जागने वाले हैं सृष्टि के पालनहार

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prabodhini 03 01 kshirsagar 03 skhirsagar 04 skhirsagar kshirsagar 023 नवम्बर यानी सोमवार को देवउठनी एकादशी। इस बार नेत्र खुलते ही भक्तों को मिलेगा मनचाहा वरदान। भक्तों की भर देंगे झोली भगवान विष्णु। धन बरसाती मां लक्ष्मी भी आएंगी आपके द्वार। लेकिन सूर्य कन्या व तुला राशि में तथा शुक्र और गुरु तारे अस्त होने से विवाह का योग नहीं बन पा रहा है। इस बार देवउठनी एकादशी के 15 दिन बाद ही शादियां शुरू हो पायेंगी। ऊँ नमः नारायणाभ्याम, ऊँ उमा माहेश्वराय नमः, ऊँ रां ईं हीं हूं हूं, ऊँ घृणी सूर्याय आदित्य ऊँ व दिवाकराय विरमहे महातेनाम धीमहिं तन्नाभानू प्रचोदयात मंत्र के जाप से नौकरी में तरक्की, उत्तम स्वास्थ्य सहित मनोकामनाएं पूरी होती है। व्रत के दौरान इन मंत्रों का जाप करना चाहिए। खखोल्काय स्वाहा से सूर्यदेव को अर्घ्य दें। देवउठनी ग्यारस के अबूझ मुहूर्त में सोने और चांदी की खरीदी लाभदायक रहेगी। इस दिन खरीदी गई वस्तु को भगवान विष्णु को अर्पित करने के बाद उसका उपयोग करने से वह शुभ फल प्रदान करने के साथ ही लंबे समय तक आप के पास रहेगी। इस दिन गन्ना और अन्य ऋतु फलों को खरीदने दान करने से समृद्धि बढ़ती है।

सुरेश गांधी
अगर आप लेना चाहते हैं नारायण का आशीर्वाद। उन तक पहुंचाना चाहते हैं अपने दिल की बात। तो हो जाइए तैयार, क्योंकि चार महीने की निद्रा के बाद जागने वाले हैं सृष्टि के पालनहार भगवान विष्णु। 3 नवम्बर यानी सोमवार को देवउठनी एकादशी है। कहा जा रहा है इस दिन जब भगवान अपने नेत्र खोलेंगे, तो देंगे मनचाहा वरदान। भक्तों की भर देंगे झोली। उनके नेत्रों से बरसेगा खुशियों का वरदान। धन बरसाती मां लक्ष्मी भी आएंगी आपके द्वार। लेकिन सूर्य कन्या व तुला राशि में तथा शुक्र और गुरु तारे अस्त होने से विवाह का योग नहीं बन पा रहा है। 16 नवंबर से यह वृश्चिक राशि में चला जाएगा, उसके बाद ही विवाह के मुहूर्त हैं। मतलब साफ है इस बार देवउठनी एकादशी के 15 दिन बाद ही शादियां शुरू हो पायेंगी। तब तक लोगों को इंतजार करना होगा। पारण का वक्त 6 बजकर 38 मिनट से 8 बजकर 49 मिनट तक है। पारण तिथि के दिन द्वादशी समाप्त होने का समय 9 बजकर 54 मिनट है। एकादशी तिथि प्रारम्भ 2 नवम्बर को 14 बजकर 39 मिनट से है। तथा समाप्ति 3 नवम्बर को 12 बजकर 16 मिनट पर है। इस साल तुलसी विवाह 4 नवंबर 2014 को है। 3 नवंबर को सोने-चांदी की खरीदी करना लाभकारी होगा। क्योंकि इस दिन चंद्रमा, बृहस्पति के आधिपत्य वाली मीन राशि में, जबकि बृहस्पति चंद्रमा के आधिपत्य वाली कर्क राशि में रहेगा। दोनों राशियों के देवों का यह अंतर-राशि परिवर्तन योग खरीद-फरोख्त के लिहाज से समृद्धिकारक माना जा रहा है।
दीपावाली के 11 दिन बाद देव प्रबोध उत्सव और तुलसी के विवाह को देवउठनी एकादशी कहते हैं। एकादशी का यह पर्व बड़े उत्साह से मनाया जाता है। क्षीरसागर में शयन कर रहे श्री हरि विष्णु को जगाकर उनसे मांगलिक कार्यों की शुरूआत कराने की प्रार्थना की जाती है। मंदिरों के व घरों में गन्नों के मंडप बनाकर श्रद्धालु भगवान लक्ष्मीनारायण का पूजन कर उन्हें बेर, चने की भाजी, आँवला सहित अन्य मौसमी फल व सब्जियों के साथ पकवान का भोग अर्पित किए जाते हैं। मंडप में शालिगराम की प्रतिमा व तुलसी का पौधा रखकर उनका विवाह कराया जाता है। इसके बाद मण्डप की परिक्रमा करते हुए भगवान से कुँवारों के विवाह कराने और विवाहितों के गौना कराने की प्रार्थना की जाती है। दीप मालिकाओं से घरों को रोशन किया जाएगा और बच्चे पटाखे चलाकर खुशियाँ मनाते हैं। इस बार 9 जुलाई से 3 नवम्बर तक भगवान श्री विष्णु व लक्ष्मी जी शयन पर थे। 3 नवम्बर को देवप्रबोधिनी एकादशी पर उठेंगे। पदमपुराण के अनुसार इन चार महीनों में भगवान विष्णु के दो रूप अलग-अलग स्थान पर वास करते हैं, उनका एक स्वरूप राजा बलि के पास पाताल और दूसरा रूप क्षीर सागर में शेषनाग की शैय्या पर शयन करता है। भगवान विष्णु कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को अपने लोक में लौटते हैं। इसी कारण इन चार महीनों में विवाह आदि शुभ कार्य नहीं किए जाते।
ज्योतिषि रामदुलार उपाध्याय का कहना है कि पंचांगों में विवाह के लिए सूर्य, गुरू, शुक्र और चंद्र का शुद्धिकरण जरूरी बताया गया है। देवशयनी एकादशी के बाद यह चारों ग्रह अशुद्ध माने जाते हैं, जो दीपावली के बाद पड़ने वाली देवउठनी एकादशी से शुद्ध होते हैं और मांगलिक कार्य शुरू हो जाते हैं। देव उठने के बाद इसी दिन से विवाह मुहूर्त शुरू होते हैं लेकिन इस बार देवउठनी एकादशी के 15 दिन बाद विवाह मुहूर्त शुरू हो रहे हैं। इसकी वजह शुक्र तारे का अस्त होना है। चूंकि इस दिन सालिगराम व तुलसी का विवाह हुआ था इसलिए शास्त्रों के अनुसार अबूझ मुहूर्त में शादियां होंगी। उनके मुताबिक ऐसा माना जाता है कि आषाढ़ माह शुक्ल पक्ष की एकादशी को भगवान नारायण शयन करते हैं और कार्तिक माह शुक्ल पक्ष की एकादशी को जागते हैं। इस तिथि के बाद शुरू किए गए पुण्यकर्मों का फल इस बार करोड़ों गुणा अधिक है। कहा, व्रत के दौरान ऊँ नमः नारायणाभ्याम, ऊँ उमा माहेश्वराय नमः, ऊँ रां ईं हीं हूं हूं, ऊँ घृणी सूर्याय आदित्य ऊँ व दिवाकराय विरमहे महातेनाम धीमहिं तन्नाभानू प्रचोदयात मंत्र के जाप से नौकरी में तरक्की, उत्तम स्वास्थ्य सहित मनोकामनाएं पूरी होती है। दान सुपात्र को देना चाहिए क्योंकि कुपात्र को दान देने वाला भी नरकगामी बनता है। विनम्र भाव से अथवा गुप्त दान करने का अधिक फल है। बृहस्पति को स्वर्ण और चंद्रमा को चांदी धातु का अधिपति माना गया है, इसीलिए देवउठनी एकादशी पर सोने-चांदी की खरीदी लाभकारी रहेगी। साथ ही इस दिन भगवान विष्णु चार माह के बाद उठेंगे, इस कारण यह दिन अबूझ मुहूर्त का होगा। ऐसे में भूमि, भवन वाहन की खरीदी भी की जा सकती है। इस दिन का स्वामी चंद्र होता है, जो गुरु की मीन राशि में रहने से शुभ फल प्रदान करेगा। इसी तरह बृहस्पति (गुरु) चंद्रमा की कर्क राशि में उच्च का रहने के साथ ही उदित स्थिति में होगा। इसी दिन पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र भी शुभता में वृद्धि करेगा।
हालांकि ज्योतिषि माताबदल पांडेय बताते है कि देवउठनी एकादशी को स्वयं सिद्घ मुहूर्त माना जाता है। इसका आशय यह है कि शादी व अन्य शुभ कार्यों के लिए इस दिन किसी प्रकार का मुहूर्त देखने की आवश्यकता नहीं होती। देवउठनी एकादशी के दिन जब भगवान का विवाह हो सकता है तो हम फिर भी इंसान हैं। इस दिन देव मुहूर्त और अबूझ मुहूर्त होने के कारण विवाह करने में कोई हर्ज नहीं है। इसी के चलते अनेक शादी समारोह आयोजित किए जाएंगे। पंचांगों के अनुसार विवाह मुहूर्त सूर्य के वृश्चिक राशि में जाने के बाद व शुक्र तारा उदय के बाद यह 17 नवंबर से शुरू हो सकेंगे। वर्ष 2014 में सिर्फ 18 विवाह मुहूर्त है, ये तारीखें है-18,19,24,25,26, व 29 नवंबर। दिसंबर में 1 से 7,12,13,14 व 15 तारीख को विवाह मुहूर्त है। देव प्रबोधिनी एकादशी का महत्व शास्त्रों में उल्लेखित है। गोधूलि बेला में तुलसी विवाह करने का पुण्य लिया जाता है। एकादशी व्रत और कथा श्रवण से स्वर्ग की प्राप्ति होती है। देवउठनी ग्यारस को गन्ने के मंडप की नीचे सालिगराम तुलसी विवाह किया जाएगा। इसे लोग छोटी दिवाली के नाम से भी जानते हैं। इस दिन भी दीपदान व आतिशबाजी की जाती है। इस दिन लोग तांत्रिक क्रियाएं भी संपन्न करते हैं।
ज्योतिषि के अनुसार चार महीने तक देवताओं के सोने और इनके जागने पर कार्तिक, शुक्ल पक्ष की एकादशी पर उनके जागने का प्रतीकात्मक है। प्रतीक वर्षा के दिनों में सूर्य की स्थिति और ऋतु प्रभाव बताने, उस प्रभाव से अपना सामंजस्य बिठाने का संदेश देते हैं। वैदिक वांग्मय के अनुसार सूर्य सबसे बड़े देवता हैं। उन्हें जगत की आत्मा भी कहा गया है। हरि, विष्णु, इंद्र आदि नाम सूर्य के पर्याय हैं। वर्षा काल में अधिकांश समय सूर्य देवता बादलों में छिपे रहते हैं। इसलिए ऋषि ने गाया है कि वर्षा के चार महीनों में हरि सो जाते हैं। फिर जब वर्षा काल समाप्त हो जाता है तो वे जाग उठते हैं या अपने भीतर उन्हें जगाना होता है। बात सिर्फ सूर्य या विष्णु के सो जाने और उस अवधि में आहार विहार के मामले में खास सावधानी रखने तक ही सीमित नहीं है। इस अनुशासन का उद्देश्य वर्षा के दिनों में होने वाले प्रकृति परिवर्तनों उनके कारण प्रायः फैलने वाली मौसमी बीमारियों और शरीर की प्रतिरोधक क्षमता पर पड़ने वाले उसके प्रभाव के कारण अक्सर गड़बड़ाता रहता है। निजी जीवन में स्वास्थ्य संतुलन का ध्यान रखने के साथ ही यह चार माह की अवधि साधु संतों के लिए भी विशेष दायित्वों का तकाजा लेकर आती है। घूम-घूम कर धर्म अध्यात्म की शिक्षा देने लोक कल्याण की गतिविधियों को चलाते रहने वाले साधु संत इन दिनों एक ही जगह पर रुक कर साधना और शिक्षण करते हैं।
क्यों मनाते हैं देवउठनी एकादशी
ब्रतावैवर्त पुराण की कथा के अनुसार कालांतर में तुलसी देवी भगवान गणेश के शापवश असुर शंखचूड की पत्नी बनीं। जब असुर शंखचूड का आतंक फैलने लगा तो भगवान श्री हरि ने वैष्णवी माया फैलाकर शंखचूड से कवच ले लिया और उसका वध कर दिया। तत्पश्चात् भगवान श्री हरि शंखचूड का रूप धारण कर साध्वी तुलसी के घर पहुंचे, वहां उन्होंने शंखचूड समान प्रदर्शन किया। तुलसी ने पति को युद्ध में आया देख उत्सव मनाया और उनका सहर्ष स्वागत किया। तब श्री हरि ने शंखचूड के वेष में शयन किया। उस समय तुलसी के साथ उन्होंने सुचारू रूप से हास-विलास किया तथापि तुलसी को इस बार पहले की अपेक्षा आकर्षण में व्यतिक्रम का अनुभव हुआ। अतः उसे वास्तविकता का अनुमान हो गया। तब तुलसी देवी ने पूछा, आप कौन हैं, आपने मेरा सतीत्व नष्ट कर दिया, इसलिए अब मैं तुम्हें शाप दे रही हूं। तुलसी के वचन सुनकर शाप के भय से भगवान श्री हरि ने अपना लीलापूर्वक अपना सुन्दर मनोहर स्वरूप प्रकट किया। उन्हें देखकर पति के निधन का अनुमान करके कामिनी तुलसी मूर्छित हो गई। फिर चेतना प्राप्त होने पर उसने कहा नाथ आपका हृदय पाषाण के सदृश है, इसलिए आप में तनिक भी दया नहीं है। आज आपने छलपूर्वक धर्म नष्ट करके मेरे स्वामी को मार डाला। अतः देव! मेरे श्राप से अब पाषाण रूप होकर पृथ्वी पर रहें। इस प्रकार शोक संतृप्त तुलसी विलाप करने लगी। तब भगवान श्री हरि ने कहा भद्रे। तुम मेरे लिए भारतवर्ष में रहकर बहुत दिनों तक तपस्या कर चुकी हो। अब तुम दिव्य देह धारण कर मेरे साथ सानन्द रहो। मैं तुम्हारे श्रााप को सत्य करने के लिए भारतवर्ष में पाषाण (शालिग्राम) बनकर रहूंगा और तुम एक पूजनीय तुलसी के पौधे के रूप में पृथ्वी पर रहोगी। गण्डकी नदी के तट पर मेरा वास होगा। बिना तुम्हारे मेरी पूजा नहीं हो सकेगी। तुम्हारे पत्रों और मंजरियों में मेरी पूजा होगी। जो भी बिना तुम्हारे मेरी पूजा करेगा वह नरक का भागी होगा। इस प्रकार शालिग्राम जी का उद्भव पृथ्वी पर हुआ। पौराणिक कथा के अनुसार भगवान विष्णु व जलंधर के बीच युद्ध होता है। जलंधर की पत्नी तुलसी पतिव्रता रहती हैं। इसके कारण विष्णु जलंधर को पराजित नहीं कर पा रहे थे। जलंधर को पराजित करने के लिए भगवान युक्ति के तहत जालंधर का रूप धारण कर तुलसी का सतीत्व भंग करने पहुँच गए। तुलसी का सतीत्व भंग होते ही भगवान विष्णु जलंधर को युद्ध में पराजित कर देते हैं। युद्ध में जलंधर मारा जाता है। भगवान विष्णु तुलसी को वरदान देते हैं कि वे उनके साथ पूजी जाएँगी। एक अन्य कथा के अनुसार गंगा राधा को जड़त्व रूप हो जाने व राधा को गंगा के जल रूप हो जाने का श्राप देती हैं। राधा व गंगा दोनों ने भगवान कृष्ण को पाषाण रूप हो जाने का श्राप दे दिया। इसके कारण ही राधा तुलसी, गंगा नदी व कृष्ण सालिगराम के रूप में प्रसिद्ध हुए। प्रबोधिनी एकादशी के दिन सालिगराम, तुलसी व शंख का पूजन करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है।
देवोत्थान एकादशी की कथा
एक समय भगवान नारायण से लक्ष्मी जी ने कहा- हे नाथ! अब आप दिन-रात जागा करते हैं और सोते हैं तो लाखों-करोड़ों वर्ष तक को सो जाते हैं तथा उस समय समस्त चराचर का नाश भी कर डालते हैं। अतः आप नियम से प्रतिवर्ष निद्रा लिया करें। इससे मुझे भी कुछ समय विश्राम करने का समय मिल जाएगा। लक्ष्मी जी की बात सुनकर नारायण मुस्काराए और बोले- देवी! तुमने ठीक कहा है। मेरे जागने से सब देवों को और खास कर तुमको कष्ट होता है। तुम्हें मेरी सेवा से जरा भी अवकाश नहीं मिलता। इसलिए, तुम्हारे कथनानुसार आज से मैं प्रति वर्ष चार मास वर्षा ऋतु में शयन किया करूंगा। उस समय तुमको और देवगणों को अवकाश होगा। मेरी यह निद्रा अल्पनिद्रा और प्रलय कालीन महानिद्रा कहलाएगी। यह मेरी अल्पनिद्रा मेरे भक्तों को परम मंगलकारी उत्सवप्रद तथा पुण्यवर्धक होगी। इस काल में मेरे जो भी भक्त मेरे शयन की भावना कर मेरी सेवा करेंगे तथा शयन और उत्पादन के उत्सव आनन्दपूर्वक आयोजित करेंगे उनके घर में तुम्हारे सहित निवास करूँगा।
तुलसी विवाह
तुलसी-शालिग्राम का विवाह पौराणिक आख्यानों पर आधारित है। इस विवाह में लोग तुलसी जी के पौधे का गमला, गेरू आदि से सजाकर उसके चारों ओर ईख का मंडप बनाकर उसके ऊपर ओढ़नी या सुहाग प्रतीक चूनरी ओढ़ाते हैं। गमले को साडी ओढ़ाकर तुलसी को चूडी चढ़ाकर उनका शृंगार करते हैं। गणपत्यादि पंचदेवों तथा श्री शालिग्राम का विधिवत पूजन करके श्री तुलसी जी की षोडशोपचार पूजा तुलस्यै नमः अथवा हरिप्रियार्ये नमः नाम मंत्र से करते हैं। तत्पश्चात एक नारियल दक्षिणा के साथ टीका के रूप में रखते हैं तथा भगवान शालिग्राम की मूर्ति का सिंहासन हाथ में लेकर तुलसीजी की सात परिक्रमा कराएं और आरती के बाद विवाहोत्व पूर्ण होता है। इस विवाह को महिलाओं के परिप्रेक्ष्य में अखण्ड सौभाग्यकारी माना गया है। पुराणों में भी इसे मंगलकारी बताया गया है। देवता जब जागते हैं, तो सबसे पहली प्रार्थना हरिवल्लभा तुलसी की ही सुनते हैं। इसीलिए तुलसी विवाह को देव जागरण के पवित्र मुहूर्त के स्वागत का आयोजन माना जाता है। तुलसी विवाह का सीधा अर्थ है, तुलसी के माध्यम से भगवान का आहावान। शास्त्रों में कहा गया है कि जिन दम्पतियों के कन्या नहीं होती, वे जीवन में एक बार तुलसी का विवाह करके कन्यादान का पुण्य अवश्य प्राप्त करें। इस दिन सारे घर को लीप-पोतकर साफ करना चाहिए तथा स्नानादि से निवृत्त होकर आंगन में चौक पूरकर भगवान विष्णु के चरणों को चित्रित करना चाहिए। रात्रि को परिवार के सभी वयस्क सदस्य देवताओं का भगवान विष्णु सहित सहित विधिवत पूजन करने के बाद प्रातःकाल भगवान को शंख, घंटा-घड़ियाल आदि बजाकर जगाते हैं। कहा जाता है कि चातुर्मास के दिनों में एक ही जगह रुकना जरुरी है, जैसा कि साधु संन्यासी इन दिनों किसी एक नगर या बस्ती में ठहरकर धर्म प्रचार का काम करते हैं। देवोत्थान एकादशी को यह चातुर्मास पूरा होता है और पौराणिक आख्यान के अनुसार इस दिन देवता भी जाग उठते हैं। माना जाता है कि देवशयनी एकादशी के दिन सभी देवता और उनके अधिपति विष्णु सो जाते हैं। फिर चार माह बाद देवोत्थान एकादशी को जागते हैं। देवताओं का शयन काल मानकर ही इन चार महीनों में कोई विवाह, नया निर्माण या कारोबार आदि बड़ा शुभ कार्य आरंभ नहीं होता। उठो देवा, बैठो देवा, अंगुरिया चटकाओं देवा।‘ यानी देवताओं को जगाने, उन्हें अंगुरिया चटखाने और अंगड़ाई ले कर जाग उठने का आह्वान करने के उपचार में भी संदेश छुपा है।
कैसे जगाएं भगवान को
व्रती स्त्रियां इस दिन प्रातःकाल स्नानादि से निवृत्त होकर आंगन में चौक बनाएं। इसके पश्चात भगवान विष्णु के चरणों को कलात्मक रूप से अंकित करें। फिर दिन की तेज धूप में विष्णु के चरणों को ढंक दें। देवउठनी एकादशी को रात्रि के समय सुभाषित स्त्रोत पाठ, भगवत कथा और पुराणादि का श्रवण और भजन आदि का गायन करें। घंटा, शंख, मृदंग, नगाड़े और वीणा बजाएं। विविध प्रकार के खेल-कूद, लीला और नाच आदि के साथ इस मंत्र का उच्चारण करते हुए भगवान को जगाएं। उत्तिष्ठ गोविन्द त्यज निद्रां जगत्पतये। त्वयि सुप्ते जगन्नाथ जगतसुप्तं भवेदिद।। उत्थिते चेष्टते सर्वमुत्तिष्ठोत्तिष्ठ माधव। गतामेघा वियच्चौव निर्मलं निर्मलादिशः।। शारदानि च पुष्पाणि गृहाण मम केशव।।
कैसे करें व्रत-पूजन
पूजन के लिए भगवान का मन्दिर अथवा सिंहासन को विभिन्न प्रकार के लता पत्र, फल, पुष्प और वंदनबार आदि से सजाएं। आंगन में देवोत्थान का चित्र बनाएं, तत्पश्चात फल, पकवान, सिंघाड़े, गन्ने आदि चढ़ाकर डलिया से ढंक दें तथा दीपक जलाएं। विष्णु पूजा या पंचदेव पूजा विधान अथवा रामार्चनचन्द्रिका आदि के अनुसार श्रद्धापूर्वक पूजन तथा दीपक, कपूर आदि से आरती करें। इसके बाद इस मंत्र से पुष्पांजलि अर्पित करें- यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन। तेह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्तिदेवाः।। इसके बाद इस मंत्र से प्रार्थना करें -इयं तु द्वादशी देव प्रबोधाय विनिर्मिता। त्वयैव सर्वलोकानां हितार्थ शेषशायिना।। इदं व्रतं मया देव कृत प्रीत्यै तव प्रभो। न्यूनं सम्पूर्णतां यातु त्वत्प्रसादाज्जनार्दन।। साथ ही प्रह्लाद, नारद, पाराशर, पुण्डरीक, व्यास, अम्बरीष, शुक, शौनक और भीष्मादि भक्तों का स्मरण करके चरणामृत, पंचामृत व प्रसाद वितरित करें। तत्पश्चात एक रथ में भगवान को विराजमान कर स्वयं उसे खींचें तथा नगर, ग्राम या गलियों में भ्रमण कराएं। शास्त्रानुसार जिस समय वामन भगवान तीन पद भूमि लेकर विदा हुए थे, उस समय दैत्यराज बलि ने वामनजी को रथ में विराजमान कर स्वयं उसे चलाया था। ऐसा करने से समुत्थिते ततो विष्णौ क्रियाः सर्वाः प्रवर्तये। यानी भगवान विष्णु योग निद्रा को त्याग कर सभी प्रकार की क्रिया करने में प्रवृत्त हो जाते हैं। अंत में कथा श्रवण कर प्रसाद का वितरण करें। किसानों की गन्ने की फसल भी तैयार है। आज के दिन गन्ने की पूजा करके उसका उपभोग किया जाता है। कहा जाता है, तुलसी विवाह के सुअवसर पर व्रत रखने का बड़ा ही महत्व है. आस्थावान भक्तों के अनुसार इस दिन श्रद्धा-भक्ति और विधिपूर्वक व्रत करने से व्रती के इस जन्म के साथ-साथ पूर्वजन्म के भी सारे पाप मिट जाते हैं और उसे पुण्य की प्राप्ति होती है।
चातुर्मास में क्या करने का क्या है पुण्य फल?
पदमपुराण के अनुसार जिन दिनों में भगवान विष्णु शयन करते हैं, उन चार महीनों को चातुर्मास एवं चौमासा भी कहते हैं। इन चार मासों में विभिन्न कर्म करने पर मनुष्य को विशेष पुण्य लाभ की प्राप्ति होती है क्योंकि किसी भी जीव की ओर से किया गया कोई भी पुण्यकर्म खाली नहीं जाता। वैसे तो चातुर्मास का व्रत देवशयनी एकादशी से शुरू होता है परंतु द्वादशी, पूर्णिमा, अष्टमी और कर्क की सक्रांति से भी यह व्रत शुरू किया जा सकता है। जो मनुष्य इन चार महीनों में मंदिर में झाड़ू लगाते हैं तथा मंदिर को धोकर साफ करते हैं उन्हें सात जन्म तक ब्राह्मण योनि मिलती है। जो भगवान को दूध, दही, घी, शहद, और मिश्री से स्नान कराते हैं वे संसार में वैभवशाली होकर स्वर्ग में जाकर इन्द्र जैसा सुख भोगते हैं। धूप, दीप, नैवेद्य और पुष्प आदि से पूजन करने वाला प्राणी अक्षय सुख भोगता है। तुलसीदल अथवा तुलसी मंजरियों से भगवान का पूजन करने, स्वर्ण की तुलसी ब्राह्मण को दान करने पर परमगति मिलती है। गूगल की धूप और दीप अर्पण करने वाला मनुष्य जन्म जन्मांतरों तक धनाढ्य रहता है। पीपल का पेड़ लगाने, पीपल पर प्रति दिन जल चढ़ाने, पीपल की परिक्रमा करने, उत्तम ध्वनि वाला घंटा मंदिर में चढ़ाने, ब्राह्मणों का उचित सम्मान करने, किसी भी प्रकार का दान देने, कपिला गौ का दान, शहद से भरा चांदी का बर्तन और तांबे के पात्र में गुड़ भरकर दान करने, नमक, सत्तू, हल्दी, लाल वस्त्र, तिल, जूते, और छाता आदि का यथाशक्ति दान करने वाले जीव को कभी भी किसी वस्तु की कमी जीवन में नहीं आती तथा वह सदा ही साधन सम्पन्न रहता है। जो व्रत की समाप्ति  यानी उद्यापन  करने पर अन्न, वस्त्र और शैय्या का दान करते हैं, वे अक्षय सुख को प्राप्त करते हैं तथा सदा धनवान रहते हैं। वर्षा ऋतु में गोपीचंदन का दान करने वालों को सभी प्रकार के भोग एवं मोक्ष मिलते हैं। जो नियम से भगवान श्री गणेश जी और सूर्य भगवान  का पूजन करते हैं,  वे उत्तम गति को प्राप्त करते हैं तथा जो शक्कर का दान करते हैं उन्हें यशस्वी संतान की प्राप्ति होती है। माता लक्ष्मी और पार्वती को प्रसन्न करने के लिए चांदी के पात्र में हल्दी भर कर दान करनी चााहिए तथा भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए बैल का दान करना श्रेयस्कर है। चातुर्मास में फलों का दान करने से नंदन वन का सुख मिलता है। जो लोग नियम से एक समय भोजन करते हैं, भूखों को भोजन खिलाते हैं, स्वयं भी नियमबद्ध होकर चावल अथवा जौ का भोजन करते हैं, भूमि पर शयन करते हैं उन्हें अक्षय र्कीत प्राप्त होती है।  इन दिनों में आंवले से युक्त जल से स्नान करना तथा मौन रह कर  भोजन करना श्रेयस्कर है।
चार्तुमास में क्या न करें?
श्रावण यानी सावन के महीने में साग एवं हरि सब्जियां, भादों में दही, आश्विन में दूध और कार्तिक में दालें खाना वर्जित है। किसी की निंदा-चुगली न करें तथा न ही किसी से धोखे से उसका कुछ हथियाना चाहिए। चातुर्मास में शरीर पर तेल नहीं लगाना चाहिए।  कांसे के बर्तन में कभी भोजन नहीं करना चाहिए। जो अपनी इन्द्रियों का दमन करता है, वह अश्वमेध यज्ञ के फल को प्राप्त करता है।
एकादशी से व्रत से मिलता है मोक्ष
ब्रह्माजी बोले- हे मुनिश्रेष्ठ! अब पापों को हरने वाली पुण्य और मुक्ति देने वाली एकादशी का माहात्म्य सुनिए। पृथ्वी पर गंगा की महत्ता और समुद्रों तथा तीर्थों का प्रभाव तभी तक है जब तक कि कार्तिक की देव प्रबोधिनी एकादशी तिथि नहीं आती। मनुष्य को जो फल एक हजार अश्वमेध और एक सौ राजसूय यज्ञों से मिलता है वही प्रबोधिनी एकादशी से मिलता है। नारदजी कहने लगे कि हे पिता! एक समय भोजन करने, रात्रि को भोजन करने तथा सारे दिन उपवास करने से क्या फल मिलता है सो विस्तार से बताइए। ब्रह्माजी बोले- हे पुत्र। एक बार भोजन करने से एक जन्म और रात्रि को भोजन करने से दो जन्म तथा पूरा दिन उपवास करने से सात जन्मों के पाप नाश होते हैं। जो वस्तु त्रिलोकी में न मिल सके और दिखे भी नहीं वह हरि प्रबोधिनी एकादशी से प्राप्त हो सकती है। मेरु और मंदराचल के समान भारी पाप भी नष्ट हो जाते हैं तथा अनेक जन्म में किए हुए पाप समूह क्षणभर में भस्म हो जाते हैं। जैसे रुई के बड़े ढेर को अग्नि की छोटी-सी चिंगारी पलभर में भस्म कर देती है। विधिपूर्वक थोड़ा-सा पुण्य कर्म बहुत फल देता है परंतु विधि रहित अधिक किया जाए तो भी उसका फल कुछ नहीं मिलता। संध्या न करने वाले, नास्तिक, वेद निंदक, धर्मशास्त्र को दूषित करने वाले, पापकर्मों में सदैव रत रहने वाले, धोखा देने वाले ब्राह्मण और शूद्र, परस्त्री गमन करने वाले तथा ब्राह्मणी से भोग करने वाले ये सब चांडाल के समान हैं। जो विधवा अथवा सधवा ब्राह्मणी से भोग करते हैं, वे अपने कुल को नष्ट कर देते हैं। हे मुनिशार्दूल। इस संसार में उसी मनुष्य का जीवन सफल है जिसने हरि प्रबोधिनी एकादशी का व्रत किया है। वही ज्ञानी तपस्वी और जितेंद्रीय है तथा उसी को भोग एवं मोक्ष मिलता है जिसने इस एकादशी का व्रत किया है। वह विष्णु को अत्यंत प्रिय, मोक्ष के द्वार को बताने वाली और उसके तत्व का ज्ञान देने वाली है। मन, कर्म, वचन तीनों प्रकार के पाप इस रात्रि को जागरण से नष्ट हो जाते हैं। अतः हे नारद! तुम्हें भी विधिपूर्वक इस व्रत को करना चाहिए। जो कार्तिक मास में धर्मपारायण होकर अन्न नहीं खाते उन्हें चांद्रायण व्रत का फल प्राप्त होता है। इस मास में भगवान दानादि से जितने प्रसन्न नहीं होते जितने शास्त्रों में लिखी कथाओं के सुनने से होते हैं।
कार्तिक मास में जो भगवान विष्णु की कथा का एक या आधा श्लोक भी पढ़ते, सुनने या सुनाते हैं उनको भी एक सौ गायों के दान के बराबर फल मिलता है। अतः अन्य सब कर्मों को छोड़कर कार्तिक मास में मेरे सन्मुख बैठकर कथा पढ़नी या सुननी चाहिए। जो कल्याण के लिए इस मास में हरि कथा कहते हैं वे सारे कुटुम्ब का क्षण मात्र में उद्धार कर देते हैं। शास्त्रों की कथा कहने-सुनने से दस हजार यज्ञों का फल मिलता है। जो नियमपूर्वक हरिकथा सुनते हैं वे एक हजार गोदान का फल पाते हैं। विष्णु के जागने के समय जो भगवान की कथा सुनते हैं वे सातों द्वीपों समेत पृथ्वी के दान करने का फल पाते हैं। कथा सुनकर वाचक को जो मनुष्य सामर्थ्य के अनुसार दक्षिणा देते हैं उनको सनातन लोक मिलता है। इसका समस्त तीर्थों से करोड़ गुना फल होता है। जो मनुष्य अगस्त्य के पुष्प से भगवान का पूजन करते हैं उनके आगे इंद्र भी हाथ जोड़ता है। तपस्या करके संतुष्ट होने पर हरि भगवान जो नहीं करते, वह अगस्त्य के पुष्पों से भगवान को अलंकृत करने से करते हैं। जो कार्तिक मास में बिल्वपत्र से भगवान की पूजा करते हैं वे मुक्ति को प्राप्त होते हैं। कार्तिक मास में जो तुलसी से भगवान का पूजन करते हैं, उनके दस हजार जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं। तुलसी दर्शन करने, स्पर्श करने, कथा कहने, नमस्कार करने, स्तुति करने, तुलसी रोपण, जल से सींचने और प्रतिदिन पूजन सेवा आदि करने से हजार करोड़ युगपर्यंत विष्णु लोक में निवास करते हैं।
kshirsagar 02तुलसी पौधा लगाने से मिलता है विष्णुलोक में निवास
जो तुलसी का पौधा लगाते हैं, उनके कुटुम्ब से उत्पन्न होने वाले प्रलयकाल तक विष्णुलोक में निवास करते हैं। कहते है रोपी तुलसी जितनी जड़ों का विस्तार करती है उतने ही हजार युग पर्यंत तुलसी रोपण करने वाले सुकृत का विस्तार होता है। जिस मनुष्य की रोपणी की हुई तुलसी जितनी शाखा, प्रशाखा, बीज और फल पृथ्वी में बढ़ते हैं, उसके उतने ही कुल जो बीत गए हैं और होंगे दो हजार कल्प तक विष्णुलोक में निवास करते हैं। जो कदम्ब के पुष्पों से श्रीहरि का पूजन करते हैं वे भी कभी यमराज को नहीं देखते। जो गुलाब के पुष्पों से भगवान का पूजन करते हैं उन्हें मुक्ति मिलती है। जो वकुल और अशोक के फूलों से भगवान का पूजन करते हैं वे सूर्य-चंद्रमा रहने तक किसी प्रकार का शोक नहीं पाते। जो मनुष्य सफेद या लाल कनेर के फूलों से भगवान का पूजन करते हैं उन पर भगवान अत्यंत प्रसन्न होते हैं और जो भगवान पर आम की मंजरी चढ़ाते हैं, वे करोड़ों गायों के दान का फल पाते हैं। जो दूब के अंकुरों से भगवान की पूजा करते हैं वे सौ गुना पूजा का फल ग्रहण करते हैं। जो शमी के पत्र से भगवान की पूजा करते हैं, उनको महाघोर यमराज के मार्ग का भय नहीं रहता। जो भगवान को चंपा के फूलों से पूजते हैं वे फिर संसार में नहीं आते। केतकी के पुष्प चढ़ाने से करोड़ों जन्म के पाप नष्ट हो जाते हैं। पीले रक्तवर्ण के कमल के पुष्पों से भगवान का पूजन करने वाले को श्वेत द्वीप में स्थान मिलता है। जो मनुष्य मांसाहारी नहीं है वह गौदान करे। आँवले से स्नान करने वाले मनुष्य को दही और शहद का दान करना चाहिए। जो फलों को त्यागे वह फलदान करे। तेल छोड़ने से घृत और घृत छोड़ने से दूध, अन्न छोड़ने से चावल का दान किया जाता है। इसी प्रकार जो मनुष्य भूमि शयन का व्रत लेते हैं उन्हें शैयादान करना चाहिए, साथ ही तुलसी सब सामग्री सहित देना चाहिए। पत्ते पर भोजन करने वाले को सोने का पत्ता घृत सहित देना चाहिए। मौन व्रत धारण करने वाले को ब्राह्मण और ब्राह्मणी को घृत तथा मिठाई का भोजन कराना चाहिए। बाल रखने वाले को दर्पण, जूता छोड़ने वाले को एक जोड़ जूता, लवण त्यागने वाले को शर्करा, मंदिर में दीपक जलाने वाले को तथा नियम लेने वाले को व्रत की समाप्ति पर ताम्र अथवा स्वर्ण के पत्र पर घृत और बत्ती रखकर विष्णुभक्त ब्राह्मण को दान देना चाहिए। एकांत व्रत में आठ कलश वस्त्र और स्वर्ण से अलंकृत करके दान करना चाहिए। यदि यह भी न हो सके तो इनके अभाव में ब्राह्मणों का सत्कार सब व्रतों को सिद्ध करने वाला कहा गया है। इस प्रकार ब्राह्मण को प्रणाम करके विदा करें। इसके पश्चात स्वयं भी भोजन करें। जिन वस्तुओं को चातुर्मास में छोड़ा हो, उन वस्तुअओं की समाप्ति करें अर्थात ग्रहण करने लग जाएँ। हे राजन! जो बुद्धिमान इस प्रकार चातुर्मास व्रत निर्विघ्न समाप्त करते हैं, वे कृतकृत्य हो जाते हैं और फिर उनका जन्म नहीं होता। यदि व्रत भ्रष्ट हो जाए तो व्रत करने वाला कोढ़ी या अंधा हो जाता है। भगवान कृष्ण कहते हैं कि राजन जो तुमने पूछा था वह सब मैंने बतलाया। इस कथा को पढ़ने और सुनने से गौदान का फल प्राप्त होता है। हिंदू धर्म में एकादशी का व्रत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। प्रत्येक वर्ष चौबीस एकादशियाँ होती हैं। जब अधिकमास या मलमास आता है तब इनकी संख्या बढ़कर 26 हो जाती है। आषाढ शुक्ल एकादशी को देव-शयन हो जाने के बाद से प्रारम्भ हुए चातुर्मास का समापन तक शुक्ल एकादशी के दिन देवोत्थान-उत्सव होने पर होता है। इस दिन वैष्णव ही नहीं, स्मार्त श्रद्धालु भी बडी आस्था के साथ व्रत करते हैं।

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