होने अवार्ड लेने से इंकार कर दिया है, ऐसी कोई जानकारी हमारे पास नहीं आई है।
रामसिरोमनि शर्मा, उपसंचालक कृषि विभाग