दीपावली: गणेश लक्ष्मी पूजा विधि

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laxmi-ganesh-525f56c63a2ea_exlदीपावाली के अवसर पर लक्ष्मी माता को प्रसन्न करने के लिए आप घर की साज.सजावट पर खूब ध्यान देते हैं। लेकिन साज सजावट काफी नहीं है। लक्ष्मी माता को प्रसन्न करने के लिए सबसे जरूरी है कि आपकी पूजा विधि विधान पूर्वक हो। इसलिए दीपावली की रात गणेश लक्ष्मी के साथ कुबेर महाराज की भी पूजा करें। कुबेर देवताओं के खजांची हैं।

देवी लक्ष्मी की पूजा हो और आप विष्णु भगवान की अनदेखी करें तो माता इसे कैसे सहन कर सकती हैं। इसलिए दीपावली में लक्ष्मी माता के साथ विष्णु की भी पूजा होती है। काली अमावस की रात में दीपावली का त्योहार मनाया जाता है।

अमावस की कालिमा देवी काली का स्वरूप है। यह तमोगुणमयी रात होती है। इसलिए इस रात देवी कली की भी पूजा होती है। कई स्थानों पर तो विशेष पूजा पंडाल बनाकर इस रात देवी काली की पूजा होती है। कालीए लक्ष्मी और सरस्वती तीनों ही महालक्ष्मी से उत्पन्न हुई हैं। यही कारण है कि दीपावली में शुभ लाभ की चाहत रखने वालों को महालक्ष्मी की प्रसन्न हेतु तीनों देवियों कालीए लक्ष्मी और सरस्वती की पूजा जरूर करनी चाहिए। पूजा की संपूर्ण विधि बता रहे हैं पण्डित मुरली झा।

पूजन सामग्री

कलावाए रोलीए सिंदूरए एक नारियलए अक्षतए लाल वस्त्र ए फूलए पांच सुपारीए लौंगए पान के पत्तेए घीए कलशए कलश हेतु आम का पल्लवए चौकीए समिधाए हवन कुण्डए हवन सामग्रीए कमल गट्टेए पंचामृत ;दूधए दहीए घीए शहदए गंगाजलद्धए फलए बताशेए मिठाईयांए पूजा में बैठने हेतु आसनए हल्दी ए अगरबत्तीए कुमकुमए इत्रए दीपकए रूईए आरती की थाली। कुशाए रक्त चंदनदए श्रीखंड चंदन।

पर्वोपचार

पूजन शुरू करने से पूर्व चौकी को धोकर उस पर रंगोली बनाएं। चौकी के चारों कोने पर चार दीपक जलाएं। जिस स्थान पर गणेश एवं लक्ष्मी की प्रतिमा स्थापित करनी हो वहां कुछ चावल रखें। इस स्थान पर क्रमशरू गणेश और लक्ष्मी की मूर्ति को रखें। अगर कुबेरए सरस्वती एवं काली माता की मूर्ति हो तो उसे भी रखें। लक्ष्मी माता की पूर्ण प्रसन्नता हेतु भगवान विष्णु की मूर्ति लक्ष्मी माता के बायीं ओर रखकर पूजा करनी चाहिए।

आसन बिछाकर गणपति एवं लक्ष्मी की मूर्ति के सम्मुख बैठ जाएं। इसके बाद अपने आपको तथा आसन को इस मंत्र से शुद्धि करें. ष्ऊं अपवित्र रू पवित्रोवा सर्वावस्थां गतोऽपिवा। यरू स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तररू शुचि ॥  इन मंत्रों से अपने ऊपर तथा आसन पर 3.3 बार कुशा या पुष्पादि से छींटें लगायें फिर आचमन करें दृ ऊं केशवाय नमरू ऊं माधवाय नमरूए ऊं नारायणाय नमरूए फिर हाथ धोएंए पुनरू आसन शुद्धि मंत्र बोलें. ऊं पृथ्वी त्वयाधृता लोका देवि त्यवं विष्णुनाधृता। त्वं च धारयमां देवि पवित्रं कुरु चासनम्॥

शुद्धि और आचमन के बाद चंदन लगाना चाहिए। अनामिका उंगली से श्रीखंड चंदन लगाते हुए यह मंत्र बोलें चन्‍दनस्‍य महत्‍पुण्‍यम् पवित्रं पापनाशनम्ए आपदां हरते नित्‍यम् लक्ष्‍मी तिष्‍ठतु सर्वदा।

दीपावली पूजन हेतु संकल्प

पंचोपचार करने बाद संकल्प करना चाहिए। संकल्प में पुष्पए फलए सुपारीए पानए चांदी का सिक्काए नारियल ;पानी वालाद्धए मिठाईए मेवाए आदि सभी सामग्री थोड़ी.थोड़ी मात्रा में लेकर संकल्प मंत्र बोलें. ऊं विष्णुर्विष्णुर्विष्णुरूए ऊं तत्सदद्य श्री पुराणपुरुषोत्तमस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य ब्रह्मणोऽह्नि द्वितीय पराद्र्धे श्री श्वेतवाराहकल्पे सप्तमे वैवस्वतमन्वन्तरेए अष्टाविंशतितमे कलियुगेए कलिप्रथम चरणे जम्बुद्वीपे भरतखण्डे आर्यावर्तान्तर्गत ब्रह्मवर्तैकदेशे पुण्य ;अपने नगरध्गांव का नाम लेंद्ध क्षेत्रे बौद्धावतारे वीर विक्रमादित्यनृपते रू 2070ए तमेऽब्दे शोभन नाम संवत्सरे दक्षिणायनेध्उत्तरायणे हेमंत ऋतो महामंगल्यप्रदे मासानां मासोत्तमे कार्तिक मासे कृष्ण पक्षे अमावस तिथौ ;जो वार होद्ध रवि वासरे स्वाति नक्षत्रे आयुष्मान योग चतुष्पाद करणादिसत्सुशुभे योग ;गोत्र का नाम लेंद्ध गोत्रोत्पन्नोऽहं अमुकनामा ;अपना नाम लेंद्ध सकलपापक्षयपूर्वकं सर्वारिष्ट शांतिनिमित्तं सर्वमंगलकामनयादृ श्रुतिस्मृत्यो. क्तफलप्राप्तर्थंकृ निमित्त महागणपति नवग्रहप्रणव सहितं कुलदेवतानां पूजनसहितं स्थिर लक्ष्मी महालक्ष्मी देवी पूजन निमित्तं एतत्सर्वं शुभ.पूजोपचारविधि सम्पादयिष्ये।

गणपति पूजन

किसी भी पूजा में सर्वप्रथम गणेश जी की पूजा की जाती है। इसलिए आपको भी सबसे पहले गणेश जी की ही पूजा करनी चाहिए। हाथ में पुष्प लेकर गणपति का ध्यान करें। मंत्र पढ़ें. गजाननम्भूतगणादिसेवितं कपित्थ जम्बू फलचारुभक्षणम्। उमासुतं शोक विनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपंकजम्।आवाहनरू ऊं गं गणपतये इहागच्छ इह तिष्ठ।। इतना कहकर पात्र में अक्षत छोड़ें।

अर्घा में जल लेकर बोलें. एतानि पाद्याद्याचमनीय.स्नानीयंए पुनराचमनीयम् ऊं गं गणपतये नमरू। रक्त चंदन लगाएंरू इदम रक्त चंदनम् लेपनम् ऊं गं गणपतये नमरूए इसी प्रकार श्रीखंड चंदन बोलकर श्रीखंड चंदन लगाएं। इसके पश्चात सिन्दूर चढ़ाएं ष्इदं सिन्दूराभरणं लेपनम् ऊं गं गणपतये नमरू। दर्वा और विल्बपत्र भी गणेश जी को चढ़ाएं। गणेश जी को वस्त्र पहनाएं। इदं रक्त वस्त्रं ऊं गं गणपतये समर्पयामि।

पूजन के बाद गणेश जी को प्रसाद अर्पित करेंरू इदं नानाविधि नैवेद्यानि ऊं गं गणपतये समर्पयामिरू। मिष्टान अर्पित करने के लिए मंत्ररू इदं शर्करा घृत युक्त नैवेद्यं ऊं गं गणपतये समर्पयामिरू। प्रसाद अर्पित करने के बाद आचमन करायें। इदं आचमनयं ऊं गं गणपतये नमरू। इसके बाद पान सुपारी चढ़ायेंरू इदं ताम्बूल पुगीफल समायुक्तं ऊं गं गणपतये समर्पयामिरू। अब एक फूल लेकर गणपति पर चढ़ाएं और बोलेंरू एषरू पुष्पान्जलि ऊं गं गणपतये नम:

इसी प्रकार से अन्य सभी देवताओं की पूजा करें। जिस देवता की पूजा करनी हो गणेश के स्थान पर उस देवता का नाम लें।

कलश पूजन

घड़े या लोटे पर मोली बांधकर कलश के ऊपर आम का पल्लव रखें। कलश के अंदर सुपारीए दूर्वाए अक्षतए मुद्रा रखें। कलश के गले में मोली लपेटें। नारियल पर वस्त्र लपेट कर कलश पर रखें। हाथ में अक्षत और पुष्प लेकर वरूण देवता का कलश में आह्वान करें। ओ३म् त्तत्वायामि ब्रह्मणा वन्दमानस्तदाशास्ते यजमानो हविभिरू। अहेडमानो वरुणेह बोध्युरुशंस मान आयुरू प्रमोषीरू। ;अस्मिन कलशे वरुणं सांगं सपरिवारं सायुध सशक्तिकमावाहयामिए ओ३म्भूर्भुवरू स्वरूभो वरुण इहागच्छ इहतिष्ठ। स्थापयामि पूजयामि॥द्ध

इसके बाद जिस प्रकार गणेश जी की पूजा की है उसी प्रकार वरूण देवता की पूजा करें। इसके बाद देवराज इन्द्र फिर कुबेर की पूजा करें।

लक्ष्मी पूजन
सबसे पहले माता लक्ष्मी का ध्यान करें

ॐ या सा पद्मासनस्थाए विपुल.कटि.तटीए पद्म.दलायताक्षी।
गम्भीरावर्त.नाभिःए स्तन.भर.नमिताए शुभ्र.वस्त्रोत्तरीया।।
लक्ष्मी दिव्यैर्गजेन्द्रैः। मणि.गज.खचितैःए स्नापिता हेम.कुम्भैः।
नित्यं सा पद्म.हस्ताए मम वसतु गृहेए सर्व.मांगल्य.युक्ता।।

इसके बाद लक्ष्मी देवी की प्रतिष्ठा करें। हाथ में अक्षत लेकर बोलें श्ॐ भूर्भुवः स्वः महालक्ष्मीए इहागच्छ इह तिष्ठए एतानि पाद्याद्याचमनीय.स्नानीयंए पुनराचमनीयम्।श्
प्रतिष्ठा के बाद स्नान कराएंरू ॐ मन्दाकिन्या समानीतैःए हेमाम्भोरुह.वासितैः स्नानं कुरुष्व देवेशिए सलिलं च सुगन्धिभिः।। ॐ लक्ष्म्यै नमः।। इदं रक्त चंदनम् लेपनम् से रक्त चंदन लगाएं। इदं सिन्दूराभरणं से सिन्दूर लगाएं। ॐ मन्दार.पारिजाताद्यैःए अनेकैः कुसुमैः शुभैः। पूजयामि शिवेए भक्तयाए कमलायै नमो नमः।। ॐ लक्ष्म्यै नमःए पुष्पाणि समर्पयामि।ष्इस मंत्र से पुष्प चढ़ाएं फिर माला पहनाएं। अब लक्ष्मी देवी को इदं रक्त वस्त्र समर्पयामि कहकर लाल वस्त्र पहनाएं।

लक्ष्मी देवी की अंग पूजा

बायें हाथ में अक्षत लेकर दायें हाथ से थोड़ा.थोड़ा छोड़ते जायेंकृ ऊं चपलायै नमरू पादौ पूजयामि ऊं चंचलायै नमरू जानूं पूजयामिए ऊं कमलायै नमरू कटि पूजयामिए ऊं कात्यायिन्यै नमरू नाभि पूजयामिए ऊं जगन्मातरे नमरू जठरं पूजयामिए ऊं विश्ववल्लभायै नमरू वक्षस्थल पूजयामिए ऊं कमलवासिन्यै नमरू भुजौ पूजयामि ऊं कमल पत्राक्ष्य नमरू नेत्रत्रयं पूजयामिए ऊं श्रियै नमरू शिरंरू पूजयामि।

अष्टसिद्धि पूजा

अंग पूजन की भांति हाथ में अक्षत लेकर मंत्रोच्चारण करें। ऊं अणिम्ने नमरूए ओं महिम्ने नमरूए ऊं गरिम्णे नमरूए ओं लघिम्ने नमरूए ऊं प्राप्त्यै नमरू ऊं प्राकाम्यै नमरूए ऊं ईशितायै नमरू ओं वशितायै नमरू।

अष्टलक्ष्मी पूजन

अंग पूजन एवं अष्टसिद्धि पूजा की भांति हाथ में अक्षत लेकर मंत्रोच्चारण करें। ऊं आद्ये लक्ष्म्यै नमरूए ओं विद्यालक्ष्म्यै नमरूए ऊं सौभाग्य लक्ष्म्यै नमरूए ओं अमृत लक्ष्म्यै नमरूए ऊं लक्ष्म्यै नमरूए ऊं सत्य लक्ष्म्यै नमए ऊं भोगलक्ष्म्यै नमरूए ऊं योग लक्ष्म्यै नमरू

नैवैद्य अर्पण

पूजन के पश्चात देवी को ष्इदं नानाविधि नैवेद्यानि ऊं महालक्ष्मियै समर्पयामिष् मंत्र से नैवैद्य अर्पित करें। मिष्टान अर्पित करने के लिए मंत्ररू ष्इदं शर्करा घृत समायुक्तं नैवेद्यं ऊं महालक्ष्मियै समर्पयामिष् बालें। प्रसाद अर्पित करने के बाद आचमन करायें। इदं आचमनयं ऊं महालक्ष्मियै नमरू। इसके बाद पान सुपारी चढ़ायेंरू इदं ताम्बूल पुगीफल समायुक्तं ऊं महालक्ष्मियै समर्पयामि। अब एक फूल लेकर लक्ष्मी देवी पर चढ़ाएं और बोलेंरू एष पुष्पान्जलि ऊं महालक्ष्मियै नमरू।

लक्ष्मी देवी की पूजा के बाद भगवान विष्णु एवं शिव जी पूजा करनी चाहिए फिर गल्ले की पूजा करें। पूजन के पश्चात सपरिवार आरती और क्षमा प्रार्थना करें.

क्षमा प्रार्थना

न मंत्रं नोयंत्रं तदपिच नजाने स्तुतिमहो
न चाह्वानं ध्यानं तदपिच नजाने स्तुतिकथाः ।
नजाने मुद्रास्ते तदपिच नजाने विलपनं
परं जाने मातस्त्व दनुसरणं क्लेशहरणं

विधेरज्ञानेन द्रविणविरहेणालसतया
विधेयाशक्यत्वात्तव चरणयोर्याच्युतिरभूत् ।
तदेतत् क्षंतव्यं जननि सकलोद्धारिणि शिवे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति

पृथिव्यां पुत्रास्ते जननि बहवः संति सरलाः
परं तेषां मध्ये विरलतरलोहं तव सुतः ।
मदीयो7यंत्यागः समुचितमिदं नो तव शिवे
कुपुत्रो जायेत् क्वचिदपि कुमाता न भवति

जगन्मातर्मातस्तव चरणसेवा न रचिता
न वा दत्तं देवि द्रविणमपि भूयस्तव मया ।
तथापित्वं स्नेहं मयि निरुपमं यत्प्रकुरुषे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदप कुमाता न भवति

परित्यक्तादेवा विविध सेवाकुलतया
मया पंचाशीतेरधिकमपनीते तु वयसि
इदानींचेन्मातः तव यदि कृपा
नापि भविता निरालंबो लंबोदर जननि कं यामि शरणं

श्वपाको जल्पाको भवति मधुपाकोपमगिरा
निरातंको रंको विहरति चिरं कोटिकनकैः
तवापर्णे कर्णे विशति मनुवर्णे फलमिदं
जनः को जानीते जननि जपनीयं जपविधौ

चिताभस्म लेपो गरलमशनं दिक्पटधरो
जटाधारी कंठे भुजगपतहारी पशुपतिः
कपाली भूतेशो भजति जगदीशैकपदवीं
भवानि त्वत्पाणिग्रहणपरिपाटीफलमिदं

न मोक्षस्याकांक्षा भवविभव वांछापिचनमे
न विज्ञानापेक्षा शशिमुखि सुखेच्छापि न पुनः
अतस्त्वां सुयाचे जननि जननं यातु मम वै
मृडाणी रुद्राणी शिवशिव भवानीति जपतः

नाराधितासि विधिना विविधोपचारैः
किं रूक्षचिंतन परैर्नकृतं वचोभिः
श्यामे त्वमेव यदि किंचन मय्यनाधे
धत्से कृपामुचितमंब परं तवैव

आपत्सु मग्नः स्मरणं त्वदीयं
करोमि दुर्गे करुणार्णवेशि
नैतच्छदत्वं मम भावयेथाः
क्षुधातृषार्ता जननीं स्मरंति

जगदंब विचित्रमत्र किं
परिपूर्ण करुणास्ति चिन्मयि
अपराधपरंपरावृतं नहि माता
समुपेक्षते सुतं

मत्समः पातकी नास्ति
पापघ्नी त्वत्समा नहि
एवं ज्ञात्वा महादेवि
यथायोग्यं तथा कुरु